Monday, 1 May 2023

Golden Egg - 1

 

सुनहरा अंडा

 

यह सब बहुत थकाने वाला था – पहाड़ पर चढ़ना और झरनों को पार करना, और चट्टानों पर चलना. मगर बहुत प्यारा था. इस पड़ाव का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं.

जब पिछले हफ्ते हमारे दोस्त रंजन ने फोन करके कोल्ली मलाय की ट्रिप का प्रस्ताव रखा तो मैं खुशी से झूम उठी. ये तो मेरा सपना था.

हाँ, मैं भयानक रूप से स्वप्नदर्शी हूँ, कितनी ही बार निराश होने और खुद को बेहद चोट पहुँचाने के बावजूद, मैं सुधर नहीं सकी. आह, सिर्फ मेरा आशावाद ही, जो ‘कुत्ते की पूंछ’ जैसा है, मुझे प्रेरित करता हैं वरना मैं न जाने कहाँ होती.

मैंने सिद्ध पुरुषों (अत्यंत विकसित आत्माएं, जिनके पास आठों सिद्धियाँ होती हैं - अनु.) के बारे में पढ़ा और सुना  था, जिन्होंने कोल्ली हिल्स को अपना निवास स्थान बनाया था. कुछ लोगों को जो आश्चर्यजनक अनुभव हुए थे, उनसे मैं मन्त्र मुग्ध हो गई थी. अपनी ज़िंदगी में कम से कम किसी एक सिद्ध पुरुष से मिलने का सपना मैं देखा करती थी. 

क्या मेरी इच्छा कभी पूरी होगी?

कोल्ली हिल्स जाने का निमंत्रण एक गज़ब का सरप्राइज़ था और हम एक ख़ूबसूरत बादलों से ढंके दिन निकल पड़े. मेरी कल्पना उड़ान भरने लगी और सिद्ध पुरुष से मिलने का दृश्य मेरी नज़र के सामने साकार होने लगा.

हवा साफ़ और शुद्ध थी और हमने अपने भीतर ऊर्जा का अनुभव किया. हल्का सा नाश्ता करके, जो हम अपने साथ लाये थे, हमने सारे पत्ते, पेपर कप्स और प्लास्टिक बैग्स कचरे की थैली में डाले, जिसे हम अपने साथ लाये थे, ताकि आसपास के साफ़-सुथरे वातावरण को खराब न करें. सूर्य बादलों के पीछे छुप गया था और हमें नींद आने लगी.

रंजन ने और मेरे पति ने मिलकर चादरें बिछाईं, जो हम साथ लाये थे और लेट गए, मुझसे यह कहकर, “कुछ देर आंखें मूँद लो, हम चालीस मिनट बाद निकलेंगे.”     

मैंने भी उनसे कुछ दूर, एक बड़े पेड़ के नीचे चादर बिछाई. मेरी आंखों में नींद आने का नाम नहीं ले रही थी. और चालीस मिनट में तो हम वापस घर के लिए चल पड़ेंगे. और इस बार भी कोई सिद्ध पुरुष नहीं...

नहीं...रुको.

मैंने एक आकृति को अपनी ओर आते देखा. एक बूढा, दाढ़ी वाला, कुछ गंदी धोती पहने और कन्धों पर एक कपड़ा ओढ़े. उसके बाएं हाथ में पौधों का एक गुच्छा था.

मैंने उठकर उसकी तरफ देखा. उसकी आंखों में एक ख़ास चमक थी. उसके बालों की एक लट बाएं कंधे पर लटक रही थी. उसके सिर पर पगड़ी थी. चौड़े माथे पर पवित्र भस्म और उसके बीच बड़ा-सा लाल कुमकुम. उसके ऊपर दो पंछी मंडरा रहे थे. मैंने देखा कि एक सांप कुछ देर रुका और फिर फुफकारते हुए सूखे पत्तों में गायब हो गया जो सूखी धरती को ढांके हुए थे. मैंने अपने हाथ जोड़े मानो ‘नमस्कार’ करना चाह रही थी.     

उसने अपना हाथ उठाया, जैसे मुझे आशीर्वाद दे रहा हो. उसने अपनी पोशाक की तहों से कोई चमकती हुई चीज़ निकाली और मेरी ओर बढ़ा दी. मैं खामोश खडी रही.

वो सारे सवाल कहाँ गए, जो मैं ‘उस’ जैसे किसी से मिलने पर पूछने वाली थी?

