Tuesday, 23 May 2023

Golden Egg - 13

 एक नई ज़िंदगी

 

वीणा ने खिड़की से बाहर देखा, आकाश काला और अमंगल प्रतीत हो रहा था.

‘अब किसी भी समय बारिश हो सकती है’, वह फुसफुसाई. उसके दिल में खुशी की लहर दौड़ रही थी.

तेज़ हवा बहने लगी और पेड़ झूलने लगे. पत्ते कंपकंपाने लगे. गुलाब झुक गए. घास के पत्ते एक दूसरे पर गिरकर हवा की लय में नृत्य करने लगे. ऐसा लग रहा था कि बारिश का बड़ी खुशी से स्वागत किया जा रहा था.

मॉनसून हमेशा ही जादू बुनता है.

अब, वह एक फुहार के रूप में आरम्भ हुई. हल्की फुहार मोटी-मोटी बूंदों के रूप में बदल कर, सारे पेड़ों को, झाड़ियों को, पत्तों को, फूलों को और कलियों को भिगोते हुए धरती पर गिरने लगी. लाल धरती पर छोटी-छोटी नदियाँ बन गईं. बड़ी जल्दी पानी के डबरे बन गए. 

वीणा के हृदय में खुशी का एहसास था.

उसे बारिश अच्छी लगती थी. उसे सराबोर भीगना अच्छा लगता था. चेहरे पर और फ़ैली हुई बांहों पर गिरती ठंडी बूंदों को महसूस करना और अंत में पूरी तरह सराबोर हो जाना, कैसी आश्चर्यजनक भावना थी यह, पूरी तरह भीग जाना!

 उसके ख़याल उस विशिष्ठ दिन पर वापस गए, जब बारिश ने पूरी तरह उसके जीवन के प्रवाह को बदल दिया था.

शादी एक महीने में होने वाली थी और सुदीप घर आया था, उसे अपनी नई कार में ड्राइव पर ले जाने के लिए, जो उसने हाल ही में खरीदी थी.

“बारिश होने वाली है, सुदीप. तुम अपनी ड्राइव को कल तक के लिए क्यों नहीं टाल देते? अब चाय पियो और मैं तुम दोनों के लिए गरम समोसे तल देती हूँ,” वीणा की माँ नलिनी ने सुदीप से कहा, जब वह सोफे पर बैठ गया.

“अभी नहीं, आंटी. मुझे मालूम है कि वीणा को बारिश पसंद है. हम आधे घंटे में वापस आ जायेंगे. मुझे एक घंटे के अन्दर घर पहुँचना है, क्योंकि मेरी बहन सरस आज रात को आ रही है.”

वीणा के पैरों में मानो स्प्रिंग लग गई थी, जब वह कार की तरफ जा रही थी.

लव-बर्ड्स की तरह वे लगातार बातें कर रहे थे. सुंदर भविष्य के लिए सपने बुन रहे थे.

सुदीप मसूरी की आई.ए.एस अकादमी में लेक्चरर के पद पर नियुक्त हुआ था. वीणा को मसूरी जाने का ख़याल बहुत अच्छा लगा था क्योंकि वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य ऊटी से बहुत अलग नहीं था, जहाँ वह बड़ी हुई थी.

उसका भी अपना व्यवसाय था. हाँ...वह एक उभरती हुई लेखिका थी और उसके दो उपन्यास ‘बेस्ट सेलर बन गए थे.

ऊटी बहुत प्यारी जगह थी और वीणा के पिता  को विरासत में कुछ ज़मीन मिली थी, जहाँ वे चाय उगाते थे. उनका कुन्नूर में एक कॉफी प्लांटेशन भी था. परिवार छोटा सा था और ज़िंदगी प्लान्टेशन और मज़दूरों की भलाई के इर्द गिर्द ही घूमती थी. उसके माता-पिटा दोनों को पढ़ने का बहुत शौक था और वीणा ने भी पढ़ने का शौक उन्हीं से लिया था. घर के दो कमरों में अलमारियों में किताबें भरी थीं – पुराने क्लासिक्स से साहित्य तक और आध्यात्मिक क़िताबें. नेशनल ज्योग्राफिक मैगजीन्स का बढ़िया कलेक्शन था. सोलह साल की उम्र से वीणा ने लिखना शुरू किया था. कुछ कविताओं से लेकर, जो कुछ मैगज़ीन्स में प्रकाशित हुई थीं, वह कहानियों तथा उपन्यास की ओर मुडी, और उसके दो उपन्यास ‘बेस्ट सेलर हो गए थे. अब वह एक व्यावसायिक लेखिका बन गई थी.

वीणा का जन्म लन्दन में हुआ था और उसने वहाँ प्राइमरी तक पढाई की थी. फिर परिवार भारत आ गया और उसके पिता श्रीधरन ने ऊटी में रहने और अपने पुरखों के चाय और कॉफी के बागानों को संभालने का फैसला कर लिया. श्रीधरन और नलिनी भारत वापस आना चाहते थे और उन्हें यहाँ की पारंपरिक जीवन शैली से प्यार हो गया. वीणा के लन्दन में जन्म लेने का फ़ायदा यह था कि वह ‘क्वीन्स रॉयल कॉमनवेल्थ एस्से कॉम्पीटीशन’ और ‘फोटोग्राफी कॉम्पीटीशन’ में हिस्सा ले सकती थी. उसे फोटोग्राफी का शौक था और वह आज भी उस समय को याद करके खुश होती है, जब चार साल पहले उसे हर मैजेस्टी क्वीन एलिजाबेथ के साथ चाय पर बुलाया गया था, जब उसने ‘फोटोग्राफी कॉम्पीटीशन’ में सिल्वर मैडल जीता था.

