Thursday, 27 November 2025

सुनहरा अंडा - सम्पूर्ण

 

सुनहरा अंडा  

 

 

लेखिका

उषा सूर्या 

 

 

 

अंग्रेज़ी से अनुवाद

आ. चारुमति रामदास

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

अनुक्रमणिका

1.       सुनहरा अंडा 

2.       आदमी के रूप में

3.       यथार्थ

4.       IT

5.      मन्नत

6.      शादी

7.      फ्लाईट

8.       गंदा काढ़ा

9.       क्या ‘वह आई थी?

10.   पेटबोला

11.   खोये हुए बर्तन का रहस्य

12.   मॉनसून मैजिक  

13.   एक नई ज़िंदगी

 

 

सुनहरा अंडा

 

यह सब बहुत थकाने वाला था – पहाड़ पर चढ़ना और झरनों को पार करना, और चट्टानों पर चलना. मगर बहुत प्यारा था. इस पड़ाव का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं.

जब पिछले हफ्ते हमारे दोस्त रंजन ने फोन करके कोल्ली मलाय की ट्रिप का प्रस्ताव रखा तो मैं खुशी से झूम उठी. ये तो मेरा सपना था.

हाँ, मैं भयानक रूप से स्वप्नदर्शी हूँ, कितनी ही बार निराश होने और खुद को बेहद चोट पहुँचाने के बावजूद, मैं सुधर नहीं सकी. आह, सिर्फ मेरा आशावाद ही, जो ‘कुत्ते की पूंछ’ जैसा है, मुझे प्रेरित करता हैं वरना मैं न जाने कहाँ होती.

मैंने सिद्ध पुरुषों (अत्यंत विकसित आत्माएं, जिनके पास आठों सिद्धियाँ होती हैं - अनु.) के बारे में पढ़ा और सुना  था, जिन्होंने कोल्ली हिल्स को अपना निवास स्थान बनाया था. कुछ लोगों को जो आश्चर्यजनक अनुभव हुए थे, उनसे मैं मन्त्र मुग्ध हो गई थी. अपनी ज़िंदगी में कम से कम किसी एक सिद्ध पुरुष से मिलने का सपना मैं देखा करती थी. 

क्या मेरी इच्छा कभी पूरी होगी?

कोल्ली हिल्स जाने का निमंत्रण एक गज़ब का सरप्राइज़ था और हम एक ख़ूबसूरत बादलों से ढंके दिन निकल पड़े. मेरी कल्पना उड़ान भरने लगी और सिद्ध पुरुष से मिलने का दृश्य मेरी नज़र के सामने साकार होने लगा.

हवा साफ़ और शुद्ध थी और हमने अपने भीतर ऊर्जा का अनुभव किया. हल्का सा नाश्ता करके, जो हम अपने साथ लाये थे, हमने सारे पत्ते, पेपर कप्स और प्लास्टिक बैग्स कचरे की थैली में डाले, जिसे हम अपने साथ लाये थे, ताकि आसपास के साफ़-सुथरे वातावरण को खराब न करें. सूर्य बादलों के पीछे छुप गया था और हमें नींद आने लगी.

रंजन ने और मेरे पति ने मिलकर चादरें बिछाईं, जो हम साथ लाये थे और लेट गए, मुझसे यह कहकर, “कुछ देर आंखें मूँद लो, हम चालीस मिनट बाद निकलेंगे.”    

मैंने भी उनसे कुछ दूर, एक बड़े पेड़ के नीचे चादर बिछाई. मेरी आंखों में नींद आने का नाम नहीं ले रही थी. और चालीस मिनट में तो हम वापस घर के लिए चल पड़ेंगे. और इस बार भी कोई सिद्ध पुरुष नहीं...

नहीं...रुको.

मैंने एक आकृति को अपनी ओर आते देखा. एक बूढा, दाढ़ी वाला, कुछ गंदी धोती पहने और कन्धों पर एक कपड़ा ओढ़े. उसके बाएं हाथ में पौधों का एक गुच्छा था.

मैंने उठकर उसकी तरफ देखा. उसकी आंखों में एक ख़ास चमक थी. उसके बालों की एक लट बाएं कंधे पर लटक रही थी. उसके सिर पर पगड़ी थी. चौड़े माथे पर पवित्र भस्म और उसके बीच बड़ा-सा लाल कुमकुम. उसके ऊपर दो पंछी मंडरा रहे थे. मैंने देखा कि एक सांप कुछ देर रुका और फिर फुफकारते हुए सूखे पत्तों में गायब हो गया जो सूखी धरती को ढांके हुए थे. मैंने अपने हाथ जोड़े मानो ‘नमस्कार’ करना चाह रही थी.    

उसने अपना हाथ उठाया, जैसे मुझे आशीर्वाद दे रहा हो. उसने अपनी पोशाक की तहों से कोई चमकती हुई चीज़ निकाली और मेरी ओर बढ़ा दी. मैं खामोश खडी रही.

वो सारे सवाल कहाँ गए, जो मैं ‘उस’ जैसे किसी से मिलने पर पूछने वाली थी?

वो सवाल जिन्हें मैंने अपनी स्मृति की चिप्स में प्रिंट करके रखा था, ताकि मैं किसी विकसित आत्मा से मिलने पर पूछ सकूँ?

शब्द ही नहीं निकल रहे थे.

यह एक अंडाकार चीज़ थी, सोने जैसी चमकती हुई. कोई अंडा?

सच है, जबसे मैंने ‘मेरा कृष्ण कहाँ है’ किताब बार-बार पढी थी, मैं ऐसी ही किसी मुलाक़ात का, और किसी को मुझे ‘शालिग्राम देने का सपना देख रही थी.

मगर ये?

किसी अज्ञात शक्ति से प्रेरित होकर मैंने अपना हाथ बढाया और उस चीज़ को अपनी हथेलियों में रखा.

ठंडा.

बर्फ जैसा ठंडा.   

पंछी उसके ऊपर फड़फड़ा रहे थे. एक उसके उसके कंधे पर बैठा और उड़ गया, हवा में एक चक्कर लगाया और उसकी बांह पर बैठ गया.

मैं वहाँ स्तब्ध खडी थी, जैसे अपनी खोई हुई आवाज़ को पाने में असमर्थ थे मैंने उसे दूर जाते हुए देखा वह घनी झाड़ियों में लुप्त हो गया.

मैं पेड़ के नीचे बैठी थी. अंडा अभी भी मेरी हथेलियों में था. मैंने अपना हैण्डबैग खोलकर अंडे को भीतर सरका दिया. मैंने उस जगह को देखा, जहाँ वह खडा था. ऊपर की टहनियों से टूटकर गोल-गोल घूमता हुआ एक पत्ता उस जगह पर गिरा. उसमें अजीब-सी चमक थी. मैंने आगे बढकर उसे उठा लिया. चमकदार पत्ता भी मेरे हैंडबैग में चला गया.

ओह! मेरी जुबान क्यों जकड़ गई है?

मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं, एक सनसनाहट ने मुझे घेर लिया, नींद का नामोनिशान न था.

मैंने आंखें खोलीं. पत्तों से आसमान ख़ूबसूरत नज़र आ रहा था. फिर मुझे पक्षी दिखाई दिया.

हरा.

मखमली.

अनोखा लग रहा था.

वह कोयल की तरह चिल्लाया, और मेरी खामोशी को बर्बाद कर दिया. ऊफ! कोयल की तरह चिल्ला रहा है? यह क्लोरोप्सिस (लीफ बर्ड) होगा. ‘मुगलूर के शरणार्थी’ का पक्षी, जो सभी पक्षियों की नक़ल करता है और लगातार बर्डमैन और उसकी बीबी का दिल बहलाता है.

मैंने पक्षी की तरफ देखा और फुसफुसाकर पूछा, “तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?

पक्षी नीचे उतर आया और मेरे निकट सूखे पत्तों के ढेर पर बैठ गया, जैसे उसने मेरी बात सुनी हो.

और...वह बोलने लगा.

मैं हैरान रह गई. वह बोल रहा था.

पक्षी ने मेरी तरफ देखा और कहा,

“जब तक सुनहरा अंडा तुम्हारे पास है तुम जानवरों और पंछियों और मछलियों की बोली समझ सकोगी और...”

मुझे एडी मर्फी की फिल्म की याद आई!

पक्षी ने कहानी सुनाई

 हम एक साथ रहते थे, मैं और मेरी प्रियतमा, इन पहाड़ियों पर उड़ा करते... एक हज़ार से भी ज़्यादा वर्ष पूर्व. उस समय जंगल ज़्यादा घने थे और कोई भी मनुष्य इस जगह पर आने की हिम्मत नहीं करता था. सिर्फ सिद्ध पुरुष ही यहाँ थे – बहुत सारे. इस पहाडी पर अनगिनत जडी-बूटियाँ थीं. उनके बारे में सिर्फ सिद्ध पुरुष ही जानते थे. बहुत सारे फल थे. हम दोनों इन पहाड़ियों पर और उसके भी पार उड़ते, यह अतीव आनंद की ज़िंदगी थी. फिर वह हुई एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना.

एक पेड़ के नीचे चींटियों का टीला था और हमने सोचा ही नहीं कि उसके भीतर कोई सिद्ध पुरुष होगा. हाँ, वह अनेक वर्षों से वहाँ तपस्या कर रहा था और उसके चारों ओर टीला बन गया था, जिसने उसे पूरी तरह ढांक दिया था. हमने बेवकूफी से, अपनी खूबसूरती के नशे में चूर, खुशी से जोर-जोर से गाते हुए, उस टीले पर चोंच मारना शुरू किया और कुछ मिनट बाद हमारी चोंचे उस पवित्र आत्मा की जटाओं से टकराईं. उसे टीले के भीतर देखकर हम बुरी तरह चौंक गए. उसकी आंखें खुलीं, वे दमक रही थीं. उसका ध्यान भंग होने के कारण वह क्रोधित था.

“तुम अपना गीत भूल जाओगे,” उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा, “ और जो भी पक्षी तुम्हारे सामने आयेगा, उसकी नक़ल करते हुए उड़ते रहोगे. तुम अपनी प्रियतमा को भी खो दोगे.”

इससे पहले कि हम कुछ कहते, मेरी प्रियतमा गायब हो गई और मैं उसके ऊपर मंडराता रहा, बदहवासी से चीखता रहा, और मैंने महसूस किया कि मैं अपना गाना भूल गया हूँ.”

“उसके बाद क्या हुआ? क्या तुम्हें अपनी प्रियतमा कभी वापस मिलेगी?” मैंने पूछा.”

“हाँ – तुम्हारी मदद से.”

मैं चौंक गई.

पक्षी ने आगे कहा, “सुनहरा अंडा तुम्हें इसलिए दिया गया है, क्योंकि तुम्हें सोने से कोइ लगाव नहीं है. उसे बाहर निकाल कर अपनी हथेली पर रखो. इसके भीतर मेरी प्रियतमा कैद है. सिद्ध पुरुष ने वह तुम्हें इसलिए दिया है, क्योंकि तुम इतनी आसानी से इससे जुदा हो सकती हो, जैसे किसी कपडे के टुकडे से. मुझे अपनी प्रियतमा वापस पाने दो. तुम ज़िंदगी भर सुखी और संतुष्ट रहोगी. प्लीज़, मुझे मेरी प्रियतमा और मेरे गीत वापस दे दो.”

मैंने अपनी बैग से सुनहरा अंडा बाहर निकाला और उसे पंछी की ओर बढ़ा दिया. उसने हलके से उस पर चोंच मारी, और, आश्चर्य! अंडा टूट गया और उसमें से एक बेहद ख़ूबसूरत हरा पक्षी उड़कर बाहर आया. अपने पंख फड़फडाते हुए वे मेरे ऊपर उड़ते रहे, एक बार नीचे आकर मेरी गोद में बैठे और खूबसूरती से गाते हुए उड़ गए.

अंडा गायब हो गया था. मैं पेड़ से टिककर सो गई. 

“ऐ! उठो!” मेरे पति मुझे झकझोर रहे थे और रंजन की ओर देखकर बोले, “देखो! यह किसी भी हालत में सो सकती है! सचमुच की निद्रालु महारानी.”

मैं उठी और चादरें समेट कर उन्हें बैग में रखा.

क्या यह सब एक सपना था? इस बारे में मैं उनसे कुछ नहीं कह सकती थी. वे मुझे चिढाते रहेंगे. सिद्धों के प्रति मेरे दीवानेपन को वे जानते थे,

पूरे रास्ते कार में मैं यह सोचकर हैरान हो रही थी कि क्या ये एक सपना था, या वाकई में हुआ था. पक्षी का रहस्य तो किसी तरह सुलझ गया था, मैंने सोचा. क्या सचमुच?

हम रास्ते में चाय की टपरी के पास रुके. अच्छा था. हमने कुछ भुनी हुई मसाला मूंगफली भी ली. और कार में वापस बैठे.

मेरे विचार फिर से उसी पवित्र आत्मा की ओर मुड गए, जिससे मैं मिली थी. क्या मैं उससे मिली थी? क्या वह वाकई में था?

अपने सवालों के जवाब मुझे कहाँ मिलेंगे?

“क्या तुम मुझे एक गीला रूमाल दे सकती हो?” मेरे पति ने पूछा.

मैंने बैग खोली और गीले रुमालों का पैकेट बाहर निकाला.

“ये क्या है?

वहाँ, मेरी छोटी सी डायरी और प्रार्थना की किताब के बीच, जो मैं हमेशा अपने साथ रखती हूँ, वह पत्ता चमक रहा था.

जैसे ही मैंने उसे छुआ, बदन में सनसनाहट दौड़ गई.

वह सचमुच में था.

 

*******

 

 

 

 

आदमी के रूप में

 

टोयोटा इन्नोवा घर से निकलकर रास्ते पर आई और जल्दी ही दिल्ली-जयपुर राजमार्ग पर भागने लगी. गंतव्य था सरिस्का नॅशनल पार्क.

शिवा को वन्य-जीवन में बेहद दिलचस्पी थी और उसके बेटे ईश्वर, पत्नी श्रेया और माँ कामाक्षी को भी वन्य जीवन के बारे में उत्सुकता थी. वे कई बार सरिस्का और अन्य अनेक अभयारण्यों में जा चुके थे, जैसे कोर्बेट नॅशनल पार्क, भरतपुर और पेरियार अभयारण्य. इन सभी जगहों पर शेर उन्हें चकमा दे रहे थे और अभी वह काफी उत्सुक थे शाही जानवर की कम से कम एक झलक पाने के लिए.

शिवा के बड़े भाई भास्कर, उनकी पत्नी सीमा और बेटा जयंत अपनी सालाना छुट्टियों में अमेरिका से आये थे, और यह ट्रिप सिर्फ उन्हीं की खातिर थी. दक्षिण भारत के विभिन्न मंदिरों के दर्शन करने में एक महीना बीत चुका था, और उन्हें वापस अमेरिका जाने में सिर्फ पंद्रह दिन बचे थे.

“क्या तुमने लंच-बास्केट रखी, श्रेया?” भास्कर ने पिछले महीने की हरिद्वार ट्रिप को याद करते हुए पूछा, जब बास्केट घर के पोर्च में ही रह गई थी और चार दिनों में उसमें कैसी फंगस लग गई थी!!

“सबसे पहले मैंने वही कार में रखी,” और सीमा की ओर मुड़ते हुए उसने कहा, “धन्यवाद,सीमा, जो तुमने अपना परफ्यूम नहीं लगाया. उससे जानवर हमारी मौजूदगी को भांप जाते हैं और जंगल में काफी गहरे घुस जाते हैं.”             

नाश्ते के लिए रास्ते पर कई मॉटेल्स थे, मगर परिवार को घर का ही खाना पसंद था.

“क्या हम टाइगर को देख पायेंगे, शिवा अंकल?” जयंत ने पूछा. वह आठवीं कक्षा में पढ़ता था और अपनी जॉग्रफी की कक्षा के लिए इस ट्रिप पर आधारित फोटोग्राफ्स सहित एक ख़ूबसूरत लेख लिखना चाहता था.

शिवा ने जवाब दिया, “घबराओ, नहीं, जय. अगर हमें यहाँ टाइगर नहीं दिखा तो हम कल दिल्ली के जू पार्क में जाकर दस रुपये की टिकट लेकर उसे देखेंगे.”

दस बजते-बजते वे सरिस्का पहुँच गए.

बच्चे विभिन्न प्रकार के पक्षी, भौंकने वाला हिरन, सींगों और कॉलर वाले उल्लू, लोमड़ियाँ, हाथी और बन्दर देखकर बहुत खुश हुए. बड़ी भूरी गिलहरियाँ, मोर – जिनमें एक नाच भी रहा था.

उनके सामने वाली जीप कुछ धीमी हुई और भीतर बैठे लोगों ने पीछे मुड़कर कहा,

“शू! वहाँ एक टाइगर है.”

“ओह! बहुत सारे टाइगर्स,” उनमें से एक जोर से फुसफुसाया(!)

सामने वाली जीप एक किनारे को हो गई, ताकि यह जीप भी किनारे से जाते हुए टाइगर्स को देख सके. जैसे ही वे अभयारण्य पहुंचे, उन्हें बैटरी वाली जीप में जाना पडा, जिससे शोर और प्रदूषण न हो.

वहाँ एक मादा टाइगर थी, और तीन नन्हें टाइगर्स, जो माँ के आस पास खेल रहे थे.

जयंत जोश में आ गया. 

वाह! देखने लायक नज़ारा था. कैमरे पर फोटो खींचते रहे, जब तक टाइगर-माँ अपने पिल्लों के साथ वहाँ से चली नहीं गई. अब वे एक हिरन के अवशेष देख सकते थे.

वे आगे चले और जीप एक चट्टान के पास रुकी जहाँ घनी हरियाली और जल-प्रपात थे. वहाँ हनुमान का एक छोटा सा मंदिर था, जो ‘पांडुपोल हनुमान’ के नाम से प्रसिद्ध था. कुछ लोग वहाँ हनुमान जी की पूजा करने के बाद कार में बैठ रहे थे.

वे सब वहाँ उतरे और पुजारी ने पूजा की. उन्होंने छोटे से झरने से पानी पिया जो निकट ही बह रहा था और अपने पाँव पसारे. बास्केट निकाली गई और उन्होंने इड़ली, वडे. सूजी का हलवा और पूरियां खाईं. केले और सैंडविच कोई नहीं खा रहा था. उन्होंने दो-तीन लड़कों को, जो मंदिर के पास बैठे थे इडली और वडे दिए. जब कामाक्षी ने देखा कि वे चटनी और इडली चाव से खा रहे हैं, तो वह उन्हें और खाने के लिए कह रही थी. उसे लोगों को चाव से खाते देखना अच्छा लगता था.

