आदमी के रूप में
टोयोटा
इन्नोवा घर से निकलकर रास्ते पर आई और जल्दी ही दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर भागने
लगी. गंतव्य था सरिस्का नॅशनल पार्क.
शिवा को
वन्य-जीवन में बेहद दिलचस्पी थी और उसके बेटे ईश्वर, पत्नी श्रेया और माँ कामाक्षी को भी वन्य जीवन के बारे
में उत्सुकता थी. वे कई बार सरिस्का और अन्य अनेक अभयारण्यों में जा चुके थे, जैसे कोर्बेट नॅशनल पार्क, भरतपुर और पेरियार अभयारण्य. इन सभी जगहों पर शेर
उन्हें चकमा दे रहे थे और अभी वह काफी उत्सुक थे शाही जानवर की कम से कम एक झलक
पाने के लिए.
शिवा के बड़े
भाई भास्कर, उनकी पत्नी
सीमा और बेटा जयंत अपनी सालाना छुट्टियों में अमेरिका से आये थे, और यह ट्रिप
सिर्फ उन्हीं की खातिर थी. दक्षिण भारत के विभिन्न मंदिरों के दर्शन करने में एक
महीना बीत चुका था, और उन्हें वापस
अमेरिका जाने में सिर्फ पंद्रह दिन बचे थे.
“क्या तुमने
लंच-बास्केट रखी, श्रेया?” भास्कर ने पिछले महीने की हरिद्वार ट्रिप को याद करते हुए पूछा, जब बास्केट घर के पोर्च में ही रह गई थी और चार दिनों
में उसमें कैसी फंगस लग गई थी!!
“सबसे पहले
मैंने वही कार में रखी,” और सीमा की ओर मुड़ते हुए उसने कहा, “धन्यवाद,सीमा, जो तुमने अपना परफ्यूम नहीं लगाया. उससे जानवर हमारी
मौजूदगी को भांप जाते हैं और जंगल में काफी गहरे घुस जाते हैं.”
नाश्ते के लिए रास्ते पर कई मॉटेल्स
थे, मगर परिवार को
घर का ही खाना पसंद था.
“क्या हम टाइगर को देख पायेंगे, शिवा अंकल?” जयंत ने
पूछा. वह आठवीं कक्षा में पढ़ता था और अपनी जॉग्रफी की कक्षा के लिए इस ट्रिप पर
आधारित फोटोग्राफ्स सहित एक ख़ूबसूरत लेख लिखना चाहता था.
शिवा ने जवाब दिया, “घबराओ, नहीं, जय. अगर हमें
यहाँ टाइगर नहीं दिखा तो हम कल दिल्ली के जू पार्क में जाकर दस रुपये की टिकट लेकर
उसे देखेंगे.”
दस बजते-बजते वे सरिस्का पहुँच गए.
बच्चे विभिन्न प्रकार के पक्षी,
भौंकने वाला हिरन,
सींगों और कॉलर वाले उल्लू, लोमड़ियाँ, हाथी और बन्दर देखकर बहुत खुश हुए. बड़ी भूरी
गिलहरियाँ, मोर –
जिनमें एक नाच भी रहा था.
उनके सामने वाली जीप कुछ धीमी हुई और
भीतर बैठे लोगों ने पीछे मुड़कर कहा,
“शू! वहाँ एक टाइगर है.”
“ओह! बहुत सारे टाइगर्स,” उनमें से
एक जोर से फुसफुसाया(!)
सामने वाली जीप एक किनारे को हो गई, ताकि यह जीप
भी किनारे से जाते हुए टाइगर्स को देख सके. जैसे ही वे अभयारण्य पहुंचे, उन्हें बैटरी
वाली जीप में जाना पडा, जिससे
शोर और प्रदूषण न हो.
वहाँ एक मादा टाइगर थी, और तीन नन्हें
टाइगर्स, जो
माँ के आस पास खेल रहे थे.
जयंत जोश में आ गया.
वाह! देखने लायक नज़ारा था. कैमरे पर
फोटो खींचते रहे, जब तक
टाइगर-माँ अपने पिल्लों के साथ वहाँ से चली नहीं गई. अब वे एक हिरन के अवशेष देख
सकते थे.
वे आगे चले और जीप एक चट्टान के पास
रुकी जहाँ घनी हरियाली और जल-प्रपात थे. वहाँ हनुमान का एक छोटा सा मंदिर था, जो ‘पांडुपोल
हनुमान’ के नाम से प्रसिद्ध था. कुछ लोग वहाँ हनुमान जी की पूजा करने के बाद कार
में बैठ रहे थे.
वे सब वहाँ उतरे और पुजारी ने पूजा
की. उन्होंने छोटे से झरने से पानी पिया जो निकट ही बह रहा था और अपने पाँव पसारे.
बास्केट निकाली गई और उन्होंने इड़ली, वडे. सूजी का हलवा और पूरियां खाईं. केले और
सैंडविच कोई नहीं खा रहा था. उन्होंने दो-तीन लड़कों को, जो मंदिर के पास बैठे थे
इडली और वडे दिए. जब कामाक्षी ने देखा कि वे चटनी और इडली चाव से खा रहे हैं, तो वह उन्हें और
खाने के लिए कह रही थी. उसे लोगों को चाव से खाते देखना अच्छा लगता था.