वो सवाल जिन्हें मैंने अपनी स्मृति की चिप्स में प्रिंट करके रखा था, ताकि मैं किसी विकसित आत्मा से मिलने पर पूछ सकूँ?

शब्द ही नहीं निकल रहे थे.

यह एक अंडाकार चीज़ थी, सोने जैसी चमकती हुई. कोई अंडा?

सच है, जबसे मैंने ‘मेरा कृष्ण कहाँ है’ किताब बार-बार पढी थी, मैं ऐसी ही किसी मुलाक़ात का, और किसी को मुझे ‘शालिग्राम देने का सपना देख रही थी.

मगर ये?

किसी अज्ञात शक्ति से प्रेरित होकर मैंने अपना हाथ बढाया और उस चीज़ को अपनी हथेलियों में रखा.

ठंडा.

बर्फ जैसा ठंडा.    

पंछी उसके ऊपर फड़फड़ा रहे थे. एक उसके उसके कंधे पर बैठा और उड़ गया, हवा में एक चक्कर लगाया और उसकी बांह पर बैठ गया.

मैं वहाँ स्तब्ध खडी थी, जैसे अपनी खोई हुई आवाज़ को पाने में असमर्थ थे मैंने उसे दूर जाते हुए देखा वह घनी झाड़ियों में लुप्त हो गया.

मैं पेड़ के नीचे बैठी थी. अंडा अभी भी मेरी हथेलियों में था. मैंने अपना हैण्डबैग खोलकर अंडे को भीतर सरका दिया. मैंने उस जगह को देखा, जहाँ वह खडा था. ऊपर की टहनियों से टूटकर गोल-गोल घूमता हुआ एक पत्ता उस जगह पर गिरा. उसमें अजीब-सी चमक थी. मैंने आगे बढकर उसे उठा लिया. चमकदार पत्ता भी मेरे हैंडबैग में चला गया.

ओह! मेरी जुबान क्यों जकड़ गई है?

मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, एक सनसनाहट ने मुझे घेर लिया, नींद का नामोनिशान न था.

मैंने आंखें खोलीं. पत्तों से आसमान ख़ूबसूरत नज़र आ रहा था. फिर मुझे पक्षी दिखाई दिया.

हरा.

मखमली.

अनोखा लग रहा था.

वह कोयल की तरह चिल्लाया, और मेरी खामोशी को बर्बाद कर दिया. ऊफ! कोयल की तरह चिल्ला रहा है? यह क्लोरोप्सिस (लीफ बर्ड) होगा. ‘मुगलूर के शरणार्थी’ का पक्षी, जो सभी पक्षियों की नक़ल करता है और लगातार बर्डमैन और उसकी बीबी का दिल बहलाता है.

मैंने पक्षी की तरफ देखा और फुसफुसाकर पूछा, “तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?

पक्षी नीचे उतर आया और मेरे निकट सूखे पत्तों के ढेर पर बैठ गया, जैसे उसने मेरी बात सुनी हो.

और...वह बोलने लगा.

मैं हैरान रह गई. वह बोल रहा था.

पक्षी ने मेरी तरफ देखा और कहा,

“जब तक सुनहरा अंडा तुम्हारे पास है तुम जानवरों और पंछियों और मछलियों की बोली समझ सकोगी और...”

मुझे एडी मर्फी की फिल्म की याद आई!

पक्षी ने कहानी सुनाई

 हम एक साथ रहते थे, मैं और मेरी प्रियतमा, इन पहाड़ियों पर उड़ा करते... एक हज़ार से भी ज़्यादा वर्ष पूर्व. उस समय जंगल ज़्यादा घने थे और कोई भी मनुष्य इस जगह पर आने की हिम्मत नहीं करता था. सिर्फ सिद्ध पुरुष ही यहाँ थे – बहुत सारे. इस पहाडी पर अनगिनत जडी-बूटियाँ थीं. उनके बारे में सिर्फ सिद्ध पुरुष ही जानते थे. बहुत सारे फल थे. हम दोनों इन पहाड़ियों पर और उसके भी पार उड़ते, यह अतीव आनंद की ज़िंदगी थी. फिर वह हुई एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना.

एक पेड़ के नीचे चींटियों का टीला था और हमने सोचा ही नहीं कि उसके भीतर कोई सिद्ध पुरुष होगा. हाँ, वह अनेक वर्षों से वहाँ तपस्या कर रहा था और उसके चारों ओर टीला बन गया था, जिसने उसे पूरी तरह ढांक दिया था. हमने बेवकूफी से, अपनी खूबसूरती के नशे में चूर, खुशी से जोर-जोर से गाते हुए, उस टीले पर चोंच मारना शुरू किया और कुछ मिनट बाद हमारी चोंचे उस पवित्र आत्मा की जटाओं से टकराईं. उसे टीले के भीतर देखकर हम बुरी तरह चौंक गए. उसकी आंखें खुलीं, वे दमक रही थीं. उसका ध्यान भंग होने के कारण वह क्रोधित था.