“अब अगर हमें अलवर के पास नीमराना किला देखना है, तो निकलना चाहिए,” शिवा ने कहा और वे चलने की तैयारी करने लगे.

हर व्यक्ति शेरों के बारे में बात कर रहा था. बड़े लोग भी टाइगर दिखने से खुश थे...वह मुश्किल से ही जो दिखाई देता है.

जयंत ने सामने वाली सीट से कहा, “अंकल, ईश्वर को यहाँ आने के लिए कहिये. हमें उससे बातें करनी हैं.”

एकदम चौंकाने वाली स्तब्धता छा गई और शिवा चीखा,

“क्या? वह तुम्हारे पास नहीं है?

“नहीं, अंकल, वह आपके साथ चल रहा था और मैंने सोचा कि वह वहाँ है.”

ड्राईवर सलीम ने गाडी रोकी.

“सलीम, गाडी वापस ले चलो.”

उसकी आवाज़ में भय था. उन्होंने पचास किलोमीटर पार कर लिए थे.

श्रेया रोने लगी.

कामाक्षी ने कहा, “डरो मत, बच्ची. मेरे गणेश भगवान निश्चय ही उसकी रक्षा करेंगे. बस, थोड़ा रुको और देखो, वह वहीं होगा.”

उसने विनायक स्तोत्रं का पाठ शुरू कर दिया. ..वह सूंड वाले भगवान की पक्की भक्त थी और हमेशा उनका नाम जपती रहती थी. उन्होंने उसकी कई समस्याएँ सुलझाई थीं.

सीमा ने कहा, “घबराओ नहीं, श्रेया. मैं भगवान की प्रार्थना कर रही हूँ. वह निश्चित ही हमारे ईश्वर की रक्षा करेगा.” वह सत्य साईं भगवान की परम भक्त थी और चेन्नाई से आने के बाद पुट्टपर्ती जाकर भी आई थी.

भास्कर ने कहा, “श्रेया, मैं समझ सकता हूँ कि तुम क्या महसूस कर रही हो, मगर डरो नहीं. भगवान महान है. बच्चे को कुछ नहीं होगा.”

“डरो मत, मेमसाब. अल्ला अच्छा करेगा.” सलीम ने पीछे मुड़कर उससे कहा.

गाडी पांडुपोल मंदिर पहुँची.

उसमें ताला लगा था.

जिन लड़कों से वे पहले मिले थे, उनमें से एक वहाँ था..

“पुजारी कहाँ है? तुमने मेरे छोटे बच्चे को तो यहाँ नहीं देखा? क्या यहाँ कोई और है?

“नहीं, साब. मैंने किसी को नहीं देखा. पुजारी कहीं गया है. वह आता ही होगा.”

श्रेया चुपचाप रो रही थी. कामाक्षी एक चट्टान पर बैठकर प्रार्थना कर रही थी, उसकी आंखें बंद थीं. सिर्फ झींगुरों की और चट्टानों से गिरते हुए पानी की आवाज़ सुनाई दे रही थी.

फिर वह आया. वह भी पुजारी जैसा ही लग रहा था. उसने चाभियों का गुच्छा निकाला और मंदिर का दरवाज़ा खोला.

शिवा ने उसके पास जाकर पूरी बात बताई. उसने कुछ देर इधर उधर देखा और शिवा और भास्कर को अपने पीछे आने के लिए कहा. वे उथले झरने के पास गए. पुजारी चलकर दूसरी ओर गया. पेड़ एक दूसरे के बहुत पास थे. पेड़ों से लताएं लिपटी थीं. तीन मिनट चलने के बाद, वे एक खुली जगह पर आये. पुजारी ने शिवा से कहा कि बच्चे का नाम लेकर पुकारे.

शिवा की आवाज़ जंगल में गूँज उठी, “ईईईईश्वर!!!”

अचानक खामोशी छ गई और बंदरों की किटकिटाहट के बाद एक आवाज़ चीखी,
“अप्पा!”

पुजारी आगे चल रहा था. वे उसके पीछे थे.

वहाँ...

पेड़ के बैठकर ईश्वर ब्रेड और केले बंदरों को दे रहा था. वह भागकर उनके पास आया.

शिवा ने एक सौ रुपये का नोट पुजारी की ओर बढाया, जिसने मंदिर की हुंडी की ओर इशारा किया.

पुजारी की ओर देखते हुए कामाक्षी की आंखें डबडबा आईं, जो चलते हुए चट्टानों में गायब हो गया था.

इन्नोवा फिर से दिल्ली की ओर चल पडी. सब खुश थे और बातें कर रहे थे.

ईश्वर कामाक्षी से चिपक गया, जो असाधारण रूप से खामोश थी. 

वह फुस फुसाया, “दादी, क्या तुमने एक बात देखी? मैंने देखी. मैं औरों को नहीं बताना चाहता. वे मुझे चिढायेंगे. मेरी बात का यकीन नहीं करेंगे. पुजारी के कान हाथी के कानों जैसे थे.”

कामाक्षी ने भी उन्हें देखा था.  

 

                                                                                     ****                              

 

यथार्थ

 

दिव्या आर्ट गैलरी से बाहर आई और कुछ देर सीढ़ियों के पास रुकी.

बात यह नहीं थी कि वह एक बार फिर से जाकर प्रदर्शित वस्तुओं को देखना चाहती थी. बिलकुल नहीं. उसने अपने आप से कहा.

वह घर की ओर चलने लगी.

अभी दोपहर हो चुकी थी, मगर सूरज बादलों के पीछे छुप गया था. दक्षिण की ओर काले-भूरे बादलों का आवरण भारी बारिश की चेतावनी दे रहा था. उसे बारिश अच्छी लगती थी और उसे वे दिन याद आये, जब वह बैग में छाता रखकर पूरी तरह से गीली घर आती थी. मगर वे उसके स्कूल और कॉलेज के दिन थे, और डाँट के साथ गरम गरम रसम देने के लिए घर में अम्मा थी.

उसके दिल में ऊपर वाले आसमान से ज़्यादा अन्धेरा था. “मुझे इस एक्ज़िबीशन को देखने के लिए नहीं निकलना चाहिए था,” उसने सोचा. इन पेंटिंग्स के बारे में रिव्यू पढ़कर इन्हें देखने के लिए आना बेवकूफी थी, जो यथार्थवाद, अतियथार्थवाद, कला के अध्यात्मिक पहलू इत्यादि की प्रशंसा कर रहा था – मॉडर्न आर्ट के बारे में घिसे पिटे विचार, जबकि उसे मालूम था कि यह उसके लिए नहीं है.

वह एक आर्टिस्ट थी. फाईन आर्ट्स की विद्यार्थी. उसे याद आया कि कैसे इन विषयों पर वह किताबें छान मारती थी, और अपनी कक्षा की चारदीवारी में उनके बारे में निबंध लिखा करती थी.

मूर्ख, ढोंगी और पाखंडी...

अपने कॉलेज के दिनों में मैं यह सब थी, उसने सोचा. सिर्फ ज़्यादा नंबर पाने के लिए. ये वो दिन थे जब दिल वाकई में जॉन कॉन्स्टेबल और रेम्ब्राँ के लिए धड़कता था, मगर उंगलियाँ मॉडर्न आर्ट पर पन्ने के पन्ने लिख डालती थीं.

अंत में, हम सभी पाखंडी हैं. मैलापुर से नुन्गबक्कम तक वह इन्हीं ख्यालों में खोई हुई थी. उसे उन कलाकारों पर दया आ रही थी, जो भयानक आर्ट फॉर्म्स; अधूरे प्रसव प्रस्तुत करते थे. 

उसने अपने आप से कहा, “सोसायटी और मीडिया ने ऐसे आर्टिस्टों की तारीफ़ की है. सिर्फ एक सामाजिक पहचान की ज़रुरत होती है, फिर तो आप कुछ भी चीज़ बना दो, उसे एक नाम दे दो, और उसे आर्ट कह दो. अमीरों और प्रसिद्ध लोगों के लिए वक्त गुजारने का साधन! और इसे प्रमोट करने के लिए ‘चमचे’ होते हैं.”      

“ओह! भगवान! मैं यह सब क्यों सोच रही हूँ? क्या मैं उनसे ईर्ष्या कर रही हूँ? क्या इसी को ‘इन्फ़ीरिआरिटी कॉम्प्लेक्स कहते हैं? छिः! नहीं!”

वह हंसी और उसने दरवाजा खोला.

“कितनी जल्दी घर पहुँच गई मैं!”

उसने चहरे पर पानी के छींटे मारे और हमेशा की प्रसन्नता लौट आई.

उसने पलंग के नीचे सरकाई हुई बड़ी सूटकेस खीची. उसे खोलते हुए उसका दिल धड़कने लगा. उसने एक-एक करके अपनी सारी पेंटिंग्स बाहर निकालीं. बारिश में भीगी हुई आदिवासी महिला, ठण्ड से कुछ थरथराती हुई.

पानी का गिरता हुआ झरना और बल खाती हुई नदी. नदी के किनारे पेड़ जिन पर बहार आई थी. चाँद की रोशनी में झिलमिलाता मंदिर का गुम्बज...हर पेंटिंग उसी ने बनाई थी. 

‘अगर मैं भी अपनी एक एक्ज़िबीशन लगाऊँ तो,’ उसने सोचा और हँस पडी. इन्हें देखने की तकलीफ कौन उठाएगा? असल में, क्या कोई आर्ट गैलेरी इन्हें प्रदर्शित भी करेगी? उसे याद आया कि उसने कुछ दिन पहले एक रिव्यू पढ़ा था, जिसमें एक आर्ट-क्रिटीक ने ऐसी प्रस्तुतियों को ‘कैलेण्डर आर्ट कहा था. 

एक असली पेंटिंग एक खामोश कविता होती है. मगर खामोश कवितायेँ कौन पढ़ता है?

टेलीफोन की घंटी बजी. दिव्या फोन लेने के लिए भागी. यह उसके पति, जयंत का फोन था, जो ऑफिस से बात कर रहा था.

“दिव्या, जी.एम. यहाँ अचानक आये हैं. वह हमारे यहाँ डिनर पे आयेंगे. मैं जल्दी पहुँचने की कोशिश करूंगा.”

मिस्टर सिन्हा... उन्हें साउथ इन्डियन खाना पसंद है.

ऊप्स! पापड तलने के लिए नारियल का तेल नहीं है.

उसे याद आया कि नौकरानी बता रही थी, कि चार ब्लॉकस छोड़कर एक बिल्डिंग में नई किराने की दुकान खुली है.

जब तक वह उस दुकान में पहुँची, जो एक फ़्लैट में थी, बारिश की बूँदें गिरने लगी थीं.

काऊंटर पर बैठे बूढ़े आदमी ने मुस्कुरा कर उसका स्वागत किया. आटा छान रही एक औरत के पास एक छोटा बच्चा बैठा था. फ़्लैट के सामने वाले कमरे को दुकान में बदल दिया गया था.

दीवारों पर भूतपूर्व और वर्त्तमान नेताओं की तस्वीरें लगी थीं.

वाह! ये क्या है?

एक ख़ूबसूरत ऑइल पेंटिंग भी थी – एक पहाड़; पेड़ों की पत्तियों के बीच से डूबता हुआ सूरज अपनी चमक बिखेर रहा था; लाल-नारंगी चमक पेड़ों के पत्तों की लहरों पर पड रही थी, जो अब घास के मैदान में बहने लगी थी; सुनहरा स्पर्श...जादुई...

उसने अपने भीतर एक उत्तेजना महसूस की.

बूढा आदमी उसे वापस दुनिया में खींच लाया.

“ये लीजिये, मैडम, एक सौ बीस रुपये.”

उसका दिल गुनगुना रहा था.

उसने बेदिली से अपनी आंखें उस पेंटिंग से हटाईं.

“आपने ये पेंटिंग कहाँ से खरीदी?

‘ओह! वो वाली? मेरे सबसे छोटे बेटे ने बनाई है.”

“क्या एक ही है? क्या कुछ और भी हैं? मतलब, क्या मैं उन्हें देख सकती हूँ?

बूढ़े ने उसकी बात काटी, “इस सब के लिए टाइम कहाँ है? वह सुबह छः बजे जाता है और सिर्फ रात को दस बजे ही वापस आता है.”

“ओह! वह कहाँ काम करता है? किसी स्टूडियो में?

“नहीं, अगले शहर में हमारी एक और दूकान है. जब वह काउंटर पर बैठता है, तो सिर्फ रात को नौ बजे ही वहाँ से उठ पाता है.”

वह उसे टाल रहा था. उसे अन्य ग्राहकों को देखना था. 

“उसे विदेश से ‘इन्वीटेशन मिला था. मैंने सख्ती से मना कर दिया. क्यों वक्त बर्बाद करना है!”

घर की ओर लौटते हुए वह आर्ट गैलरी की बकवास कलाकृतियों को याद कर रही थी. और अतिरंजित तारीफ़; और भीड़.

बारिश की मोटी बूँदें गिरने लगी थीं.

एक लाजवाब, उत्कृष्ट, प्रतिभावान और दैवी कलाकार को आम काउन्टर के पीछे बैठकर पैसे गिनने पड़ते हैं, और उड़द की दाल और इमली जैसी चीज़ों के लिए बिल्स बनाने पड़ते हैं.

उसके दिल में टीस उठी.

 

 

****  

 

 

‘IT’

 

‘IT’ खरीदने के बाद ईश्वर शॉपिंग मॉल से बाहर आया.

उसके शॉपिंग के दिन काफी कम हो गए थे. बाहर वह सिर्फ लाइब्रेरी और गोल्फ लिंक्स में जाता था. उसे किताबें पढ़ना और म्यूजिक सुनना अच्छा लगता था.   

वह रास्ता पार कर रहा था तो उसे एक परिचित आवाज़ सुनाई दी. उसने मुडकर देखा कि डेविड किसी व्यक्ति के साथ नव निर्वाचित अमेरिकन प्रेसिडेंट के बारे में बहस कर रहा था. 

डेविड पुराना दोस्त था, मगर अभी डेविड से मिलने का उसका कोई इरादा नहीं था.

भगवान!! अगर वह मुझे देख ले तो!

डेविड बहुत जिज्ञासु था, वह किसी व्यक्ति के मुँह से वह बात निकलवाने में माहिर था, जो वह छुपाना चाहता. वह जोंक की तरह चिपक जाता और किसी डेंटिस्ट की तरह आपके दिमाग को (न कि मसूड़ों को) सुन्न करके आपके भेद निकलवा लेता. ईश्वर कुछ भी बताना नहीं चाहता था. और डेविड को तो किसी हाल में नहीं. उसके घर पहुँचने से पहले सारी दुनिया को   ‘IT’ के बारे में पता चल जाता.

 ‘IT’ को कमीज़ की जेब में रखे वह खुशी-खुशी घर पहुँचा. जैसे ही उसने बड़े-भारी कम्पाउंड में पैर रखा, वह माधवन से टकराया, जो बगल वाले अपार्टमेंट में रहता था.

“आह! ईश्वर सर! मैंने आपको मॉल में जाते देखा था. मैं आपके साथ आना चाहता था, मगर मुझे घर जल्दी पहुँचना था – मेरी बीबी को फौरन कुछ किराना सामान चाहिए था. आपने क्या खरीदा?” उसने कमीज़ की जेब से बाहर झांकते हुए ‘IT’ को देखते हुए पूछा.

‘सब जानना चाहता है ईडियट,’  ईश्वर मन ही मन बुदबुदाया और बोला,

“ ये? ओह, ये? हुम्...अपने तक ही रखना माधवन. पिछले दो दिनों से सीने में हल्का दर्द महसूस हो रहा था. तुम तो जानते हो कि अगले हफ्ते हम मेरे भाई की शादी के लिए दिल्ली जा रहे हैं, है ना?

अभी फ़ौरन किसी डॉक्टर के पास जाने का मेरा इरादा नहीं है. मैंने बस, कुछ सोर्बिट्रेट टेब्लेट्स खरीदी हैं, अगर दर्द उठे तो. घबराने की कोई बात नहीं है, माधवन. मैं बिल्कुल अच्छा हूँ. इस ट्रिप से पहले मैं घर वालों को परेशान नहीं करना चाहता.”

लिफ्ट में उसने ‘IT’ को कमीज़ और बनियान के बीच सरका दिया. कमीज़ को कसकर बंद करते हुए वह अपने अपार्टमेंट की ओर गया. 

श्री ने दरवाज़ा खोला.     

“तुम कहाँ थे इतनी देर? जाओ, हाथ-पैर धो लो. कॉफी तैयार हो रही है.”

वह उनके बेडरूम में गया और सोचने लगा कि ‘IT’ को कहाँ छुपाये. वह नीचे झुका और ‘IT’ को पलंग के नीचे सरका दिया.

“है! आप क्या कर रहे हो, दादाजी?

ये अरुण था.

नन्हा शरारती बच्चा.

ईश्वर इसीसे तो टकराना नहीं चाहता था.

उसने ऐसा दिखाया जैसे कुछ सिक्के गिरा दिए हों  और उन्हें उठा रहा हो.

“कुछ नहीं, कुछ भी तो नहीं. ये एक रुपये का सिक्का पलंग के नीचे चला गया था और मैंने उसे उठा लिया.. बस.”

अरुण हंसने लगा, “घुटनों के बल झुके हुए तुम इतने मजेदार लग रहे थे. घुटनों और हाथों पर. मैंने सोचा कि तुम पलंग के नीचे छुपने वाले हो.”

“कैसा मज़ाक है?” श्री कॉफ़ी का कप लेकर कमरे में आई.

“तुम्हें उन्हें देखना चाहिए था, अभी. गुडी-मुडी बने हुए...हां हां हां...घुटनों और हाथों के बल...”

“कुछ नहीं, श्री. मैंने बस एक सिक्का गिरा दिया, उसीको बाहर निकाल रहा था.”

“क्या पूरे निकाल लिए? मैं झाडू लगाकर पलंग के नीचे देख लेती हूँ, कि कुछ और सिक्के तो नहीं पड़े हैं.”

“नहीं! नहीं! नहीं! मैंने बस यही एक रुपये का सिक्का गिराया था. बाकी के सब मेरी जेब में हैं.”

“ओके. ओके. मगर इसके लिए इतना परेशान होने की ज़रुरत क्या है?

अरुण गायब हो गया, और ईश्वर कॉफी की चुस्कियां लेने लगा. उसने सोचा कि उसे पलंग के नीचे से ‘IT’ को निकाल कर कहीं और रखना चाहिए.

श्री के जाने के बाद उसने दरवाज़ा बंद किया और फ़ौरन घुटनों पर झुक कर ‘IT’ को बाहर निकाल लिया. उसे निकट ही माधुरी की आवाज़ सुनाई दी और उसने फ़ौरन गद्दा उठाकर ‘IT’ को गद्दे के नीचे रख दिया और पलंग पर बैठ गया.