“अब अगर हमें अलवर के पास नीमराना
किला देखना है, तो
निकलना चाहिए,” शिवा
ने कहा और वे चलने की तैयारी करने लगे.
हर व्यक्ति शेरों के बारे में बात कर
रहा था. बड़े लोग भी टाइगर दिखने से खुश थे...वह मुश्किल से ही जो दिखाई देता है.
जयंत ने सामने वाली सीट से कहा, “अंकल, ईश्वर को यहाँ
आने के लिए कहिये. हमें उससे बातें करनी हैं.”
एकदम चौंकाने वाली स्तब्धता छा गई और
शिवा चीखा,
“क्या? वह तुम्हारे पास नहीं है?”
“नहीं, अंकल, वह आपके साथ
चल रहा था और मैंने सोचा कि वह वहाँ है.”
ड्राईवर सलीम ने गाडी रोकी.
“सलीम, गाडी वापस ले चलो.”
उसकी आवाज़ में भय था. उन्होंने पचास
किलोमीटर पार कर लिए थे.
श्रेया रोने लगी.
कामाक्षी ने कहा, “डरो मत, बच्ची. मेरे
गणेश भगवान निश्चय ही उसकी रक्षा करेंगे. बस, थोड़ा रुको और देखो, वह वहीं होगा.”
उसने विनायक स्तोत्रं का पाठ शुरू कर
दिया. ..वह सूंड वाले भगवान की पक्की भक्त थी और हमेशा उनका नाम जपती रहती थी.
उन्होंने उसकी कई समस्याएँ सुलझाई थीं.
सीमा ने कहा, “घबराओ नहीं, श्रेया. मैं
भगवान की प्रार्थना कर रही हूँ. वह निश्चित ही हमारे ईश्वर की रक्षा करेगा.” वह
सत्य साईं भगवान की परम भक्त थी और चेन्नाई से आने के बाद पुट्टपर्ती जाकर भी आई
थी.
भास्कर ने कहा, “श्रेया, मैं समझ सकता
हूँ कि तुम क्या महसूस कर रही हो, मगर डरो नहीं. भगवान महान है. बच्चे को कुछ नहीं
होगा.”
“डरो मत, मेमसा’ब. अल्ला अच्छा
करेगा.” सलीम ने पीछे मुड़कर उससे कहा.
गाडी पांडुपोल मंदिर पहुँची.
उसमें ताला लगा था.
जिन लड़कों से वे पहले मिले थे, उनमें से एक
वहाँ था..
“पुजारी कहाँ है? तुमने मेरे
छोटे बच्चे को तो यहाँ नहीं देखा? क्या यहाँ कोई और है?”
“नहीं, सा’ब. मैंने किसी को नहीं देखा. पुजारी
कहीं गया है. वह आता ही होगा.”
श्रेया चुपचाप रो रही थी. कामाक्षी
एक चट्टान पर बैठकर प्रार्थना कर रही थी, उसकी आंखें बंद थीं. सिर्फ झींगुरों की और
चट्टानों से गिरते हुए पानी की आवाज़ सुनाई दे रही थी.
फिर वह आया. वह भी पुजारी जैसा ही लग
रहा था. उसने चाभियों का गुच्छा निकाला और मंदिर का दरवाज़ा खोला.
शिवा ने उसके पास जाकर पूरी बात
बताई. उसने कुछ देर इधर उधर देखा और शिवा और भास्कर को अपने पीछे आने के लिए कहा.
वे उथले झरने के पास गए. पुजारी चलकर दूसरी ओर गया. पेड़ एक दूसरे के बहुत पास थे.
पेड़ों से लताएं लिपटी थीं. तीन मिनट चलने के बाद, वे एक खुली जगह पर आये. पुजारी ने
शिवा से कहा कि बच्चे का नाम लेकर पुकारे.
शिवा की आवाज़ जंगल में गूँज उठी, “ईईईईश्वर!!!”
अचानक खामोशी छ गई और बंदरों की
किटकिटाहट के बाद एक आवाज़ चीखी,
“अप्पा!”
पुजारी आगे चल रहा था. वे उसके पीछे
थे.
वहाँ...
पेड़ के बैठकर ईश्वर ब्रेड और केले
बंदरों को दे रहा था. वह भागकर उनके पास आया.
शिवा ने एक सौ रुपये का नोट पुजारी
की ओर बढाया, जिसने
मंदिर की हुंडी की ओर इशारा किया.
पुजारी की ओर देखते हुए कामाक्षी की
आंखें डबडबा आईं, जो चलते हुए चट्टानों में गायब हो गया था.
इन्नोवा फिर से दिल्ली की ओर चल पडी.
सब खुश थे और बातें कर रहे थे.
ईश्वर कामाक्षी से चिपक गया, जो असाधारण
रूप से खामोश थी.
वह फुस फुसाया, “दादी, क्या तुमने एक
बात देखी? मैंने
देखी. मैं औरों को नहीं बताना चाहता. वे मुझे चिढायेंगे. मेरी बात का यकीन नहीं
करेंगे. पुजारी के कान हाथी के कानों जैसे थे.”
कामाक्षी ने भी उन्हें देखा था.
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