उस अवसर पर पूरा परिवार लन्दन गया था.

वीणा सुदीप से ऊटी में डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी में मिली थी और दोनों के बीच बहुत जल्दी प्यार फूलने लगा. मसूरी आई. इ.एस. अकादमी में फैकल्टी मेंबर था सुदीप, और वह अक्सर ऊटी आया करता था, जहाँ उसके पिता का बिज़नेस था. उसके पिता सीधे-सादे इन्सांन थे, मगर माँ बहुत तानाशाह किस्म की और लालची थी. उसने वीणा के रिश्ते को इसलिए मंज़ूर किया था, क्योंकि उसके पिता के चाय और कॉफी के बागान थे, और वीणा लोकप्रिय लेखिका थी. इस औरत के लिए पैसा ही सब कुछ था, जो खुद भी एक बहुत धनी परिवार से थी.

सुदीप बहुत सावधानी से कार चला रहा था, क्योंकि बारिश तेज़ हो गई थी.

जब वे वापस लौट रहे थे, तो वीणा ने एक जगह पर उसे कार रोकने के लिए कहा, क्योंकि उसे बारिश को महसूस करना था. उसने चिडचिडाते  हुए कार रोकी, क्योंकि वह गीला नहीं होना चाहता था. जैसे ही उसने कार रोकी और स्टीयरिंग के पीछे बैठा, वीणा बाहर निकालकर बारिश की बूंदों का मज़ा लूटती रही जो उसके चेहरे पर गिर रही थीं. बारिश कम होने लगी और सूरज ने बादलों से झांकते हुए मुस्कुरा कर कहा, “देखो, कितनी अच्छी तरह नहलाया है मैंने पेड़ों को! कितने   ताज़ातरीन और खुश नज़र आ रहे हैं!” वीणा मुस्कुराई और वापस कार में बैठ गई.

“मुझे ये बिल्कुल समझ में नहीं आता, वीणा...भीगने में तुम्हें बच्चों जैसी खुशी होती है! ऊह!  मैं तो कभी न भीगता, चाहे दुनिया की पूरी दौलत ही क्यों न दे दो,” सुदीप ने कार स्टार्ट करते हुए कहा था.

वह हंसी और बोली,

“मगर मैं खुश हूँ कि तुम मुझे मेरे मन की करने देते हो. सोचो, अगर तुम सनकी होते और मुझे कार से उतरने से मना करते...किसी ‘मेंटल की तरह!!” वह कल्पना में ही काँप गई.

तब वह हुआ....

कार अचानक फिसल गई, झटके से मुड़ गई और रास्ते के एक पेड़ से टकराई. दरवाज़ा झटके से खुल गया और वीणा बाहर फेंक दी गई.

बस, यही आख़िरी बात थी जो उसे याद थी.

जब वह ICU में जीवन से संघर्ष कर रही थी, तो उसे माता-पिता के चिंतामग्न चेहरे याद रहे. ICU के दिन भयानक थे. जल्दी ही उसकी तबियत में सुधार होने लगा; अस्पताल से छुट्टी देने से पहले उसे कुछ दिन किसी और कमरे में रखा गया.

घर आकर वीणा पहली बार मुस्कुराई और उसके माता-पिता के चेहरे खुशी से दमक उठे.

“भगवान वास्तव में महान है और दयालु है,” उसकी माँ ने हौले से कहा.

“अम्मा...सुदीप कैसा है?

उसकी माँ खामोश हो गई.

उसके पिता ने बताया. उनकी आवाज़ में कड़वाहट थी.

“उसके शरीर पर मुश्किल से कोई खरोंच आई होगी. वह बिना किसी चोट के बाहर आया....मगर तुम, मेरी बच्ची...”

उनकी आवाज़ थरथरा रही थी.

बाद में उन्होंने उसे बताया कि सुदीप की शादी किसी और लड़की के साथ पक्की हो गई थी, अमीर घर की लड़की है. वधू सुदीप की माँ के रिश्ते में है. वह कुछ न कर सका. अपनी माँ की दलीलों के आगे हतबल था. अगर सुदीप इनकार करता  तो उसने आत्महत्या करने की धमकी भी दी थी. वह सिर्फ एक बार अस्पताल आया था वीणा को देखने, जिसके बाद वह फिर कभी नहीं आया.

“वीणा, तुम्हें मज़बूत होना होगा. तुम्हारे सामने पूरी ज़िंदगी पडी है. अपना लेखन शुरू करो. उस शौक को वापस लाओ. हम दोनों तुम्हारे साथ हैं. शायद तुम्हारे लिए कोई और है, सुदीप से बेहतर इंसान.” श्रीधरन ने उससे कहा था.

वीणा ने बाहर देखा, बारिश पूरी तरह रुक गई थी. सूरज चमक रहा था. बादल भी बिखर रहे थे.

वह अपनी व्हील चेयर मेज़ के पास लाई. उसे अपनी किताब पर काम करना था.

“गतिशीलता सिर्फ मेरे हाथों में ही नहीं है, वह मेरे दिल में भी है,” उसने अपने आपसे फुसफुसाकर कहा.

 

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