माधुरी भीतर आई और उसने पूछा, “आपने दरवाज़ा क्यों बंद किया था?

“ओह! कुछ नहीं. कुछ भी तो नहीं. बस यूँ ही. बहुत हवा चल रही है.”

“हवा? चलो भी, अप्पा. खिड़की उस तरफ है और दरवाज़े से तो हवा आती ही नहीं है. ओके, मैं आपको कुछ दिखाना चाहती हूँ, जो मैंने आज सुबह खरीदा है.”

“अभी नहीं, माधुरी. बाद में. अब मैं कुछ देर यहाँ बैठना चाहता हूँ.”

माधुरी ने परेशानी से उसकी ओर देखा. यहाँ बैठना है? किसलिए? उसने कंधे उचकाए और चली गई.

ईश्वर ने गद्दे के नीचे से ‘IT’ को बाहर निकाला और बाथरूम में घुस गया. उसने स्नान किया और एक कुर्ता पहना.

IT’ सुरक्षित था, जेब के भीतर टंका हुआ.

वह पूजाघर में गया. 

उसने माथे पर विभूति लगाई और ‘IT’ को छुपाने के लिए कोई अच्छी जगह ढूँढने लगा.

“आप यहाँ हैं? आप क्या कर रहे हैं, ताता?

‘भाग जा’. उसने मन ही मन अपने पोते को गाली दी.

दरवाज़ा बंद करो और बाहर जाओ, अरुण. मैं कुछ प्रार्थना करूंगा. मैं नहीं चाहता कि कोई परेशान करे.”

अरुण हैरान-सा बाहर गया, वह परेशान था कि न जाने उसके दादा जी को क्या हो गया है! यह पहली बार था, जब वह अपने दादा जी को प्रार्थना करते हुए देख रहा था.

ईश्वर ने कुछ देर इंतज़ार किया.

आह! अब मैदान साफ़ है.

यह सही जगह है. यहाँ कोई भी ‘IT’  को नहीं देखेगा. उसने ‘IT’ को दीपदान वाले लकड़ी के तख्ते के नीचे रखा, जिस पर चांदी का दीप जल रहा था.

थोड़ी देर में वह उठकर बाहर आया.

जब वह और श्री अपने कमरे में चले गए तो ड्राइंग रूम असाधारण रूप से सजीव हो उठा : अरुण और श्री बालाजी को ईश्वर के बारे में बता रहे थे.

“अप्पा, दादा जी को कुछ हो रहा है. वह घुटनों के बल झुककर पलंग के नीचे देख रहे थे! और बोले कि उन्होंने एक सिक्का गिरा दिया है, जिसे वे बाहर निकाल रहे हैं.”

बालाजी ने, जो इंडिया-श्रीलंका एक दिवसीय मैच के हाईलाइट्स देख रहा था, अपनी आंखें अरुण की ओर घुमाईं.

“गिरे हुए सिक्के को ढूँढने में अजीब क्या है? इसमें गलत क्या है?” वह कुछ तैश में बोला.

“मैं भी सोच रही हूँ, कि अप्पा को कुछ हो रहा है,” माधुरी ने अपने ससुर के बारे में पुश्ती जोड़ी.

वह बिस्तर पर बैठे थे, कुछ कर भी नहीं रहे थे और बोले कि वे वहीं कुछ देर अकेले रहना चाहते हैं.”

बालाजी हँस पडा.

“छोडो भी, मधु, वह जहाँ जी चाहे बैठ सकते हैं, है ना? तुम लोग कुछ अजीब ही तरह से बर्ताव कर रहे हो. तुम दोनों को ही कुछ हो गया है...”

“नहीं अप्पा! क्या तुमने कभी दादा जी को पूजाघर में बैठे देखा है? तो, वो वहाँ थे. और उन्होंने मुझे दरवाज़ा बंद करके जाने के लिए कहा. बोले, कि ध्यान करना है!! इसका क्या जवाब है आपके पास?

बालाजी ने जवाब नहीं दिया. अप्पा क्या कर रहे हैं?

अब वह भी कुछ परेशान हो गया. क्या अप्पा को पूजाघर में जाकर देखूँ, ध्यान करते हुए!!

फोन की घंटी बजी और बालाजी ने रिसीवर उठाया.

“ओह, माधवन अंकल? कैसे हैं आप?

“........”

“ऐसी बात है?

“..........”

“नहीं, मैं उन्हें नहीं बताऊँगा कि आपने फोन किया था. बहुत अच्छा किया आपने, जो मुझे बताया.”

उसने रिसीवर रख दिया.

“माधुरी, अरुण, तुम लोग ठीक कह रहे थे. शायद अप्पा ने सोर्बिट्रेट टेब्लेट्स खरीदी हैं...पता है ना, जिन लोगों को हार्ट की प्रॉब्लम होती है. वह हमसे कुछ छुपा रहे हैं. माधवन अंकल बता रहे थे कि अप्पा के सीने में कुछ दर्द है.”     

अरुण सीधे पूजाघर में गया और चारों और टेबलेट्स की स्ट्रिप्स ढूँढने लगा, अगर वह स्ट्रिप्स पूजाघर में हों तो... उसे कुछ नहीं मिला. आखिर में उन तीनों ने फैसला किया कि अगले दिन इस बारे में बात करेंगे.

मेज़ लग चुकी थी और पूरा परिवार नाश्ते के लिए इकट्ठा हो गया था.

जब ईश्वर भीतर आया, तो सब वहीं थे : उसकी पत्नी श्री, बेटा बालाजी, बहू माधुरी और पोता अरुण.

उसने सोचा कि सभी बेहद चुप हैं. माधुरी ने उसकी प्लेट में दो इडलियाँ परोसीं.

“आज कुछ मीठा क्यों नहीं है, मेरी बच्ची? आज वेलेंटीन डे है, और तुमने मुझे बालाजी की गिफ्ट नहीं दिखाई. क्या भूल गईं?

वह उसके पिता के समान था.

“अच्छा, गिफ्ट बाद में दिखाना, मगर स्वीट कहाँ है?”

वह रोने लगी.

“आपने हमसे छुपाया क्यों, अप्पा? जैसे आपकी तबियत के मुकाबले में दिल्ली की ट्रिप ज़्यादा ज़रूरी है?”

“तुम क्या कह रही हो?” ईश्वर ने पूछा.

श्री परेशान हो गई.

“क्या आपकी तबियत ठीक नहीं है?” उसने पूछा.

बालाजी ने कहा:

“कल रात को माधवन अंकल ने फोन किया था और कहा कि आपने सोर्बिट्रेट की टेब्लेट्स खरीदी हैं....”

ईश्वर ठहाका मारकर हँस पडा!! वो चिपकू माधवन!! मुझे उसके बारे में सोचना चाहिए था!!

“शांत रहो, सब लोग. मैं आप लोगों की ही तरह एकदम तंदुरुस्त हूँ,” उसने कहा.

“आप क्या छुपा रहे थे, ताता?

ईश्वर उठा और पूजाघर में गया, वह ‘IT’ लेकर बाहर आया.

“श्री के साथ शादी हुए बावन साल हो गए. मैंने उसे किसी भी मौके पर कोई गिफ्ट नहीं दिया. मैंने सोचा कि इस वेलेंटीन डे पर उसे कोई गिफ्ट दूँगा, जैसा बालाजी पिछले पंद्रह सालों से कर रहा है.”

उसने वह छोटा पैकेट खोला और श्री के हाथ में छोटा सा मखमली बैग रखा.

उसमे ख़ूबसूरत ईयर-रिंग्स का सेट था

...सोने में जड़े हुए हरे पत्थर.

‘हैपी वेलेंटीन डे,” उसने श्री से कहा.

वह बेटे की ओर देखकर मुस्कुराया, यह कहते हुए, “हार्ट प्रॉब्लम? IT is!!!”

बूढ़े आदमी का पहला वेलेंटीन गिफ्ट अपनी बूढ़ी पत्नी को!!

हाय!!! रोमांस देर से ज़रूर आ सकता है! मगर कभी ख़त्म नहीं होता.

 

***  

 

मन्नत

चेन्नई सेन्ट्रल रेल्वेस्टेशन के प्रवेश द्वार से कंपार्टमेंट तक जाना बहुत मुश्किल था. लोगों की भीड़ उमड़ी पड़ रही थी. ऐसा लग रहा था मानो पूरे शहर की आबादी स्टेशन पर आ गई हो.

चंद्रू एक छोटी सूटकेस और एक ट्रेवल बैग लिए हुए था. उसकी पत्नी ज्योति के दाएं कंधे पर भी एक ट्रेवल बैग थी, वह अपने बेटे का हाथ पकडे हुए उसे करीब-करीब घसीट रही थी. उसकी सत्तर साल की माँ के हाथ में भी एक बैग था और वह बडबडाते हुए इनके साथ-साथ चलने की कोशिश कर रही थी:

“इसीलिये मैं हमेशा कहती हूँ कि ट्रेन पकड़ने के लिए एक घंटा पहले निकलना चाहिए. देखो, सिर्फ पंद्रह मिनट बचे हैं.”

श्श्,चुप, अम्मा. तुम्हारा दामाद (मतलब उसका पति) सुन लेगा. वैसे भी उन्हें पोर्टर्स पर गुस्सा आ रहा है जो इन तीन बैग्स को ले जाने के लिए दो सौ रुपये मांग रहे थे.”

भरत भुनभुना रहा था, “मेरे पाँव दर्द कर रहे हैं. हमें इतना क्यों चलना है? तुम मुझे उठाती क्यों नहीं हो? 

 आखिरकार वे अपने कम्पार्टमेंट तक पहुंचे और भीतर घुस गए.

लोग पहले से ही बैठ चुके थे, चंद्रू ने बैग्स को सीट्स के नीचे धकेला. भरत खिड़की के पास बैठा अपनी नानी और माँ के साथ और चंद्रू सामने वाली खिड़की के पास बैठ गया.

“मुझे ये खिड़की खोलना है,” भारत ने जोर से कहा.

“ए.सी. कम्पार्टमेंट में खिड़की नहीं खोल सकते, बेटा. इसमें खिड़कियाँ सील की हुई होती हैं.”

“मगर मुझे बंद खिड़की नहीं चाहिए. इसे अभ्भी खोलो.”

“दामाद जी, आपको ऑर्डिनरी सेकण्ड क्लास में टिकट लेनी चाहिए थी. बच्चा ट्रिप का मज़ा उठाता.”

चंद्रू ने त्योरी चढ़ाकर अपनी सास की ओर देखा, “पसीने के मारे हम मर जाते.”

सौभाग्य से तभी ट्रेन चल पडी और भरत खिड़की से बाहर दृश्यों को तेज़ी से गुज़रते हुए देखता रहा.

टी टी ई ने उनके टिकट चेक किये और चला गया. ज्योति ने बैग खोला और खाना निकाला. माँ और चंद्रू की तरफ इडली के दो डिब्बे बढ़ा दिए. एक और डिब्बा निकालकर वह भरत को खिलाने लगी. दो इडलियाँ खाने के बाद बच्चे ने और खाने से इनकार कर दिया और वह खुद खाने लगी.

उसकी माँ बडबड़ा रही थी, “तुम इडली पर पानी छिड़कना भूल गईं. गले में अटक रही हैं.”

हर बात में मीन मेख निकालने वाली बूढ़ी औरत को गला घुटकर मरते हुए देखकर चंद्रू मन ही मन मुस्कुराया. खयाली पुलाव.

भरत अचानक अपनी सीट से उठा और सामने वाली सीट की ओर लपका. एक अधेड़ आयु के दंपत्ति डिनर कर रहे थे – एग-बिरयानी. वह उनकी ओर देखता हुआ खडा रहा – उसकी माँ को बहुत अटपटा लग रहा था.

“भरत, यहाँ आओ,” उसने हुक्म दिया.

भरत उनसे पूछ रहा था, “आप क्या खा रहे हैं? इसकी अलग खुशबू क्यों है? क्या मैं ये गेंद ले सकता हूँ?” वह बिरयानी के अंडे की ओर इशारा कर रहा था.

ज्योति की माँ घबरा कर उठी. उसने भरत को दूर खींचने की कोशिश की.

“ये अच्छी आदत नहीं है. तुम्हें लोगों से पूछना नहीं चाहिए कि वे क्या खा रहे हैं. और हम इस तरह का खाना नहीं खाते – अंडा वगैरह.”

“क्या वो अंडा है? अंडा क्या होता है?

उस आदमी ने कहा, “कोई बात नहीं, दादी जी, वह बच्चा है. मेरे बच्चे, यह हमारा खाना है और तुम्हें इसे नहीं खाना चाहिए.” वह देख रहा था कि वह एक कट्टर महिला है.

“मगर क्यों?

वह नानी से छिटकने की कोशिश कर रहा था.

“ओके. ऐसा सरकारी नियम है ट्रेनों में. हरेक को सिर्फ अपना ही खाना खाना चाहिए. अगर तुमने इसे खाया तो तुम्हें पुलिस पकड़ लेगी.”

ज्योति उनकी तरफ देखकर मुस्कुराई, उन्होंने बड़ी चतुराई से हालत को संभाल लिया था.

“मुझे जाना है,” बच्चे ने अपनी छोटी उंगली उठाई.

चंद्रू अपनी सीट से उठा और ज्योति ने उसे रोकने की कोशिश की.

“मैं जाती हूँ. वह हमेशा ऐसा ही कहता है और पॉटी करके आयेगा.”

“नहीं, अम्मा, मैं पॉटी नहीं करूंगा. मुझे अप्पा के साथ टॉयलेट जाना है.”

चंद्रू उसे टॉयलेट ले गया.

बच्चे ने पॉटी ही की.

चंद्रू उसे अकेला छोड़कर अपनी पत्नी को बुलाने नहीं जा सकता था. उसने अपने आप को गालियाँ दीं. अब उसे बच्चे को साफ़ करना पडेगा...जो उसने पहले कभी नहीं किया था. उसने तो छुटपन में उसकी नैपीज़ भी नहीं बदली थीं. 

“हो गया, अप्पा.”

उसने बच्चे से खड़े होने के लिए कहा.

“मगर अम्मा तो मुझे बैठे हुए ही धुलाती है.”

“मैं तुम्हारी अम्मा नहीं हूँ! सुन रहे हो? अब खड़े हो जाओ!!”

बच्चा ठिनठिनाने लगा और चंद्रू ने कठिन काम शुरू किया.

इस बीच ज्योति को पूर्वानुमान हो गया कि उसका बच्चा शायद महान काम करने वाला है, और वह टॉयलेट की ओर गई और दरवाज़ा भडभड़ाने लगी. (उसने सोचा कि चंद्रू बच्चे को  वेस्टर्न टॉयलेट ले गया होगा). कुछ देर में दरवाज़ा खुला और एक लाल चहरे वाले, परेशान सरदारजी नज़र आये, जो गुस्से से उसकी ओर देखते हुए निकल गए.

वह चुपचाप अपनी सीट पर लौट आई, वह नहीं चाहती थी कि चंद्रू को इस गड़बड़ का पता चले. फिर तो उसका कोई अंत ही नहीं होता.

बच्चे की जीन्स और उसकी टी शर्ट का निचला हिस्सा पूरी तरह गीले हो गए थे. उसे उसकी ड्रेस बदलनी पडी.

मैं ऊपर जाकर सोना चाहता हूँ,” भरत चिल्लाया.

नहीं, जैसा कहता हूँ वैसा करो. तुम नीचे सोना. अगर ऊपर गए तो गिर जाओगे,” चंद्रू ने कठोरता से कहा. वह अभी भी बेटे को ‘साफ़ करने’ के अनुभव से उबरा नहीं था.

“नईईईईईईईई...मैं वहाँ सोना चाहता हूँ,” अपने निर्णय पर जोर देते हुए वह चीखा.

“तुम वहाँ नहीं सो सकते, भरतु,” नानी ने उसे शांत करने की कोशिश की, “वहाँ पूछन्दी (राक्षस) है, जो बच्चो को निगल जाता है.”

“तुम्हारी माँ बच्चे के दिमाग में यह सब बकवास क्यों भर रही है?” चंद्रू ने हौले से दखल दी.

ज्योति ने पलट कर जवाब दिया, “ओके, स्कॉलर. अगर कर सकते हो, तो उसे वैज्ञानिक तरीके से समझाने की कोशिश करो. उसे एक लेक्चर दो. मैं सोने जा रही हूँ.”

आखिर में नानी से एक कहानी सुनते हुए बच्चा सो गया.

वह किसी फ़रिश्ते की तरह लग रहा था.    

ये तो मैंने आपको बताया ही नहीं कि यह यात्रा किस लिए थी.

तीन साल पहले एक वायरल अटैक में बच्चा लगभग मरते-मरते बचा था, तब उसकी उम्र थी सिर्फ डेढ़ साल. और ज्योति की माँ ने मन्नत मानी थी कि बच्चे के वज़न के बराबर मक्खन किसी एक विशेष मंदिर में अर्पण करेंगी. वह अपनी बेटी और दामाद से कहती आ रही थी कि वे जाकर मन्नत पूरी करें, मगर चंद्रू टालता जा रहा था.

और, वह एक महीना पहले गांव से उनके पास आ धमकी और उनके पीछे पड़ गई. आखिरकार उसे सफलता मिल ही गई, चंद्रू की नाराज़गी के बावजूद.
“आखिर ये बुढ़िया औरों के लिए मन्नत क्यों मांगती है और हमें मुसीबत में डालती है
?” उसने ज्योति से शिकायत की थी.

“क्या तुम्हें याद है कि भरत की हालत कितनी गंभीर थी? अगर उसने वह मन्नत न मानी होती तो, क्या तुम सोचते हो कि बच्चा आज हमारे साथ होता? तुम ऐसा ही कहते हो. आखिर तुम्हारे माँ-बाप तो मन्नतों और मंदिर की ट्रिप्स की कोई कदर ही नहीं करते. तुम्हारा परिवार तो अधार्मिक है.”

चंद्रू खामोश रहा.

कुछ और कहता तो उसके माँ-बाप का भी बातचीत में ज़िक्र हो जाता.

वह परेशान हो रहा था कि तौलने के दौरान भरत मंदिर की बड़ी भारी तराजू पर खामोशी से बैठेगा या नहीं.  

जब उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया तो वहाँ भक्तों की भारी भीड़ थी.

“हमें इन दिनों में नहीं आना चाहिए था. मेरे दोस्त बता रहे थे कि मंदिर में अय्यप्पा भक्तों की बाढ़ आई होगी. तुम्हारी माँ ने जिद की. तुम्हारा दिमाग कहाँ गया था?

चंद्रू दबी आवाज़ में बडबडाया, ताकि सिर्फ उसकी पत्नी ही सुके.