“तुम अपना गीत भूल जाओगे,” उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, “ और जो भी पक्षी तुम्हारे सामने आयेगा, उसकी नक़ल करते हुए उड़ते रहोगे. तुम अपनी प्रियतमा को भी खो दोगे.”

इससे पहले कि हम कुछ कहते, मेरी प्रियतमा गायब हो गई और मैं उसके ऊपर मंडराता रहा, बदहवासी से चीखता रहा, और मैंने महसूस किया कि मैं अपना गाना भूल गया हूँ.”

“उसके बाद क्या हुआ? क्या तुम्हें अपनी प्रियतमा कभी वापस मिलेगी?” मैंने पूछा.”

“हाँ – तुम्हारी मदद से.”

मैं चौंक गई.

पक्षी ने आगे कहा, “सुनहरा अंडा तुम्हें इसलिए दिया गया है, क्योंकि तुम्हें सोने से कोइ लगाव नहीं है. उसे बाहर निकाल कर अपनी हथेली पर रखो. इसके भीतर मेरी प्रियतमा कैद है. सिद्ध पुरुष ने वह तुम्हें इसलिए दिया है, क्योंकि तुम इतनी आसानी से इससे जुदा हो सकती हो, जैसे किसी कपडे के टुकडे से. मुझे अपनी प्रियतमा वापस पाने दो. तुम ज़िंदगी भर सुखी और संतुष्ट रहोगी. प्लीज़, मुझे मेरी प्रियतमा और मेरे गीत वापस दे दो.”

मैंने अपनी बैग से सुनहरा अंडा बाहर निकाला और उसे पंछी की ओर बढ़ा दिया. उसने हलके से उस पर चोंच मारी, और, आश्चर्य! अंडा टूट गया और उसमें से एक बेहद ख़ूबसूरत हरा पक्षी उड़कर बाहर आया. अपने पंख फड़फडाते हुए वे मेरे ऊपर उड़ते रहे, एक बार नीचे आकर मेरी गोद में बैठे और खूबसूरती से गाते हुए उड़ गए.

अंडा गायब हो गया था. मैं पेड़ से टिककर सो गई. 

“ऐ! उठो!” मेरे पति मुझे झकझोर रहे थे और रंजन की ओर देखकर बोले, “देखो! यह किसी भी हालत में सो सकती है! सचमुच की निद्रालु महारानी.”

मैं उठी और चादरें समेट कर उन्हें बैग में रखा.

क्या यह सब एक सपना था? इस बारे में मैं उनसे कुछ नहीं कह सकती थी. वे मुझे चिढाते रहेंगे. सिद्धों के प्रति मेरे दीवानेपन को वे जानते थे,

पूरे रास्ते कार में मैं यह सोचकर हैरान हो रही थी कि क्या ये एक सपना था, या वाकई में हुआ था. पक्षी का रहस्य तो किसी तरह सुलझ गया था, मैंने सोचा. क्या सचमुच?

हम रास्ते में चाय की टपरी के पास रुके. अच्छा था. हमने कुछ भुनी हुई मसाला मूंगफली भी ली. और कार में वापस बैठे.

मेरे विचार फिर से उसी पवित्र आत्मा की ओर मुड गए, जिससे मैं मिली थी. क्या मैं उससे मिली थी? क्या वह वाकई में था?

अपने सवालों के जवाब मुझे कहाँ मिलेंगे?

“क्या तुम मुझे एक गीला रूमाल दे सकती हो?” मेरे पति ने पूछा.

मैंने बैग खोली और गीले रुमालों का पैकेट बाहर निकाला.

“ये क्या है?

वहाँ, मेरी छोटी सी डायरी और प्रार्थना की किताब के बीच, जो मैं हमेशा अपने साथ रखती हूँ, वह पत्ता चमक रहा था.

जैसे ही मैंने उसे छुआ, बदन में सनसनाहट दौड़ गई.

वह सचमुच में था.

 

*******

No comments:

Post a Comment

सुनहरा अंडा - सम्पूर्ण

  सुनहरा अंडा       लेखिका उषा सूर्या         अंग्रेज़ी से अनुवाद आ. चारुमति रामदास                    ...