“थोड़ा धीरज रखो. भगवान की कृपा से हमें जल्दी दर्शन हो जायेंगे.”

“ओह! क्या इस बारे में भी भगवान से बात कर ली है? अगर वह हमें शीघ्र दर्शन दे, तो तुमने क्या मन्नत मानी है?”

वह चुप रही.

“अम्मा, मुझे पानी चाहिए.”

“बच्चे, तुम अभी पानी नहीं पी सकते. हम मंदिर के बिलकुल पास हैं. हम भगवान की पूजा करेंगे और बाहर आने के बाद तुम्हारे लिए कूल-ड्रिंक खरीदेंगे.:

“मगर मुझे अभ्भी कूल ड्रिंक चाहिए.”

तभी भीड़ में धक्का-बुक्की हुई और बच्चा बिसूरने लगा.

चंद्रू का चेहरा लाल हो रहा था.

एक भले पुजारी ने, जो उनकी परेशानी देख रहा था, उन्हें एक ओर को खीचा और एक बगल वाले प्रवेश द्वार से जाने के लिए कहा.

बूढ़ी औरत भाव विभोर हो गई.

“दामाद जी, आपकी कृपा से आज मुझे बहुत अच्छे दर्शन हुए. भगवान आप पर कृपा करे. मुझे तो अब जीवन में किसी चीज़ की ज़रुरत नहीं है. बस मोक्ष ; मुझे सिर्फ मोक्ष चाहिए,

चंद्रू फिर ख्यालों में मुस्कुराया, ‘तथास्तु’ वह बुदबुदाया.

मन्नत पूरी करने वालों की लाइन बड़ी थी. काली धोतियों वाले भक्त मन्त्र पढ़ते हुए उमड़े पद रहे थे.

“मुझे लिम्का चाहिए.”

“यहाँ लिम्का नहीं है, बच्चे. पहले तुम्हारा वज़न कर लेंगे और फिर मैं तुम्हारे लिए एक कूल ड्रिंक और खिलौनों की दूकान में एक नई कार खरीदूंगी.”

बच्चे ने तराजू के पलड़े पर बैठने से साफ़ इनकार कर दिया. मनाना, धमकाना, चिल्लाना – कुछ भी काम न आया.

पेप्सी (जिसकी उनके घर में सख्त मनाही थी) की, नई खिलौने वाली कार ही, नई ड्रेस की  रिश्वत – कुछ भी काम न आया.

एक सिक्यूरटी गार्ड, जो यह सब देख रहा था उनके पास आया और कडाई से बच्चे की ओर देखते हुए उसने ऑर्डर दिया:

“फ़ौरन इस पलड़े पर बैठ, नहीं तो मैं तुम्हें जेल में डाल दूँगा.”

बच्चा चुपचाप पलड़े पर चढ़ गया और वहाँ बैठ गया.

जब सफ़ेद मक्खन के पैकेट्स तराजू के दूसरे पलड़े पर रखे जा रहे थे, तो वह मुँह बनाए बैठा रहा.

जैसे ही सिक्यूरिटी गार्ड दूर गया, चंद्रू बडबडाया, “ईडियट, बेवकूफ. उसका चेहरा तो देखो!!” 

“देखो, कितनी बार मैंने तुमसे कहा है कि बच्चे के सामने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल मत करो!! अगर वह सिक्यूरिटी गार्ड सुन लेता तो? तुम्हारी और तुम्हारे पिता का ये बौद्धिक घमंड है. तुम्हारे लिए तो, तुम्हें छोड़कर बाकी सब ईडियट्स और बेवकूफ हैं.” ज्योति चंद्रू पर चिल्लाई.

“चुप रहो, ज्योति, लोग देख रहे हैं,” उसकी माँ फुसफुसाई.

यह महान यंत्रणा आखिरकार पूरी हुई.

अब उन्हें वाकई में भूख लगी थी और वे अपने हॉटेल के रेस्टारेंट में घुसे.

“मुझे नूडल्स चाहिए.”

“यहाँ तुम्हें नूडल्स नहीं मिलेंगे, भरत, वे सिर्फ चावल देते हैं. जो दिया गया है, वही खाओ.” चंद्रू की आवाज़ कठोर थी.

“मगर मुझे आज चावल नहीं खाना है. मुझे नूडल्स चाहिए. तो फिर, क्या मैं सैंडविच ले सकता हूँ?

“वो सब यहाँ नहीं मिलेगा, बच्चे. जब हम घर पहुँच जायेंगे, तो अम्मा जो चाहोगे, बना देगी. ओके?

“बच्चे को जंक फ़ूड दे-देकर बिगाड़ दिया है,” चंद्रू बीच में टपक पडा.

वेटर खाने की तीन थालियाँ लाया और एक छोटी प्लेट में चावल, दाल और पापड.

भरत ने वेटर से पूछा,

“क्या तुम्हारे पास रंगीन चावल है, अंडे के साथ?

वेटर ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं. अगर तुम ये सब खा लोगे तो मैं तुम्हें एक मिठाई दूँगा.”

खाना बड़ी देर तक चलता रहा, इसके बाद वे हॉटल से ‘चेक आउट’ करके स्टेशन के लिए निकले.

“सुनो, दामाद जी. ये यात्रा मेरे लिए बहुत अच्छी थी. देखो...भगवान दयालु है. अगर तुम बीमारी या मुसीबत के दौरान उससे कोइ मन्नत मांगते हो, तो वह तुम्हारी सारी तकलीफे दूर करता है. वासु से (चंद्रू का छोटा भाई, जिसके लिए वे जोर शोर से एक अच्छी बहू की तलाश कर रहे थे) कहना कि वह तिरुपति में बाल देने की मन्नत मांगे. उसे एक सुन्दर पत्नी मिलेगी, बिल्कुल पद्मावती देवी जैसी.”

जब वे कम्पार्टमेंट में बैठ गए तो चंद्रू ने अपनी पत्नी से कहा,

“अगर तुम्हारी माँ ने फिर कोई मन्नत मांगी, तो मैं तुम्हें तलाक दे दूँगा!!! ये सब पूरी ज़िंदगी याद रहेगा!! मैं सच कह रहा हूँ.”

और गर्भ गृह में भगवान मुस्कुरा रहे थे.

 

*****  

 

 

 

शादी

ज्योति ने भरत को सुलाया ही था कि उसे नीचे से कार की जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई दी.

यह चंद्रू था, जो दिन भर के काम के बाद वापस लौटा था. पिछले एक हफ्ते से इंटरव्यू चल रहे थे और चंद्रू को प्रमोशन और ट्रांसफर की उम्मीद थी.

उसने दरवाज़ा खोला, मुस्कुराते हुए चंद्रू भीतर आया. जूते उतारते हुए उसने ज्योति की तरफ देखा और कहा,

“हमें दिल्ली जाना होगा, मुझे वहाँ सेन्ट्रल ऑफिस में पोस्टिंग दी गई है.” 

वह बहुत खुश हो गई. वह इसलिए खुश थी, क्योंकि दिल्ली आगरा के पास है. उसका सपना था कि ताज महल देखे. और बेशक, काश्मीर भी बहुत दूर नहीं था.

डिनर के बाद वे अगले प्लान के बारे में चर्चा करने लगे – शिफ्ट करने के बारे में. चंद्रू तो जैसे सातवें आसमान पर था.

“मैनें सोचा था कि पीटर को ही यह पोस्ट मिलेगी, मगर मेरा रेकॉर्ड देखने के बाद, दिल्ली के बड़े अफसरों ने मेरी फरमाइश की.”

ज्योति ने सोचा कि शादी के इन्विटेशन के बारे में बात करने का यही सही समय है. वेडिंग कार्ड उसे सुबह मिला था. उसे मालूम था कि इस समय चंद्रू किसी भी बात के लिए तैयार हो जाएगा.

“उससे पहले हमें एक शादी में जाना है. मुझे मामा से इन्वीटेशन और एक व्यक्तिगत पत्र भी मिला है, उनके बेटे की शादी है.”

“कौनसे मामा? कोट्टायम के जोकर मामा?

उसने गुस्से का नाटक करते हुए कहा,

“तुम मेरे रिश्तेदारों के बारे में एक भी अच्छा शब्द नहीं बोल सकते. पत्र लिखा है मेरे बड़े मामा ने, जो हमारी शादी में इसलिए नहीं आ सके थे, क्योंकि मामी बीमार थी और वह उसे छोड़कर नहीं आ सकते थे. वह तुमसे मिले नहीं हैं और चाहते हैं कि हम लोग शादी में आयें. शादी दुल्हन के गाँव में है, उसके नाना जी के पुश्तैनी घर में.”

“तुम्हारा भी तो वहाँ पुश्तैनी मकान है, है ना?

“हाँ, मामा का ‘साला वहाँ अपने परिवार के साथ रहता है. मामा की कोइम्बतूर में टेक्सटाइल शो-रूम है और एक बड़ा बंगला है. छुट्टियों में हम वहाँ जाया करते थे. बेटे ने वहाँ एक और शो-रूम खोला है, और उसीकी शादी है.”

“क्या ख़याल है, पलक्काड के लिए टिकट मिल जायेंगे?

“चलो भी. शादी अगले महीने है, तुम्हारे दिल्ली में जॉइन करने से पूरे पंद्रह दिन पहले. हम कोयम्बतूर तक कार से जा सकते हैं. मामा ने दो बसें बुक की हैं, और हम सब एक साथ जा सकते हैं, जैसा उन्होंने कहा है. गाँव पलक्काड से आगे है, गुरुवय्यूर की तरफ. तुम मामा के घर में कार छोड़ सकते हो.”

“ये अच्छा रहेगा, भरत को गाँवों से होकर बस का सफ़र करना अच्छा लगेगा. उसने गाँव देखे ही नहीं हैं.”

“हाँ, और अम्मा भी वहाँ होगी.”

“मगर तुम्हारी अम्मा कोयम्बतूर में क्यों होगी? तुम्हारे गाँव से यह दूसरा वाला गाँव बस कुछ ही किलोमीटर्स तो दूर है ना?

“मामा चाहते हैं कि एक बड़े व्यक्ति के नाते अम्मा वहाँ रहे, कुछ चीज़ों की देखभाल के लिए.”

अगले दिन उसने अपने मामा को फोन किया और अपने कोयम्बतूर पहुँचने के प्लान के बारे में बताया. उसने अपनी माँ से भी बात की, चंद्रू के प्रमोशन और दिल्ली ट्रांसफर के बारे में भी बताना नहीं भूली.

“वे एक बहुत पॉश कॉलनी में क्वार्टर भी दे रहे हैं,” उसने कुछ गर्व से कहा.

ज्योति बहुत खुश थी कि चंद्रू ने उसकी हर बात मान ली थी. वह ‘राशी सिल्क हाउस’ गई और मामी के लिए एक साडी और मामा के लिए ज़री का पंचा खरीदा. जिस ममेरे भाई की शादी थी उसके लिए एक अच्छा सा वैलेट खरीदा. आखिर वह काफी अच्छे पैसे कमाता था!!

और  

माँ-बाप और बेटा कार से कोयम्बतूर पहुंचे.

भरत को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए इसकी सख्त हिदायत के साथ एक पूरी लिस्ट दी गई.

मामा के घर में उनका शानदार स्वागत किया गया. किट्टू मामा को अपनी बहन से चंद्रू के प्रमोशन के बारे में पता चला था और दामाद की पोस्टिंग और उसका दिल्ली ट्रांसफर शेखी मारने की बात थी.               

ज्योति ने एक ट्रे मांगी और उसमें साडी और धोती रखी और तीनों ने मामा और मामी के चरण स्पर्श किये. साड़ी पर छः इंच का ज़री का बॉर्डर देखकर मामी की आंखें चमक उठीं. उसने साड़ी उठाकर चुपके से उस पर हाथ फेरा, मानो देखना चाहती हो कि प्युअर सिल्क है या नहीं. अगले दिन सुबह-सुबह वे दो बसों में निकले, करीब सत्तर लोगों का ग्रुप था – मित्र और रिश्तेदार. भरत ज्योति की गोद में गहरी नींद सोया था और किट्टू मामा लगातार पान की पीक कमीज़ पर उड़ाते हुए चंद्रू से बातें कर रहा था. चंद्रू के कान लाल हो रहे थे और ज्योति मन ही मन घबरा रही थी कि कहीं वह उसके मामा को झिड़क न दे.

“मामा, तुम एक झपकी क्यों नहीं ले लेते? जैसे ही हम वहाँ पहुंचेंगे, तुम्हारे लिए काफी काम होगा. तुम कल रात भी मुश्किल से ही सोये थे,” उसने सुझाव दिया.

“ना-ना-ना, ज्यो! अब कुछ ही देर में हमें ओट्टापालम रुकना है ब्रेकफास्ट के लिए. मेरे बचपन के दोस्त का होटल है वहाँ पर और जब भी हम इस गाँव से गुज़रते हैं, हम वहीं ब्रेकफास्ट करते हैं.”

“अम्मा,” जैसे ही वे बस से उतरे, भरत ने कहा और तर्जनी उठा दी.

पता करने के बाद कि बाथरूम कहाँ है, वह उसे सीधे छोटे से होटल के पीछे ले गई.

बाथरूम बहुत गंदा था. 

“नहीं, मैं यहाँ नहीं करूंगा. बदबू आ रही है. मैं वापस मद्रास जाना चाहता हूँ. ये जगह अच्छी नहीं है.”

बासे दूध की बू, दोसे का खट्टा आटा, बची-खुची सब्जियां...सबने मिलकर उस जगह को भयानक गंदा बना दिया था.

आखिर में वह उसे एक आम के पेड़ के नीचे ले गई, जहाँ भरत ने पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्वों से भरपूर गरम पानी का छिड़काव कर दिया.

दोनों बसों के आदमी, औरतें और बच्चे होटल में पहले ही बैठ चुके थे. चूंकि मामा ने मालिक को अपने आगमन की पूर्व सूचना दे रखी थी, इसलिए कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन ब्रेकफास्ट के लिए तैयार किये गए थे : गरमा-गरम इडली. दोसा, वडा, पोंगल और पूरियां पेश की जा रही थीं. सांबार और प्याज के साथ आलू की सब्जी ललचा रही थी.

 चंद्रू ने अपनी बगल में दो खाली कुर्सियां रखी थीं, और सामने मामा, उसकी पत्नी और ज्योति की माँ बैठे थे.

“मुझे चॉकोज़ चाहिए,” भरत ने गला फाड़ा.

“जो चाहिए वह तुम्हें नहीं मिल सकता. जो दिया गया है, उसे खाना सीखो. तुम्हें तो पूरियां अच्छी लगती हैं, है ना? पूरियां खा लो. सब्जी में बिल्कुल मिर्ची नहीं है.” चंद्रू ने कडाई से कहा.

जब वह पूरियां खाने पर सहमत हो गया, तो किट्टू मामा की जोरदार आवाज़ सुनाई दी...

“ऐ... चीमा, सुन्दरम, पंजा, चिन्ना – तुम सब यहाँ आओ.”

वह सब वेटर्स को अपनी मेज़ के पास बुला रहा था. ज़ाहिर था कि वह हरेक को जानता है.

वे सब उनकी मेज़ के पास इकट्ठे हो गए और मामा ने गर्व से उनकी और देखते हुए, मुस्कुराकर चंद्रू की ओर इशारा करते हुए कहा:

“क्या तुम जानते हो कि यह कौन है? मेरी भांजी ज्यो का पति. हमारे घर का दामाद. पी चंद्रू. पी. चंद्रमौली. पुडुकोट्टाइ पंचपाकेशन चन्द्रमौली. ये तंजौर की तरफ का है. ये मद्रास में बअअअडा ऑफिसर है. अब ये दिल्ली जा रहा है एक बहुत बहुत बअअअअडी पोस्ट पर. अगर तुममें से किसी को दिल्ली में कोई काम करवाना है, तो इससे पूछ सकते हो. ये खरा सोना है और है अच्छाई का अवतार. किसी के भी लिए कुछ भी करेगा.”

चंद्रू को ब्रेकफास्ट कड़वा लगने लगा और ज्योति घबरा रही थी कि वह क्या करेगा. सौभाग्य से उसने एक हल्की-सी कृत्रिम मुस्कान से जवाब दिया.

इस बीच एक भारी भरकम आदमी, जो दूसरी बस में था, सिल्क की पीली कमीज़ पहने, आठ उँगलियों में अंगूठियाँ पहने, कलाई घड़ी जैसा मोटा ब्रेसलेट पहने, बिना गर्दन की गर्दन में भारी सोने की चेन लटकाए उनके पास आया और ज्योति की माँ को चिढाकर चंद्रू को अपना परिचय देने लगा.   

“क्या, अक्का? तुम अपने दामाद को मुझसे नहीं मिलवा रही हो? ओ.के. मैं ही उसे बता देता हूँ कि मैं कौन हूँ. मैं मार्गबंधु हूँ. मामी का भांजा, मंगाम्बू से. मैं वहाँ मिरासदार हूँ. मेरा महल जैसा घर है. तुम्हें वहाँ आकर हमारे यहाँ दो दिन रहना चाहिए.

ज्योति ने संदेह से भरत की ओर देखा (जो उसके इस मामा की ओर देख रहा था) और इस डर से कि न जाने उसके मुँह से क्या निकल जाए, उसे वहाँ से दूर खींचने की कोशिश करने लगी.

परन्तु नुक्सान हो ही गया!!   

“मैं आपको जानता हूँ. नानी ने मुझे आपके बारे में बहुत सारी कहानियां सुनाई हैं. उसने कहा था कि तुम अपने आसपास की किसी भी चीज़ को अजगर की तरह निगल जाओगे. हाँ! हाँ! मलाप्पाम्बू मार्गाभान्तु (पायथन मैं)! क्या आप वही हो?

अगर चंद्रू के पास तीसरी आंख होती, तो ज्योति की माँ पल भर में राख का ढेर बन गई होती. वह ऐसे लोगों से सख्त नफ़रत करता था, जो दूसरों के जिस्म के बारे में ताने कसते हैं या कोई नाम देते हैं. सौभाग्य से किसी ने उसे बुलाया, “मार्गु, तुम्हारी कॉफी आ गई है. आ जाओ. गरम-गरम पी लो.”

जैसे ही वे एक-एक करके होटल से निकलकर बस की ओर जाने लगे, होटल का मालिक परशुरामन जल्दी-जल्दी चंद्रू के पास आया.

“आपको पता है, मेरा एक सपना है. मैं दिल्ली में एक होटल खोलना चाहता हूँ. मैंने पैसे भी जमा कर लिए हैं. आप शायद मझे कोई जगह ढूँढने में और लाइसेंस दिलवाने में मेरी मदद करेंगे. आपकी उम्र लम्बी हो.”

चंद्रू ने मुस्कुराकर अपना सिर हिलाया और बस की तरफ चला. वह मन ही मन ज्योति के मामा पर घूंसे बरसा रहा था. उसने सोचा, काश वह ज्योति के साथ शादी में आने पर राजी ही न होता. वह अकेली ही आ जाती.

“परशु मामा तुमसे क्या कह रहे थे?” जब वे अपनी सीटों पर बैठ गए तो ज्योति ने पूछा.

“वो पूछ रहे थे कि क्या दिल्ली आकर हमारे लिए खाना बना सकते हैं?” उसने झिड़क दिया और उसे पता चल गया कि चंद्रू के साथ सब कुछ ठीक नहीं है. सब किट्टू मामा की ही गलती थी!! परिवार के लोग उसे यूँ ही ऑल इंडिया रेडियो नहीं कहते थे – परिवार के समाचार ऊँची आवाज़ में प्रसारित करना. आह! ये वो दिन थे जब मोबाइल फोन और SMS मनुष्य की ज़िंदगी में नहीं आये थे. किसी को उनकी ज़रुरत भी नहीं थी.

शादी दुल्हन के दादा जी के पैतृक घर में हुई, जो पुरानी स्टाईल में बना हुआ खूब बड़ा, शानदार बंगला था. एक पंडाल लगाया गया था और किट्टू मामा का बेटा बड़ा खुश था – लड़की बहुत सुन्दर थी – और सभी संबंधी इंतज़ाम से और खाने से खुश थे. बड़े भारी सेन्ट्रल हॉल में एक कतार में रखे हुए चांदी के और स्टील के बर्तन चमक रहे थे. मामी को कोई शिकायत नहीं थी. चंद्रू अपने आप को किट्टू मामा की नज़रों के घेरे छुपा रहा था, ताकि कहीं कोई और ‘परिचय का तमाशा न हो जाए.

वह पीछे एक कुर्सी पर बैठकर विधियों का आनंद ले रहा था. उसने रामासेरी इडलियों का सांबार और तीन तरह की चटनियों के साथ; पुट्टू, वडा-सांबार और कद्दू के हलवे का, जिसमें से घी टपक रहा था, छक कर ब्रेकफास्ट किया था, और इस सब के ऊपर बढ़िया कॉफी. नादस्वर से निकलती हुई संगीत लहरियों पर वह सिर हिला रहा था और उसे ज्योति की एक झलक दिखाई दी जो एक बेहद ख़ूबसूरत नौजवान से बातें कर रही थी, जो उस वातावरण से ज़रा भी मेल नहीं खा रहा था. वह ख़ूबसूरत, सौम्य और परिष्कृत लग रहा था. उसे याद आया कि ज्योति उनके पड़ोसी के बेटे के बारे में बता रही थी, जो लन्दन गया था, और शादी के लिए अपने किसी जर्मन दोस्त के साथ आने वाला था : हाँ, उसे याद आया कि जर्मन दोस्त जो छ:-सात इडलियाँ गटक गया था, डाइनिंग हॉल में उसके सामने बैठा था, और इससे पहले समारोह की वीडियो ले रहा था.

परफ्यूम की एक तेज़ खुशबू ने उसे सिर घुमाने पर मजबूर किया, और उसने ज्योति की मामी को एक बहुत वृद्ध महिला के साथ आते हुए देखा, जो उम्र के साथ झुक गई थी. वृद्धा उसके पास बैठी और मामी कहने लगी:

“ये मेरी माँ हैं,. दामाद जी. पिछले महीने निन्न्यानवें साल की हो गईं. जिद कर रही थी कि उन्हें तुम्हारे पास लाऊँ. थोड़ी देर उनसे बात कर लो और मैं बाद में आकर उन्हें ले जाऊंगी.”

दंतहीन, मिठासभरी वृद्धा ने उसका हाथ पकड़ा और कहा:

“मेरी बेटी ने तुम्हारे बारे में सब कुछ बताया है. मैं तुम्हारी शादी में नहीं आ सकी, क्योंकि मैं अपने बड़े बेटे के पास त्रिवेंद्रम में थी. ज्योति ने बताया कि तुम दिल्ली जा रहे हो. मैं बीस साल पहले काशी जाते हुए वहाँ गई थी. तब मेरे पति ज़िंदा थे. ज्योति की माँ ने बताया कि तुम एक नए बंगले में जाने वाले हो.” 

“नए नहीं, मामी, सरकारी घर है, और मुझसे पहले वाले ने अभी उसे खाली किया है.”

“ओह, तब तुम्हें प्रवेश करने से पहले नवग्रह शान्ति करवाना चाहिए. हो सकता है, उन्होंने वहाँ किचन में बकरे और मुर्गियां काटी हों और हमें उन जानवरों की आत्माएं (‘जंतु’ – उसने इस शब्द का प्रयोग किया था) वहाँ नहीं चाहिए. – तुम्हें पता है, वे मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं, हाँ लोग झपेटे में आ जाते हैं!! और उनसे छुटकारा पाना बड़ा मुश्किल होता है. ओह! वह एक लम्बी प्रक्रिया है.”

चंद्रू ने कल्पना की कि कैसे एक मरी हुई मुर्गी की आत्मा उसकी सास के शरीर में प्रवेश कर रही है, और उसने उसे कुकडू-कू करते हुए इधर उधर भागते देखा. उसके चेहरे पर चिढाने का भाव आ गया. “कु-कु”... नौ गज की कांचीपुरम सिल्क की साडी में एक मुर्गी इधर उधर भाग रही है!!! 

“हंसो मत. मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ. दामाद जी. कई साल पहले मेरी बहू को अचानक गुस्से के दौरे पड़ते थे. हमने एक ज्योतिषी को बुलाकर उसके भूत, वर्त्तमान और भविष्य के बारे में प्रश्न पूछा. उसने बताया कि एक मृत बकरी की आत्मा उसके भीतर प्रवेश कर गई है (ज़ाहिर है!!! ज़िंदा आत्मा तो ऐसा नहीं कर सकती थी... वरना तो वह आत्मा का स्थानांतर हो जाता)!! फिर हमें आधी रात को कुछ साधना वगैरह करनी पडी थी जिससे उस आत्मा से मुक्ति मिले.”

उसने मलयालम फिल्मों में आधी रात को ऐसे तांत्रिक प्रकार किये जाते हुए देखे थे और उसके बदन में झुरझुरी दौड़ गई थी!!

इत्तेफाक से किसी सलाह के लिए कोई उसे लेने आया और वह चली गई.

“ऊऊफ!! क्या भयंकर प्रकार है!!

एक जानवर की आत्मा से मुक्ति पाने के लिए, जिसने मनुष्य को अपनी चपेट में ले लिया था, आधी रात को तांत्रिक पूजा करना! ये पलक्कड वाले सनकी हैं, उसने अपने आप से कहा.

वह उस बड़े हॉल के बीच में गया और उसने देखा कि दुल्हन को मंगलसूत्र पहनाने से पहले नौ गज की साड़ी पहनाने के लिए ले जाया जा रहा था.

मामा बड़े जोश में उसकी तरफ देखते हुए प्रमुख पुजारी से बात कर रहा था. हे भगवान! बुड्ढे ने मुझे देख लिया, चंद्रू ने सोचा, सत्तर साल का प्रमुख पुजारी उसी की ओर आ रहा था.

“नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार! मैं साम्बशिवम् हूँ – परिवार का पुजारी.

मैं अच्छे-बुरे दिनों में इनके साथ रहा हूँ. सुना कि तुम दिल्ली जा रहे हो. मेरा साडू-भाई विकासपुरी में रहता है. वह वहाँ अम्मान मंदिर का प्रधान पुजारी है.”

अच्छा! अब ये आदमी नवग्रह पूजा करवाने के लिए उस पुजारी को मेरे पीछे लगा देगा!! अब मैं इससे कैसे पीछा छुडाऊँ! चंद्रू परेशान हो रहा था.

पुजारी कह रहा था: 

“ये रहा उसका विजिटिंग कार्ड. अपने पास रखो. तुम्हें अपने माता-पिता के वार्षिक श्राद्ध के लिए किसी साउथ इन्डियन पुजारी को ढूँढने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी. उसे मोबाइल नंबर पर फोन कर दो. वह सब कुछ ले आयेगा और एक दिन पहले ही एक औरत को भी भेज देगा स्पेशल खाना बनाने के लिए.”

चंद्रू घबरा गया.

उसने कहा, “मामा, मेरे माता-पिता अभी ज़िंदा हैं.”

पुजारी थोड़ा चौंक गया और माफी माँगने लगा. वह खिसक लिया और वापस अपने ख़ास आसन पर बैठ गया.

मार्केटिंग के लिए इतना कुछ.

अब क्या? चंद्रू सोच रहा था. उसका दिल चाह रहा था कि मद्रास वापस चला जाए. मगर ज्योति और भरत को खूब मज़ा आ रहा था. भरत ने कुछ दोस्त बना लिए थे और वे लोग खेल रहे थे, बीच बीच में डाइनिंग हॉल में आ जाते और मुँह में कुछ डाल लेते. कहीं बच्चे का पेट न बिगड़ जाए.

अचानक चंद्रू को भूख लग आई. शादी के सभी संस्कार पूरे हो चुके थे और हर कोई डाइनिंग हॉल की ओर जा रहा था.

वह भी उनके पीछे हो लिया, एक बड़े केले के पत्ते की कल्पना करते हुए जिस पर थीं काफी सारी सब्जियां, मिठाइयां, चासनी में डूबी इमरती, आम का अचार और गाढा दही, पूरी जैसे पापड जिनका एक ख़ास स्वाद था, केले के चिप्स – नमकीन और मीठे.

उसका ‘मूड अच्छा हो गया.

उसकी कमीज़ पर पान की पीक उड़ाने वाले किट्टू मामा को भूल जाओ.

बकरियों और मुर्गियों की आत्माओं को भूल जाओ. उन्हें ऊधम मचाकर किसी और के शरीर में जाने दो.

उस पुजारी को भूल जाओ जो उसके तंदुरुस्त माता-पिता का श्राद्ध करने चला था.

किट्टू मामा की बकवास को भूल जाओ.

सब भाड में जाएँ!

वह पलक्कड़ के ख़ास विवाह-भोज का आनंद उठाने वाला था, जो बेमिसाल है... 

 

******

 

 

फ्लाईट

   

   .     

                

‘मूवर्स एंड पैकर्स आखिर चले गए. नौकर अपार्टमेंट की सफाई में व्यस्त हो गया. ज्योति खुश थी. उसने ट्रक की दिल्ली तक की पाँच दिनों के सफ़र के दौरान उसके तुलसी, गुलाब और जेस्मीन के गमलों में पानी देने के लिए क्लीनर को पाँच सौ रुपये दिए. उसे यकीन था कि उसके पौधे सुरक्षित रहेंगे.

सुबह के सात बजे थे और वे मद्रास-दिल्ली फ्लाईट पकड़ने के लिए हवाई अड्डे के लिए निकलने वाले थे. अपनी उत्सुकता पर काबू न रखने के कारण भरत भी जल्दी उठ गया था. यह उसकी पहली फ्लाईट थी. परिवार ने पड़ोसियों से बिदा ली. कामाक्षी आंटी ने, जो उनके बिलकुल सामने रहती थी. ज्योति के हाथ में एक नया स्टील का टिफिन बॉक्स थमा दिया.

“इसमें तीन इडलियाँ हैं चटनी पावडर के साथ,” वह फुसफुसाई. ज्योति की आंखों में आँसू आ गए. उसे इस आंटी की याद आने वाली थी.

और अगले फ़्लैट वाली मिसेज़ खन्ना, ‘तीस दिनों में हिन्दी सीखें’ किताब देते हुए बोलीं, “ज्यो, तुम्हारे लिये यह किताब फायदे की रहेगी, क्योंकि दिल्ली के लोग मुम्बई के लोगों की अपेक्षा अच्छी हिन्दी बोलते हैं, मुम्बई की हिन्दी तो गुजराती, मराठी, अंग्रेज़ी वगैरह का मिश्रण होती है. जैसे सभी भाषाओं की खिचडी.”

‘चेक इन’ करने के बाद कहानियों की कुछ किताबें खरीदने के लिए चंद्रू भरत को बुक-स्टाल पर ले गया. ज्योति हिन्दी वाली किताब निकालकर उसके पन्ने पलटने लगी.

हिन्दी से उसका परिचय सिर्फ फिल्मों के माध्यम से था और वह कुछ फ़िल्मी गाने भी गा सकती थी. मगर बोलचाल की हिन्दी की तो बात ही अलग थी. उसे सब्जियों के, फलों के, किराना सामान के नाम जानना ज़रूरी था और बेशक बुनियादी बातचीत के लिए एक कोर्स की भी आवश्यकता थी.

बाप-बेटा तीस मिनट में वापस आये और चंद्रू के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था.  

उसने ज्योति को बताया,

“काश, ये बच्चा मुझे इस तरह शर्मिन्दा न करता.”

“क्या किया उसने?” ज्योति ने पूछा, उसे इस बात का दिलासा था कि कोई बहुत बड़ी बात नहीं हुई थी, क्योंकि चंद्रू ज्वालामुखी की तरह नहीं लग रहा था, जो अभी अभी फूटा हो.

“वहाँ एक आदमी था, जिसने एक किताब उठाई थी, और भरत उसके पास गया और पूछने लगा कि क्या उसके पेट में एक छोटा बच्चा है. क्या तुम सोच सकती हो? इस बच्चे को ऐसी बातें कहाँ से सूझती हैं?

ज्योति ने अपनी हंसी दबाने की कोशिश की जो किसी भी समय फूट सकती थी. सौभाग्य से ‘बोर्डिंग अनाउन्समेंट हुई और वे गेट की तरफ चल पड़े.

बच्चे को कैसे मालूम होगा कि आदमी ‘प्रेग्नंट’ नहीं होते हैं.

फ्लाईट बहुत भरी हुई नहीं थी और काफी सारी खाली सीटें थीं. चंद्रू ने बच्चे की सीट बेल्ट बांधी. बच्चे को बर्ताव के बारे में सख्त हिदायतें दी गईं और बच्चे ने चंद्रू की हर बात पर सिर हिला दिया. 

एअर होस्टेस चॉकलेट्स की ट्रे लेकर आई और बच्चे ने सिर्फ एक ही चॉकलेट उठाई. मुस्कुराते हुए एअर होस्टेस ने उसकी हथेलियों में कुछ चॉकलेट्स थमा दीं, जिन्हें उसने खुशी-खुशी ले लिया. चंद्रू खुश था.

वे आराम से बैठे ही थे कि छः फुट का भारी-भरकम आदमी, चमकदार सफ़ेद धोती और कुर्ता, उँगलियों में दो अंगूठियाँ पहने , गर्दन में रुद्राक्ष के पेंडेंट की माला पहने और माथे पर विभूति लगाए बीच वाली सीट पर बैठ गया.

वह उनकी तरफ मुडा और पान से लाल हुए अपने दांत दिखाते हुए मुस्कुराया.

चंद्रू ने फुसफुसाकर अपनी बीबी से कहा,

“तुम्हारी बिरादरी का लगता है!! उम्मीद है, कि वह कोई बात न शुरू कर दे.” उसके केरल मूल के बारे में चिढाने का कोई भी मौक़ा वह नहीं छोड़ता था.

ज्योति मन ही मन मुस्कुराई.

उसे पता था कि इस बार चंद्रू गलत था.

उसने गौर किया था कि अपने भारी-भरकम शरीर को सीट में दबाते हुए, वह जोर से फुसफुसाया था –

“मुरुगा, मेरे ईश्वर कार्तिकेय, जो पश्चिम घाट के पूर्व की ओर की बिरादरी (जैसा चंद्रू कहता था) की ख़ास पहचान थी, जबकि उसकी बिरादरी के लोग बैठने से पहले प्रार्थना करते हैं – कृष्णा/ गुरुवायूरप्पा / देवी/ सर्वेश्वरी / जगदम्बिके/ महामाये / भगवती इत्यादि.  

ये बात नहीं थी कि उन्हें मयूरारूढ भगवान से कोई शिकायत थी. वे बिना किसी भेदभाव के सभी देवताओं की पूजा करते थे, मगर इन नामों का उल्लेख अवश्य करते थे. इतनी श्रद्धा से ‘मुरुगा पुकारने वाले अक्सर पूर्व की तरफ के तमिल होते हैं.

वह चुप रही, मगर उसे मन ही मन लग रहा था कि कोई मजेदार बात होने वाली है.

फ्लाइट ने ‘टेक ऑफ़ किया और भरत बादलों में खो गया था, जिन्हें चीरते हुए प्लेन जा रहा था. उसे यह अच्छा लग रहा था.

ब्रेकफास्ट दिया जा रहा था और ज्योति ने ब्रेकफास्ट लेने से मना कर दिया, वह बच्चे को खिला रही थी.

“तुम क्यों नहीं खा रही हो? फ्लाईट दो घंटे से ज़्यादा लेगी और तुम्हें भूख लग आयेगी.”

“मेरे पास कामाक्षी आंटी की दी हुई इडलियाँ हैं और मैं वही खाऊँगी. आज अमावस्या है और मैं बासी खाना नहीं खाना चाहती.”

“बासी खाना? ये ताज़ा है; और अमावस्या हुई तो क्या?

“आह! कल अगर कोई विदेशी साइंटिस्ट ‘अमावस्या और बासी खाने पर उसका प्रभाव’ – ऐसा रिसर्च पेपर प्रकाशित करे, तो तुम उसे सिर चढ़ा लोगे. मैं पारंपरिक सत्य पर विश्वास करती हूँ और मैं तुम्हारे रास्ते में भी नहीं आती, है ना? अभी उस दिन पड़ोस की मिसेज़ मसिलामणी हमारे घर आकर पूछने लगी कि क्या मैं उसे थोड़ा सांबार दे सकती हूँ – उसकी भांजी अचानक आ गई थी, मैं इस लड़की से मिल चुकी हूँ. वह एयर लाइंस में फ़ूड इन्स्पेक्टर है, और फ्रीज़ करने से पहले हर चीज़ उसे देखनी पड़ती है. हाँ, फ्रीज़ करने से पहले. खाने को ‘चिल ब्लास्टिंग प्रक्रिया से फ्रीज़ किया जाता है और तब ‘टेक ऑफ़ से पहले उसे फ्लाईट में चढाते हैं. फिर उसे गर्म करके यात्रियों को दिया जाता है. मुझे फ्रिज में रखे हुए खाने से कोई परहेज़ नहीं है, तुम्हें मालूम है. बात बस इतनी है, कि मैं आज वह नहीं खाना चाहती.”

चंद्रू अपनी ट्रे की ओर देखने लगा.

‘चिल ब्लास्ट’ – यह चीज़ उसके लिए नई थी!!

चंद्रू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा. बातूनी होस्टेस, जिसने भरत की हथेलियाँ चॉकलेट्स से भर दी थीं, यह सब सुन रही थी, और उसने चंद्रू से कहा,

“ मैडम ठीक कह रही हैं.”

भरत को खिलाने और उसे थोड़ा दूध देने के बाद ज्योति ने अपनी इडलियाँ निकालीं.

भरत खिड़की से बाहर आसमान को और धरती को देख रहा था, उसकी आंखें विस्मित थीं.

तभी अगली सीट पर बैठे आदमी ने चंद्रू को टोका.   

“क्या तुम पुदुकोट्टाई चंद्रमौली के पोते हो? पंजू और मीनाक्षी के बेटे?

ज्योति की पतली उँगलियों के बीच में इडली का टुकड़ा मानो जम गया.

“वा!!! अब बादल बरसने ही वाला है,” उसने अपने आप से कहा. आगे की बातचीत का इंतज़ार करते हुए वह अपनी इडलियों का लुत्फ़ उठा रही थी.

चंद्रू ने सिर हिलाया.

“मैं आपके बिल्कुल पड़ोस में रहता था. बाद में दिल्ली चला गया, पच्चीस साल पहले. तुम तो तब बहुत छोटे थे. मगर बिल्कुल अपनी माँ की तरह हो – बहुत सुन्दर महिला...मुझे और मेरी पत्नी को आपका परिवार बहुत अच्छा लगता था. तुम्हारी माँ ने मेरी पत्नी को कई पकवान बनाना सिखाया. मेरी पत्नी बहुत स्वादिष्ट पारुप्पू उसिली बनाती है, जिसे तुम्हारी माँ ने सिखाया था. मुझे उनकी पूरण पोली की याद है. आहाहा!! मुँह में रखते ही पिघल जाती थी. तुम्हारा बड़ा भाई अब कहाँ है? मेरे ख़याल में उसका नाम शंकरन है.”

“अभी वह यू.एस. में है.”

“ओह! अच्छा है. हमारा बेटा भी यू.एस. में है. और हमारी बेटी लन्दन में है. तुम्हारी एक बड़ी बहन है ना, तुमसे पंद्रह साल बड़ी. शायद, पद्मा है उसका नाम. उसने घर छोड़कर एक दूसरी जाति के लडके से शादी कर ली, मुझे याद है. क्या तमाशा हुआ था!! तुम्हारे दादा-दादी बहुत नाराज़ थे, और तुम्हारी माँ कितने ही दिनों तक रोती रही थी. हम उन्हीं दिनों दिल्ली आ गए थे. अब कहाँ है वह?    

चंद्रू कुछ चिड़चिड़ा रहा था – उसके पारिवारिक मामलों के बारे में ये जोकर जोर जोर से बात कर रहा था!!”

“वह और उसका परिवार अच्छे हैं. वह मुम्बई में है और बहुत अच्छी तरह से हैं. मेरे जीजाजी बहुत अच्छे इंसान हैं और मेरे माता-पिता अक्सर उनसे मिलते हैं.” उसे पता था की उसने जोकर के उत्साह पर पानी फेर दिया है, जो कुछ चटपटी बात सुनने के लिए उतावला था.

“अच्छी बात है. अगर लड़का अच्छा है तो हम बुरा क्यों मानें? हम कितनी ही ऐसी शादियों के बारे में सुनते है, जो अरेंज्ड होते हुए भी टूट जाती हैं. अगर पति-पत्नी सुखी हों तो फिर कोइ बात ही नहीं है. वैसे, मेरा नाम विश्वनाथ है. अगर तुम्हारे माता-पिता को मेरा नाम बताओगे, तो याद आ जाएगा. मैं विकासपुरी में रहता हूँ. मेरा अपना घर है. मैं मलय मंदिर समिति का सदस्य भी हूँ,” उसने अपना कार्ड निकालकर चंद्रू की तरफ बढाते हुए कहा. आपको हमारे घर आना होगा. अगर कोई छोटी-मोटी ज़रुरत हो तो मुझे और मेरी पत्नी को आपकी मदद करने में बहुत खुशी होगी.”

फिर वह ज्योति की तरफ मुड़ कर बोला,

“तुम पलक्कड़ से हो, है ना? जैसे ही तुमने अपने बच्चे को ‘कोंडे (बच्चे!) कहकर पुकारा, मैं समझ गया. तुम्हें पता है, ये छोटा चंद्रू सिर्फ एक सोने की करधनी बांधे नंगा भागा करता था. करधनी में सामने की ओर एक बड़े पीपल के पत्ते का डिजाइन था!! कम से कम पाँच तोले का होगा. इसकी माँ के पिता की ज्वेलरी की दूकान थी, और वह पूरी दुनिया को दिखाना चाहती थी कि उसके माँ-बाप ने पोते को क्या भेंट दी है!! हा हा हा!!! पड़ोसी बड़े प्यार से उसे ‘नंगा चंद्रू कहते थे.”

चंद्रू के कान लाल हो गए थे, क्योंकि कोने वाली सीटों के सभी यात्री इस बातूनी आदमी को सुन रहे थे और खिलखिला रहे थे. उसे बेहद शर्म महसूस हो रही थी, जैसे उसे बिना कपड़ों के, सिर्फ एक गहना पहने हुए पकड़ा गया हो!!

ज्योति को – ‘अच्छा लग रहा था.

“तुम्हारा छोटा बेटा अब इसे पहन रहा होगा. बेशक, आजकल माँ-बाप अपने बच्चों को बिना कपड़ों के नहीं निकलने देते. पहले ही दिन से. कितने सारे ब्रैंड्स हैं नैपीज़ के.”

ज्योति सिर्फ मुस्कुरा दी.

मगर उसे याद आया कि ये ‘चीज़, किसी पारिवारिक शादी में, कुछ साल पहले, उसकी ननंद के गले की शोभा बढ़ा रही थी. हुम्म्म्मम्...तो ये बात है! कोई चीज़ जो कानूनन उसके बेटे की होनी चाहिए थी!!

इस बीच बहुत मेहेरबान चंद्रू भरत को टॉयलेट ले गया.

उसे इस ‘मुक्ति की ज़रुरत थी! छि:!! कैसा जोकर आदमी है...अच्छी खासी फ्लाईट का सत्यानाश कर दिया.

अचानक आई फ़्लश की भयानक आवाज़ ने, जिसे ‘सु सू’ के बाद चलाया गया था, बच्चे को भयभीत कर दिया, जिसका कारण सिर्फ उसे ज्ञात था, चंद्रू को नहीं. वह चीखकर अपने पिता से लिपट गया. उसका चेहरा पीला पड़ गया था और वह तभी कुछ शांत हुआ, जब चंद्रू उसे उठाकर बाहर लाया, यह समझाते हुए कि ‘वो सिर्फ आवाज़ थी. मगर भरत जानता था कि यह सिर्फ आवाज़ नहीं है और उसे इस आवाज़ के उद्गम और उसके स्त्रोत के बारे में मालूम था.

जब वह अपनी जगह पर बैठ गया तो उसने ज्योति से कहा,

“अम्मा, नानी ठीक कहती थी!!”

ज्योति ने परेशानी से उसकी ओर देखा.

चंद्रू समझ गया कि नानी ने बच्चे के दिमाग में कोई बकवास भर दी है.

भरत कहता रहा,

“अम्मा, याद है? नानी कहती थी, कि अगर मैं ‘पॉटी’ नहीं करूंगा, तो टॉयलेट के भीतर वाला राक्षस मुझे काट लेगा? वह वहाँ था. वो राक्षस!! वह इत्ती जोर से चिल्लाया!! अप्पा ने मुझे फ़ौरन उठा लिया!! हाँ, अम्मा. सच में – वो वहाँ था. मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ. और वह दिखाई भी नहीं दे रहा था, जैसा नानी ने बताया था.”

ज्योति ने उसे फ़ौरन चुप किया और कहा.

“ओके, ओके, अब तुम थोड़ी देर सो जाओ. तुम बहुत सुबह उठे थे ना. तुम्हें नींद की ज़रुरत है.”

उसने डर के मारे चंद्रू की और देखा ही नहीं.

“तुम्हारी माँ को इन बेवकूफियों के अलावा कुछ और आता ही नहीं है?”

मगर चंद्रू भी दूसरी ओर देख रहा था, इस डर से कि कहीं वह उसके नंगे भागने के बारे में चिढाने न लगे.

‘मुरुगा, मेरे भगवान’ को दो बार याद करके विश्वनाथ सो गया था.  

भरत ने भी किसी फ़रिश्ते की तरह अपनी आंखें बंद कर ली थीं.

चंद्रू भी सोने का नाटक कर रहा था.

ज्योति मन ही मन मुस्कुराई और ‘तीस दिनों में हिन्दी सीखो’ निकालकर याद करने लगी –

अदरक – Ginger

भिन्डी – Lady Finger

बैंगन – Brinjal

सबसे पहली बात है किचन की चीज़ों के बारे में जानना!!

दही – Curd

काली मिर्च – Pepper

अचार – Pickle

उसकी भी आंखें बंद होने लगीं.

 

*****

 


गंदा काढ़ा

 

नरेंद्रन को खूब प्यास लगी थी. उसका गला सूख गया था.

झुलस गया था.

जब वह मुम्बई से बीकानेर के पास स्थित इस गाँव के लिए निकला था, तो उसके सहयोगियों ने उसे आगाह किया था.

“तुम आसाम में ज़िंदा रह सकते हो. चाहो तो उत्तर प्रदेश में भी. वहाँ चाहे जैसी परिस्थिति हो...दंगे, गोली-बारी, लूट पाट...तुम्हें खाना और पानी मिल जाएगा. मगर यहाँ...” राहुल सिंह ने अपनी बात पूरी किये बिना उसकी तरफ देखा.

नरेंद्रन मुस्कुराया था. 

“कहो भी, राहुल. तुम क्या कहना चाह रहे थे?

कपाडिया बीच में टपक पडा.

“मैं बताता हूँ. तुम भूख और प्यास से मर जाओगे. और खासकर वह गाँव...कहानियां, जो हम सुनते हैं, भयानक हैं. लोगों की बात सुनकर रिपोर्टिंग करो, इतना ही काफी है. तुम्हें वहाँ जाने की ज़रुरत नहीं है.”

नरेंद्रन दोस्तों की बात मान ही नहीं सका.

उसने सुना था कि लोग बिना पानी के, बिना खाने के मक्खियों की तरह मर रहे हैं. मवेशी तो पूरे ख़तम हो गए थे.

वह गुस्से से लाल हो रहा था. उसका दिल भारी था. ..ऐसा कैसे हो सकता था...ऐसा क्यों हुआ.

सरकार तो लोगों से कह रही थी कि भुखमरी के कारण कोई मौत नहीं हुई है और युद्ध स्तर पर वहाँ सहायता पहुंचाई जा रही है. वह स्वयँ जाकर पूरी परिस्थिति देखना चाहता था.

उसका मद्रासी दोस्त, राजाराम उसके साथ स्टेशन तक आया था. वह प्रोत्साहन का महान स्त्रोत था.

नरेन् बीकानेर पहुँचा और बस से या बैलगाड़ी से गाँव-गाँव गया.

इस विशिष्ठ जगह को देखकर उसे बहुत धक्का लगा.   

उसे पहली बार “गरीबी की रेखा से नीचे”, इन शब्दों का मतलब समझ में आया.

पिछले गाँव में उसे सवारी ढूँढ़ने की समस्या का सामना करना पड़ा था. बसों ने इस गाँव में जाना बंद कर दिया था.

पहले तो उसके गाड़ीवान ने वहाँ जाने से मना कर दिया.

“वो शैतान की भूमि है, साहब. इस गाँव में, जहाँ सौ से ज़्यादा आदमी थे, अब सिर्फ बीस या तीस ही बचे हैं. बहुत सारे मर गए, कुछ गाँव छोड़ कर चले गए. चारे की कमी से मवेशी मर गए. दया आती है, साहब...बहुत दयनीय हालत है.” गाडीवान ‘बोली’ गाडी को गाँव की ओर ले जाते हुए बता रहा था. वह नरेन् को भारी किराए के वादे पर ले जा रहा था.

‘बोली’ ने गाड़ी में पानी के तीन कैन रखे, कुछ समोसे और मिठाइयां भी रखीं. उसका दिल बहुत नर्म था. नरेन् महसूस कर सकता था.

“हो सकता है, वहाँ कुछ बच्चे हों, साहब...और अगर आप वहाँ कुछ देर रुकने वाले हैं, और फोटो भी खींचने वाले हैं, तो आपको भी भूख लग आयेगी.” नरेन् ने भी बस स्टॉप पर एक छोटी सी दूकान से देसी बिस्कुटों के कुछ पैकेट खरीदे थे. 

गाड़ी ने वीरान, ‘शैतान की भूमि में प्रवेश किया.

‘शायद नरक ऐसा ही होता होगा,’ गाँव पर पहली नज़र डालते ही नरेन् के मन में फ़ौरन ये ख़याल कौंध गया.

मौत जैसे सन्नाटे में भी गाँव जागा हुआ प्रतीत हो रहा था.

छोटी सी चाय की दुकान मरियल संगीत से नरेन् को आमंत्रित कर रही थी.

उसे लगा कि अमिताभ बच्चन उससे पूछ रहा है, ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?...”

“क्या चाय है?” नरेन् ने पूछा.

दुकानदार करीब अस्सी साल का लग रहा था.

‘है, बेटा. बैठो. क्या तुम सरकार से आये हो? मिनिस्टर के प्रतिनिधि?

उसके मौत जैसे पीले चहरे पर और आंखों में आशा की एक किरण कौंध गई.

“नहीं, जनाब. मैं अखबार से हूँ.”

बूढ़े आदमी ने एक छोटे गंदे कप में चाय डालकर उसे थमाई.

चाय बहुत बकवास होगी, बेटा. मेरी गाय के लिए चारा ही नहीं है. बिल्कुल पर्याप्त नहीं है. मेरा बेटा, बहू और पोता आज सुबह अच्छी वाली गाय लेकर चले गए.”

“कहाँ?” नरेन् ने पूछा. चाय एकदम पनीली और काली थी.

एकदम गंदा काढ़ा.

बूढ़े ने हताशा से अपने हाथ फैलाए और कंधे उचकाए.

“कहाँ गए हैं, असल में मुझे मालूम नहीं है. जहाँ भी जाएँ, खुशी से रहें, आराम से रहें..”

चाय कड़वी थी – बूढ़े आदमी की ज़िंदगी जैसी.

“तुम क्यों नहीं गए उनके साथ?        

“हुम्म्मम् . अस्सी साल पहले इस गाँव की गोद में आया था. मेरी नाल अभी भी ज़िंदा है. मैं बड़ा हुआ. मैंने प्यार किया. अपनी चहेती से ब्याह किया. मैं करीब-करीब पूरे गाँव को दूध डालता था. इत्ती सारी गायें होती थी टपरी में. अपनी किस्मत पे भरोसा ही नहीं होता. अब मैंने कित्ती सारी मौतें भी देख ली हैं. मैं इस जगह को छोड़ना नहीं चाहता. वो कुछ दिन पहले मर गई. शायद महीना भर हुआ होगा या उससे कुछ कम या ज़्यादा. मैं और मेरी गाय भी जल्दी ही मर जायेंगे.”

चाय नरेन् के गले से नीचे नहीं उतर रही थी.

गंदी भूरी. कड़वी. एकदम स्वादहीन.

पिछले दस दिनों से हर कोई मिनिस्टर के आने की उम्मीद कर रहा है. इसीलिये मैंने आपसे वो सवाल पूछा था.”          

इस बीच एक दुबली-पतली औरत हड्डियों के ढाँचे जैसे बच्चे को लेकर दुकान में आई. 

“आओ, बच्ची. प्यारा कैसा है?

उसने उसकी तरफ चाय का एक कप बढाया. उसने थरथराती, पतली उँगलियों से कप को लपक लिया और एक घूँट में पी गई. बच्चा उसके कंधे पर गहरी नींद में था.

“पिताजी, प्यारा मर रहा है, धीरे धीरे मर रहा है,” उसने सूखी आँखों से भयानक शब्द फुसफुसाकर कहे.

सूखे के पास आंसुओं और भावनाओं को भी चूसने की, उन्हें सूखा करने की शैतानी ताकत थी.

वास्तविकता. भयानक वास्तविकता. नरेन् ने बूढ़े को पचास रुपये दिए और औरत के पीछे गया. घर वीरान थे. कुएँ एकदम हड्डी जैसे सूख गए थे. कुछ दूरी पर उसे कुछ चीलें दिखाई दीं ; मरे हुए जानवरों पर मंडरा रही होंगी.

पेड़ बिलकुल बिना पत्तों के. हर तरफ मौत की गंध.

इंसानों की आंखों में कोई चमक नहीं थी; जिनसे हर खुशी और जीने की इच्छा भी छिन गई थी.

रास्ते पर एक परिवार बैठा था. नरेन् उनकी तरफ गया.

“अम्माजी...क्या मिनिस्टर आयेगा?

“वह ज़रूर आयेगा, मेरे प्यारे बच्चे.”     

“फिर, पानी आयेगा, है ना? है ना? क्या वह लॉरियों में पानी भरके लाएगा?        

चार साल का बच्चा तीस साल की औरत से पूछ रहा था, उसकी आंखों में उत्सुकता की धुंधली सी चमक थी.

“म्मम्” एक चार महीने का दुबला-पतला शिशु माँ की सूखी छाती से हवा चूस रहा था.

“फिर वह मिठाई, रोटियाँ लाएगा...है ना?

“हाँ, मेरे हीरे.”

“पापाजी कब आयेंगे?

“तुम सो जाओ, मेरे बच्चे. जैसे ही तुम सोकर उठोगे, वे यहाँ होंगे.”

वह उसकी बगल में दुबक गया, मगर हड्डियों की इस छोटी सी पोटली में नींद आने का नाम नहीं ले रही थी.   

“अम्माजी.”

“ऊँ...” उसने पूछा, उसकी आवाज़ में परेशानी साफ़ झलक रही थी.

“अगर पापा जी भी प्यारा चाचा की तरह मरने लगे तो?

उसकी देह काँप गई.

“नहीं, मेरे बेटे, नहीं.” उसने ब्लाऊज के भीतर से रंग उड़ा मंगलसूत्र निकाला और फुसफुसाकर “गौरी मैय्या” कहते हुए आंखों से लगा लिया.  

रास्ते के दूसरी ओर बने मंदिर के अँधेरे गर्भगृह में गौरी मैय्या खडी थी, घुप खामोशी से उनकी ओर देखते हुए. पुजारी मर चुका था, इसलिए वह भी भूखी थी.

नरेन् उस औरत के पास गया. 

“बहन, तुम्हारे पति कहाँ काम करते हैं?

उसने नरेन् की तरफ देखा और फटी हुई साडी का पल्लू सिर पर ले लिया.

“यहाँ के स्कूल में. वो टीचर हैं. वो मिनिस्टर से मिलने गए हैं.”

“तुम रास्ते पर क्यों बैठी हो? क्या तुम्हारा घर नहीं है?

उसने कुछ गज दूर, मंदिर के पीछे एक घर की ओर इशारा किया.

“टपरी में दो मरी हुई गायें हैं. बदबू बर्दाश्त नहीं हो रही है,  और चीलों का शोर गुल.”

उसने उसकी तरफ देखा,

“क्या मिनिस्टर आयेगा?

उसने अपने मन को शांत करने की कोशिश की.

“वह ज़रूर आयेगा, बहन.”

“उसने ‘बोली से बहुत सारा पानी और खाने की चीज़ें लाने को कहा,  और उन्हें वहाँ मौजूद कुछ लोगों में बांट दिया.

जब वह मुम्बई वापस आया तो उसका दिल गुस्से और दुःख से भरा हुआ था.

फोटोग्राफ्स और वर्णन देखकर एडिटर बहुत खुश हुआ.

“बढ़िया, नरेन्. इसे फ्रंट पेज पर डालूँगा. बिक्री खूब होगी.”

नरेन् ने महसूस किया कि घृणा की लहर ने उसे घेर लिया है.

प्रॉफिट. पैसा. कैश.

ओके, नरेन्, मैंने तुम्हारा टिकट बुक करवा दिया है. तुम दिल्ली जा रहे हो गुट निरपेक्ष राष्ट्रों के सम्मलेन को ‘कवर करने के लिए, हमारे स्पेशल रिपोर्टर के रूप में. शुभ कामनाएँ.”

नई दिल्ली ने अपने पूरे सौन्दर्य और सम्पन्नता से उसका स्वागत किया. राजमार्ग, दुकानें, फूलों से लदे हुए पेड़, हर चीज़ उसे उत्तेजित कर रही थी.

उसे फिडेल कास्त्रो की एक अच्छी तस्वीर खींचने में सफलता मिली.

पूरे सप्ताह के दिल के दर्द के बाद उस रात उसे अच्छी नींद आई.

होटल में ब्रेकफास्ट शानदार था. उसके विचार पिछले दिन की कास्त्रो की स्पीच पर ही केन्द्रित थे. उसने कास्त्रो के विचारों पर कुछ किताबें पढी थीं. कुछ विचार उसके दिमाग में गहरे पैठ गए थे. कुछ ने उसे रुलाया भी था. कुछ आग की तरह थे, दिल को जलाने वाले..

“अमीरों को लूट कर उन्हें गरीब बनाना और समाज में अमीरों के और गरीबों के बीच संतुलन स्थापित करना बेवकूफी है. सच्ची क्रान्ति है आर्थिक दर्जा ऊंचा करना, उनका जो गरीबी की रेखा के नीचे हैं और उन्हें आरामदायक ज़िंदगी प्रदान करना...”

उसके साथ दैनिक ‘मॉर्निंग स्टार’ का रिपोर्टर पार्थसारथी था.

“तुम्हारे विचारों की कीमत एक कौड़ी की है नरेन्. हाथ में कॉफी ठंडी हो गई है.”

नरेन् को झटका लगा.

उसने हाथ के कप से पीना शुरू किया.

वहाँ उसे कॉफी नहीं दिखाई दे रही थी.

उसे एक द्रव दिखाई दे रहा था, जो पनीला और गंदा भूरा था.

चाय की दूकान वाला बूढा, मरता हुआ प्यारा, रास्ते पर बैठा हुआ परिवार.

क्या मिनिस्टर वहाँ गया होगा?

वह उठा और कप को महंगे फूलदान में उंडेल दिया जो मेज़ को सजा रहा था.

वह बहुत गाढ़ी, बहुत स्ट्रॉंग थी उसके लिए.

 

*********

  

क्या ‘वह’ आई थी?

        पुजारी मन्त्र पढ़ रहे थे. हवन की अग्नि शान से जल रही थी और जडी-बूटियों की सुगंध सभी कमरों में भर गई थी. बड़े ड्राइंग रूम में करीब बीस लोग बैठकर नवग्रह-शान्ति पूजा देख रहे थे. जब मेरे पति मन्त्रों को दुहरा रहे थे, तो मैं उनके पीछे खड़ी थी. उनके पास मेरी बहन और बहनोई बैठे थे, जो तीन दिन पहले अमेरिका से आये थे. मेरे पिता जी के चचेरे भाई की बीबी, अस्सी साल की महिला, जो अभी भी काफी स्वस्थ्य और सुन्दर थी, अपने बेटे और बहू के साथ कुछ दूर बैठी थी. मेरा एक और चचेरा भाई भी अपनी बीबी के साथ वहाँ था. अप्पा ड्राइंग रूम से कुछ फुट दूर अपने बेड-रूम में, बिस्तर पर बैठकर मन्त्र सुन रहे थे और उन्हें दुहरा रहे थे.  

मेरी माँ को गुज़रे बारह दिन हो गए थे और यह धार्मिक अनुष्ठानों का अंतिम दिन था.

मेरी चाची ने मुझे बुलाया.

“वह नहीं आई है. होम-हवन अभी समाप्त हो जाएगा.”

 वह उस महिला के बारे में बता रही थी, जो भोजन के लिए आकर साड़ी, ब्लाऊज़ पीस, पान और अन्य सौभाग्य अलंकारों से सम्मानित की जाने वाली थी.

“वह किसी भी पल आयेगी, आंटी,” मैंने कहा, “ड्राइवर उसे लाने गया है.”

मैंने अपनी माँ के फोटो की तरफ देखा जो एक छोटी साइड-टेबल पर रखा था. उसे चमेली के फूलों का हार पहनाया गया था.

जैसे वह मुझे चिढ़ा रही हो.

“तो, तुम्हें इस सब पर विश्वास होने लगा है. हाँ?

मैं मन ही मन मुस्कुराई. मुझे भगवान में दृढ़ विश्वास है. मगर मैं घंटों बैठकर प्रार्थनाएं नहीं गा सकती. दिन में दो बार दीपक जलाकर मन में गायत्री मन्त्र का जाप करना ही मेरे लिए बहुत है. मैं घटनाओं को शांत रहकर स्वीकार करती हूँ. बहस नहीं करती. कभी भी गुस्सा नहीं दिखाती.

मेरी माँ हमेशा आह भरकर मुझसे कहती, “तुम्हारी बहनें तुम्हारी तरह नहीं हैं. सबसे बड़ी तो अपने घर में हमेशा कोई न कोई पूजा करती रहती है. तुमसे बड़ी ऑफिस जाते हुए सारे सहस्त्रनाम कहती है. और वहाँ, अमेरिका में भी, वह काफी सारी पूजाएँ करती है. तुम कुछ भी नहीं करतीं.”

जैसे मैं कोई नास्तिक हूँ. ओह! मैं उसे कैसे समझाऊँ कि मेरे हृदय में पांडुरंग, नटराज बसते हैं, और देवी सदैव वहाँ नृत्य करती है. मैं हंसकर कहती हूँ,

“अगर तुम्हारे दामाद को काम से लौटने में थोड़ी भी देर हो जाती हैं तो तुम परेशान होने लगती हो, कि कहीं कुछ हो तो नहीं गया. तुम रात को बाईक चलाने वाले बच्चो के बारे में परेशान  रहती हो. मगर मुझे देखो. मेरा भगवान पर पूरा विश्वास है. गणेश हमेशा मेरी साड़ी का पल्लू पकड़ कर मेरे पीछे रहता है. विश्वास महत्वपूर्ण है.”

वह मेरी तरफ देखकर कहती,

“बातों में भला तुमसे कौन जीत सकता है?

और मैं, जो उसके अनुसार नास्तिक थी, आज के दिन एक सुमंगली का सम्मान करने वाली थी – उसे खाना खिलाकर और भेंट वस्तुएं प्रदान करके. आंटी ने मुझसे कहा था, “देखो, गायत्री, करीब पचास साल बाद हमारे परिवार में किसी सुमंगली का निधन हुआ है.

मुझे मालूम है कि तुम्हें इन बातों पर विश्वास नहीं है. मगर बड़ी होने के नाते, मैं कुछ कहना चाहती हूँ. तुम्हें तेरहवीं पर किसी सुमंगली को भोजन के लिए आमंत्रित करना है और उसे लाल रंग की साड़ी देना है.”

मैं सहमत हो गई. मेरे पति को नौ गज की लाल साड़ी लेने के लिए उस भयानक ठंडे दिन में भागना पडा. नल्ली की साउथ एक्सटेंशन वाली ब्रांच में लाल साड़ी नहीं थी. आखिरकार मुनीरका की एक दुकान में वह मिल गई.

“ओह! तुम्हारी माँ ने मुझे दौड़ा दिया.”

और मेरी माँ मुझे चिढाते हुए मुस्कुरा रही थी. मैं भी मुस्कुरा रही थी.

“चिट्टी ने मुझसे कहा कि उस महिला के रूप में आज तुम यहाँ आने वाली हो, इसीलिये!” मैंने अपने आप से कहा.  

वह महिला अन्दर आई. वह ऊँची और अच्छी कद काठी की थी. मेरी माँ जैसी गोरी तो नहीं थी, मगर पचास से ऊपर की उम्र में भी काफी सुन्दर थी. कानों की और नाक की कृत्रिम बालियाँ चमक रही थीं. उसके गले में पीला धागा था. कांच की और प्लास्टिक की चूड़ियाँ खनखना रही थीं. बहुत प्यारी महिला थी.

“तुम्हारी सास यहाँ है,” मैंने अपने पति से कहा और मेरी बहन ने मेरी तरफ देखा.

“कम से कम आज तो ऐसी छिछोरी बात न बोलो,” वह हमेशा से संवेदनशील रही है.

पूजा समाप्त हो गई और पुजारियों के साथ ही वह महिला भी खाने के लिए बैठी.

मैं और मेरी बहन उसे परोस रहे थे.

अजीब बात थी. जिस तरह से वह खा रही थी, उससे मुझे माँ की याद आ रही थी. वह चाव से खीर खा रही थी. (मुझे एक चम्मच और दो गायत्री...मैं एक ज़्यादा डाओनिल-        डायबिटीज़ की गोली ले लूँगी).

खाने के बाद वह पान खाने बैठी. हाँ.

बिलकुल मेरी माँ की तरह...पान के ऊपर पान खाए जा रही थी. हम अपनी माँ को – बकरी- कहते थे.

उसे साड़ी, ब्लाउज पीस और छोटा सा आईना, कंघी बहुत अच्छे लगे. दक्षिणा पाकर वह खुश हो गई. उसने कहा कि उसे खाना पसंद आया था. केटरर ने ही उसका नाम सुझाया था, और हमारा ड्राईवर उसे लेकर आया था, और अब वापस छोड़कर भी आयेगा.

वह जाने के लिए उठी.

उसने मुझसे कहा,

“अगर तुम्हें किसी मिठाई या नमकीन की ज़रुरत हो तो तुम मुझे बता सकती हो. मैं बना दूंगी और तुम्हारा ड्राईवर – अब उसे मेरा घर मालूम है – लेकर आ सकता है. मैं पापड, चिप्स और अचार भी बनाती हूँ.” उसने हमसे बिदा ली.

जब वह दरवाज़े से बाहर निकली तो मुझे लगा कि मैंने उसका नाम भी नहीं पूछा था.

“आंटी, आपका नाम?” मैंने और मेरी बहन ने एक साथ पूछा.

वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई. मैंने सोचा कि वह मुझे चिढा रही थी. पता नहीं...

उसने कहा, “मोहना.”

और सीढियां उतरकर सर्दियों की उस ठंडी शाम में बाहर निकल गई.

हम दोनों जैसे फर्श से चिपके खड़े थे. भगवान जाने, कितनी देर.

.

.

.

      मोहना मेरी माँ का नाम था.

***********

 

 

 

 

पेटबोला

 

ये जैसे घटनाओं का पूर्ण संयोजन था.

मुझे पूरा विश्वास था कि इस चिड़चिडे, नौजवान सिक्यूरिटी गार्ड का उस ख़ूबसूरत बिल्ली के गायब होने में या उसकी मौत में हाथ था. संबंध एकदम स्पष्ट था.

चलिए, समझाती हूँ कि मैं इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँची. उससे पहले, आपको उलझन में डालने के बजाय, मुझे यह बताना पडेगा कि मैं किस बारे में बात कर रही हूँ. 

बात ऐसी है.

तीसरी मंजिल के हमारे अपार्टमेंट की बाल्कनी से मैं हमारे पड़ोसी के घर को अच्छी तरह देख सकती हूँ. मेरा मतलब है, सीमेंट का कम्पाउंड, गैरेज जिसमें तीन कारें हैं, आम का पेड़, नीम का पेड़, और बेशक, घर के लोगों को बाहर आते-जाते देख सकती हूँ. हमारा संबंध उनसे बहुत कम था क्योंकि वे काफी व्यस्त थे और हम, बूढ़े भी अपने काम से काम रखते थे. हमारी बातचीत सिर्फ एक इक्कीस साल के लडके से होती थी, जिसे हम तब से जानते हैं, जब उन्नीस साल पहले हम इस अपार्टमेंट में आये थे. तब वह बहुत छोटा था; एक प्यारा बच्चा. जब वह अपने चचेरे भाइयों के साथ फुटबॉल या क्रिकेट खेलता, तो हम – मैं और मेरे पति – बाल्कनी से उसका हौसला बढाया करते. कभी कभी वह ऊपर देख लेता और अगर मुझे बाल्कनी में खड़े देखता तो उसके चहरे पर प्यारी मुस्कान छा जाती, वह हाथ हिलाता और पूछता, “आप कैसी हैं, आंटी?”

यह एक संयुक्त परिवार था – तीन भाईयों और उनके परिवारों का जो उस बिल्डिंग में एक एक मंजिल पर रहते थे. समय के साथ बच्चे बड़े हो गए, और हम उन्हें उतना नहीं देख पाते थे. क्रिकेट नहीं, फुटबॉल नहीं.

फिर,

आई वह बिल्ली.   

कहानी के आरम्भ की ओर चलते हैं.

मुझे आपको बताना पडेगा कि बिल्ली मेरे कथानक का केंद्र है.

यह एक कैलिको बिल्ली थी. अच्छा, सही सही बताऊँ तो कैलिको बिल्ली सफ़ेद होती है और उसके बदन पर कहीं-कहीं काले और पीले-भूरे धब्बे होते हैं. वह ख़ूबसूरत बिल्ली (ज़्यादातर कैलिको बिल्लियाँ मादा होती हैं, जहाँ तक मेरा ख़याल है) कंपाऊंड में घूमा करती: कार-शेड में या डोर-मैट पर सो जाती; दीवार पर चढ़ जाती और कार शेड की छत पर गिरे हुए आम के पत्ते देखती या फिर सर्दियों की हल्की धूप में थोड़ी देर वहाँ सो जाती. गर्मियों में वह टीन की गर्म छत पर नज़र नहीं आती. दिन में तीन बार उसे खाना दिया जाता – वह महिला अथवा उसका पति एक बॉक्स में कुछ लाते और पाँच-छः मुट्ठियाँ एक लाल बाउल में डाल देते जो इस बिल्ली का था.

उस बिल्डिंग के वाचमैन कुछ महीनों में बदला जाते, क्योंकि वे किसी एजेंसी की मार्फ़त आया करते थे. बूढा वाचमैन उस बिल्ली को बहुत चाहता था. वह उसके पीछे-पीछे जाती, और वाचमैन भी अपने लंच बॉक्स में से उसे कुछ खाना दे देता.

फिर यह नौजवान वाचमैन प्रकट हुआ.

बिल्ली उसकी परवाह नहीं करती थी, क्योंकि वह उसे भगा दिया करता. मैंने उसे दो-तीन बार उस ख़ूबसूरत प्राणी को भगाते हुए देखा था – बेशक, मेमसा’ब और सा’ब को पता चले बगैर, जो उसे बेहद प्यार करते थे.

लोंकडाउन की वजह से नौकरानियां इस बिल्डिंग में काम पर नहीं आती थीं, जैसा कि लगभग सभी घरों का हाल था. मैंने नौकरानियों को भी अपने लंच बॉक्स से बिल्ली को खाना देते हुए देखा था.

मैंने इस सिक्यूरिटी गार्ड को – शायद उसका नाम संजय था – कभी-कभी वहाँ की मैडम से चाय का बड़ा मग लेते हुए देखा था.

एक दिन मैंने उस सुन्दर प्राणी की दर्द भरी ‘म्याऊँ’ सुनी और उस चिड़चिड़े वाचमैन को उसके पीछे भागते देखा. वह शेड में रखी लाल कार के पीछे छिप गई. उन दिनों कारें कम ही निकाली जाती थीं. वह हाथ में एक लंबा डंडा लिए उसे ढूंढ रहा था, इस इंतज़ार में कि वह बाहर आयेगी. मगर वह बाहर ही नहीं आई, शायद उसे खतरे का एहसास हो गया था. मगर उसे खिलाने का कार्यक्रम यथावत चलता रहा और अब मैं उसे सीढ़ियों पर या डोरमैट पर बैठे नहीं देखती थी. दरवाज़े और दीवार के बीच की जगह पर भी वह नहीं दिखाई देती.

मैंने महसूस किया कि वह वाचमैन से कतरा रही है. मुझे समझ में नहीं आता था कि उस प्यारे प्राणी को सताने से उसे कौन सी खुशी हासिल होती है. बिल्ली भी भांप गई थी कि यह इंसान उससे नफ़रत करता है, जिसकी वजह शायद उसी को मालूम थी.

फिर

वह गायब हो गई!     

मेरी आदत थी कि मैं हर रोज़ सुबह अपनी बाल्कनी में खड़े होकर उसे लाल बाउल से प्यार से अपना खाना खाते देखती थी. मैं देख रही थी कि वह महिला और उसके पति बदहवासी से उसे ढूंढ रहे थे. हाँलाकि बिल्ली को घर के भीतर जाना मना था, मगर बेशक, वह उनकी लाडली थी. वे वाचमैन से पूछ रहे थे, और उनके हाव भावों से ज़ाहिर हो रहा था, कि वाचमैन उसके बारे में कुछ भी मालूम होने से इनकार कर रहा था.

खाना लाल बाउल में तब तक पडा रहता, जब तक कौए आकर टुकडे न ले जाते. यह दो दिन चला, फिर उस दंपत्ति ने बिल्ली को ढूँढना बंद कर दिया.

मेरा दिल मुझसे कह रहा था कि बिल्ली के गायब होने में इस वाचमैन का हाथ है.

उस ख़ूबसूरत बिल्ली के बारे में सोचकर मैं बहुत उदास थी.

फिर मेरे मन में एक विचार कौंध गया – ‘पेटबोलापन’! 

मुझे याद है कि मेरे पति और बच्चे मेरा मज़ाक उड़ाया करते, जब मैं कोई बीस साल पहले ‘पेटबोलेपन’ का एक सप्ताह का क्रैश कोर्स करना चाहती थी, जब हम मुम्बई में थे. 

 मुझे याद है कि मेरी सास ने भी खडूसपन से कहा था, “बेकार नाई ने एक बिल्ले को पकड़ा और उसकी हजामत बना दी.”

मगर मुझे वाकई में दिलचस्पी थी, इसलिए मैंने वह कोर्स कर लिया. बेशक, मैंने कठपुतलियों के कोई ‘शो’ नहीं किये, मगर मैं मार्केट में आवाजें निकालकर मज़ा लेती थी, सब्जियों और फलों पर कमेन्ट करती. कुछ सब्जियों को बोलने पर मजबूर करती और एक महिला को तो मैंने डरा ही दिया, जो सब्जी वाले से बहुत ज़्यादा भाव-ताव कर रही थी. वो एक अलग कहानी है.

तो, मैंने तय कर लिया कि मैं अपना ‘पेटबोली’ का हुनर इस्तेमाल करके एक छोटा सा जासूसी कारनामा करूंगी, यह पता करने के लिए कि क्या सिक्यूरटी वाले छोकरे ने बिल्ली को मारकर उसे फेंक दिया था!

अगली सुबह मैं बाल्कनी में बैठ गई और जैसे ही वह छोकरा अपनी चाय पीने के लिए बैठा, मैंने आवाज़ निकाली...

“म्याऊँ“...

वह चौंक गया और फर्श पर अपना ‘मग’ रखकर खडा हो गया और इधर-उधर देखने लगा. सौभाग्य से उसने ऊपर नज़र नहीं डाली और मुझे नहीं देखा.

आसपास किसी बिल्ली को न देखकर वह अपने ‘चाय के कार्यक्रम पर वापस आया.

“म्याऊँ”.

मैंने फिर कहा, इस बार ज़्यादा देर तक और ज़्यादा दर्द से.

यही सब शाम को भी दुहराया गया और मैं देख सकती थी कि वह बेचैन हो गया है.

अब “म्याऊँ” बार बार सुनाई देने लगा और कभी-कभी तो उसके बिलकुल पास भी.

एक सप्ताह बीत गया. मैं अपने हुनर का मज़ा ले रही थी.

फिर एक दिन...

काफी सारी आवाजें सुनाई दीं, तो मैंने नीचे झांककर देखा.

सिक्यूरिटी वाला छोकरा अपने घुटनों पर बैठकर पति-पत्नी से – बिल्ली के चाहने वालों से गुजारिश कर रहा था.

उस महिला ने ऊपर देखा और मुझे बाल्कनी की रेलिंग पर झुका देखा.

अठारह साल की मुस्कानों के आदान प्रदान ने बातचीत को मौक़ा दिया. उसने मुझसे कहा,

“इस आदमी ने हमारी बिल्ली को मार डाला और दूर जाकर फेंक दिया! वह स्वीकार कर रहा है. कहता है कि बिल्ली उसके पीछे पड़ गई है और सुबह-शाम रोती है और वह ये सब बर्दाश्त नहीं कर सकता. वह नौकरी छोड़ना चाहता है.”

“उसने ऐसा क्यों किया?” मैंने पूछा.

“वह कहता है कि उसे बचपन से ही बिल्लियों से नफ़रत है, जब एक बिल्ली ने उसे काट कर लहूलुहान कर दिया था. वह अपना काम छोड़ना चाहता है, और हमें कोई आपत्ति नहीं है. कैसा खतरनाक कारनामा! आह! मेरी प्यारी लूलू.”

उसने नाक से सूं सूं किया.

लूलू उस बिल्ली का नाम था.

उसकी जगह पर एक हफ्ते बाद एक बूढ़े वाचमैन को रखा गया.

हाँ, उसी बूढ़े वाचमैन को जिसके पीछे-पीछे लूलू भागती थी और वह अपने लंच बॉक्स से उसे कुछ तुकडे दिया करता था.

एक महीना बीत गया. मैं अपने आप से काफी संतुष्ट थी कि मैं अपने ‘पेटबोली के हुनर का  ‘ह्त्या’ जैसे संगीन जुर्म के इकबाल करवाने में प्रयोग कर सकी थी.

मैं नीचे कम्पाउंड की दीवार के पास लगे पेड़ से कुछ फूल तोड़ने गई थी.

“आप कैसी हैं, मैडम?

ये पड़ोस वाला वाचमैन था, वह बहुत बातूनी था.

मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराई.

“तो, तुम वापस आ गए?

“हाँ, मैडम. मैं बीमार था, इसलिए छुट्टी ली थी. अब मैं ठीक हूँ.”

उसका वज़न काफी कम हो गया था. 

मैंने हिचकिचाते हुए उससे पूछा,

“वो पहले वाला लड़का...मेरा मतलब है...वो छोकरा, जिसने बिल्ली को मार डाला था...क्या कहीं और काम कर रहा है?” मुझे कुछ अपराध बोध भी हो रहा था, कि उसने नौकरी छोड़ दी थी.

“आआ!! वो एक सच्ची कहानी है, मैडम,” वह मुस्कुराकर आगे बोला,

“कल मैंने यहाँ आते हुए उसे एक बंगले में देखा था. वह काम पर आया ही था. उसके पास बन्स का पैकेट था. उसने कहा कि वह हर रोज़ पड़ोस की चार बिल्लियों को खिलाता है. और शायद इसे साबित करने के लिए बिल्लियाँ दौड़ती हुई उसके पास आईं....करीब सात बिल्लियाँ, न सिर्फ चार, और वह बन्स के टुकडे करके उन्हें दे रहा था. वह बड़ा खुश लग रहा था. अजीब बात है, मैडम. कैसा बदलाव! ईश्वर महान है. वह छोकरा दयालु आत्मा बन गया है.”

मैं घर वापस चली आई. मेरे दिल से एक बड़ा बोझ उतर गया था. मेरे मन का अपराध बोध दूर हो गया.

थैंक्स गॉड, ‘पेटबोलेपन ने उस छोकरे को अवसाद ग्रस्त नहीं किया, बल्कि उसे एक दयालु आत्मा के रूप में परिवर्तित कर दिया.  

हाँ, ईश्वर सचमुच में महान है.

 

**********

 

 

खोये हुए बर्तन का रहस्य

 

वह गायब हो गया था!

मैं एक बर्तन की बात कर रही हूँ, जिसे मैंने स्टोव्ह पर छोड़ा था. मैं पिछवाड़े – गार्डन में - गई थी थोड़ा सा धनिया पत्ता तोड़ने. जब मैं अपने पैर धोकर किचन में वापस आई, तो मैं चौंक गई, रसम् की स्वर्गीय खुशबू गायब हो चुकी थी. मुझे याद है कि बर्तन में रसम् उबल रहा था और उसकी ख़ास खुशबू पूरे घर में महक रही थी.

आश्चर्य है, कि स्टोव्ह पर रखा बर्तन भी गायब था.

अभी कुछ ही देर पहले नौकरानी, जो किचन की बगल में, डाइनिंग रूम में पोंछा लगा रही थी, बोली थी:

“अम्मा क्या खुशबू है रसम् की. मैंने कई घरों में काम किया है, मगर कोई भी तुम्हारे जैसा नहीं पकाता.”

मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुराई. मन ही मन खुश थी, नौकरानी भी मेरे पकाने की तारीफ़ कर रही थी. या, हो सकता है, कि तारीफ़ के पुल इसलिए बांधे जा रहे हों, कि इस घर में उसका भोजन सुरक्षित रहे.

आह! चापलूसी? चापलूसी किसे नहीं अच्छी लगती? मैं उसे कॉफ़ी, नाश्ता और लंच देती थी. ज़ाहिर है कि वह मेरे पकाने की तारीफ़ करेगी ही.

मेरे पति लंच के लिए घर आएंगे और मैंने रसम् और कंद फ्राय बनाने का इरादा किया था.

मुझे याद है कि मैंने रसम् वाला बर्तन स्टोव्ह पर रखा था, और जब मैं पिछवाड़े गार्डन में जा रही थी तब रसम् उबल रहा था.

हम हाल ही में मद्रास से इस छोटे से शहर लालगुडी आये थे और गैस का कनेक्शन मिलना तो अभी दूर की बात थी. गैस सिलिंडर लेने के लिए त्रिची जाना पड़ता था. मुझे केरोसिन का स्टोव्ह इस्तेमाल करना पड़ता था, एक कोयले की सिगड़ी – कुम्मटी और लकड़ियों वाला बड़ा ओव्हन भी था – पकाने और गरम करने के लिए. ओव्हन अपने चौड़े मुँह से लपटें फेंकता. मेरा बर्तन तो उस ज्वालामुखी में समा जाता. इसलिए, मैंने बर्तन को केरोसिन स्टोव्ह पर रखा था.

एक मिनट के लिए मेरी पीठ में ठंडी लहर दौड़ गई.

मेरी नौकरानी की बूढ़ी माँ कल सुबह मेरे पास आई थी, यह सुनिश्चित करके कि मैं घर में अकेली हूँ, जिससे वह ऊँची आवाज़ में बतिया सके. उसकी आवाज़ खूब ऊँची थी. मेरे पति दफ्तर चले गए थे, जो हमारे घर से नज़दीक ही था.

उसने बताया:

“तुम बहुत बहादुर हो, जो इस घर को किराए पर लिया. यह बंगला तीन साल से बंद था, क्योंकि कोई इसमें रहना ही नहीं चाहता था. पता है, कोने वाले कमरे की छत गिर गई थी और एक मेसन उसमें दब कर मर गया था.

ऐसा कहते हैं कि उसका भूत इस घर में घूमता है. बेशक, मैं इस बकवास में भरोसा नहीं करती.”

मैंने हँस कर उससे कहा,

“मैं भी इस सब में विश्वास नहीं करती. मुझे ऐसा कोई घर दिखाओ, जहाँ कभी कोई न मरा हो?”

मैंने उसे एक कप चाय दी और वह थोड़ी देर गपशप करने के बाद चली गई.

मेरे पति ने मुझे इस बारे में बताया था और हमने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था. वैसे, कोइ भी अमर नहीं है और एक न एक दिन सभी को मरना ही है. यह आत्महत्या का मामला नहीं था. हमारी नई-नई शादी हुई थी, और मैं बहुत सारी बातों पर शक करती थी.

मगर इस समय ये ख़याल क्यों मेरा पीछा कर रहा है? मैं कुछ चिडचिड़ाहट महसूस करने लगी.

कहीं उस मेसन का भूत तो बर्तन नहीं ले गया?

हा हा हा! भूत, जिसे रसम् पसंद है? वह उड़ता हुआ आया होगा और उसने स्टोव्ह से बर्तन हटाया होगा?

मैंने फ़ौरन इन अजीबोगरीब विचारों को दूर हटाया और पिछवाड़े कुएँ के पास गई जहाँ नौकरानी बर्तन साफ़ कर रही थी.

“कामाक्षी, क्या मैंने तुम्हें रसम् वाला बर्तन धोने के लिए दिया है?

उसने परेशानी से मेरी तरफ देखा.

“अम्मा, मैंने पोंछा लगाते समय रसम् के बारे में तुमसे कहा था. तब तो वह स्टोव्ह पर ही था.”

“अरे, अब वो वहाँ नहीं है. मैं अय्या के लिए नया सांबार बना रही हूँ. (वह मेरे पति को ‘अय्या’ – साहब – कहकर संबोधित करती थी.) मैं ये देखने के लिए आई थी कि कहीं बर्तन यहाँ तो नहीं है, किचन में तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है.”

“नहीं, अम्मा, मुझे पक्का याद है कि वह स्टोव्ह पर था और उबल रहा था. हो सकता है...” उसने कुछ हिचकिचाते हुए मेरी ओर देखा...हाँ, आगे कुछ कहे या नहीं.

कहे या ना कहे...

फिर वह अपने कंधे सिकोड़कर बोली,

“क्या हम उस कमरे में जाकर देखें?

उसका इशारा उस छोटे से कमरे की तरफ था जहाँ मेसन मर गया था और जहाँ ‘रात को उसकी आत्मा घूमती थी.’

“वह मेरे बाथरूम के पास है, और इस तरफ से भी खुलता है.”

घर के आख़िरी हिस्से में एक छोटा सा बाथरूम-टॉयलेट था मज़दूरों के लिए.

अब मैं भी थोड़ी घबरा गई.

हालांकि मैं बेकार की बातों में विश्वास नहीं करती और इस अफवाह में भी कि यह घर भुतहा है, मगर मैं कुछ परेशान हो गई. हमें यहाँ आये एक महीना हो गया था और हमें कोई भी अजीब बात नज़र नहीं आई थी और ‘छोटे कमरे के बारे में पड़ोसियों की बकवास की हमें आदत हो गई थी. बंगला सुन्दर था, सामने की तरफ फूलों का गार्डन और पिछवाड़े में किचन-गार्डन था. बहुत सारे केले के पेड़ थे. नौकरानी ने बताया था कि बारिश के मौसम में कुएँ में इतना पानी भर जाता था कि हम अपने हाथों से पानी निकाल सकते थे.

हमें घर पसंद था.

हमारा एक अच्छा पूजा-घर था जहाँ सारे भगवान मुस्कुराया करते – तस्वीरों के रूप में या मूर्तियों के रूप में. मैं हमेशा से चाहती थी कि एक अलग पूजा-घर हो, जैसा मेरे मायके में और ननिहाल में था. मेरी इच्छा यहाँ आकर पूरी हुई थी. और, हालांकि मैं आत्माओं में तो विश्वास करती थी, मगर मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि यह घर भुतहा है.

“बकवास!!” मैंने हँस कर कहा था.

मगर इस ‘गायब हुए बर्तन ने मेरे मन में एक अनजाना भय पैदा कर दिया था.

अगर, भूत तो आधी रात के बाद ही तैरते हैं.

हम दोनों ने डरते हुए छोटे वाले कमरे का दरवाज़ा खोला. वह साफ़ किया गया था, और उसमें टाईल्स की छत से होकर सूरज की किरण आ रही थी. घर के पिछवाड़े और किचन में टाईल्स लगाई गई थीं. और ऑफिस के इस घर को किराए पर लेने से पहले उसकी पुताई हुई थी और पुरानी टाईल्स को हटा कर नई टाईल्स लगाई गई थीं.

यहाँ कोई ‘बर्तन’ नहीं था. मैं इस कमरे में पहली बार आई थी वह मुझे काफी गर्म और आरामदेह लग रहा था.

हम वापस गए.

‘गायब हुए बर्तन’ का रहस्य सुलझा नहीं था.

 मैंने खाना बना लिया और किचन का प्लेटफॉर्म साफ़ कर दिया, और एक पत्रिका लेकर पन्ने पलटने लगी.

मेरा मन नहीं लग रहा था.

“अम्मा.”  

ये कामाक्षी थी.

“तुमने मुझे स्टोव्ह साफ़ करने के लिए कहा था, बत्तियां बाहर खींचकर केरोसिन भरने को कहा था. मैंने बाकी सब काम पूरा कर लिया है, अगर मुझे स्टोव्ह दो तो वह काम कर लेती हूँ.”

मैं किचन में गई और स्टोव्ह बाहर लाई, अब तक वह बरामदे में कुछ फटे हुए कपड़ों के साथ, कैरोसिन का डिब्बा, एक चुंगी और पम्प लेकर बैठ गई थी.

मैं उससे कुछ दूर बैठ गई, उसे देखते हुए और शुक्र मनाते हुए कि मुझे स्टोव्ह साफ़ नहीं करना है, और कालिख और कैरोसीन से हाथ खराब नहीं करने हैं,      

शुरू करने से पहले उसने मेरी तरफ कुछ उम्मीद से देखा.

“अम्मा, मैं एक सायबू को जानती हूँ, जो रिटायर्ड पादरी है. वह बहुत बूढा है और उसने बहुत सारे लोगों को खोई हुई चीज़ों को वापस पाने में मदद की है. असल में, उसने हमारी गाय भी ढूंढ दी थी, अगले गाँव से, जहाँ हमारे रिश्तेदार ने अपनी टपरी में उसे छुपा रखा था. सायबू सिर्फ एक पान का पत्ता लेकर उस पर काजल फेरता है, और कुछ मन्त्र पढ़ता है. कुछ ही पलों में पत्ता आपको खोई हुई चीज़ का सही पता बता देता है. हम उसकी मदद ले सकते हैं और तुम्हारा बर्तन वापस पा सकते हैं.”

मैंने उसकी ओर देखा और जोर से हंसने लगी.

“कामाक्षी, सामने का दरवाज़ा बंद है, और तुम पिछवाड़े में बर्तन धो रही थीं. आखिर कोई यहाँ आकर तो बर्तन नहीं चुरा सकता था.”

अगर वो आत्मा...मेसन वाली, उसने बर्तन उठा लिया हो तो? ‘उसने उसे गार्डन में गाड दिया होगा.”

उसे मेसन की आत्मा पर विश्वास होने लगा था.

उसने मुझे दोपहर में जाकर उस बूढ़े आदमी से मिलने के लिए मना लिया. बेदिल से मैं राज़ी हो गई.

उसने स्टोव्ह का ऊपरी हिस्सा हटाया, जहाँ से बत्तियां निकलती थीं. उसकी आंखें किसी चीज़ पर ठहर गईं.

वह हँसते हुए लोटपोट हो गई.

मैंने उसे घूरा.

वहाँ, उसके हाथों में मेरा ‘रसम् का बर्तन’ था एक चमकती हुई गेंद के रूप में.

ऊप्स!!

मुझे याद आया – मेरी माँ मुझे हमेशा चेतावनी देती थी, “इस बर्तन को स्टोव्ह पर रखकर इधर उधर घूमने न चली जाना. अगर इसमें रखा हुआ पदार्थ भाप बन गया, तो बर्तन पिघल जाएगा.”

इस छोटे शहर में आने से पहले उसने मुझे सख्त हिदायत दी थी. ये – हमारी शादी के फ़ौरन बाद की बात है. उस समय तक हम ससुराल वाले घर में ताँबे के बर्तन में रसम् बनाया करते थे, और मैंने कभी भी इस ख़ास बर्तन का प्रयोग नहीं किया था, जो टीन की किसी मिश्र धातु से बना था.

शादी से पहले मैंने कभी भी पूरा खाना नहीं बनाया था. बेशक, मैं दोसे और चपाती बनाया करती और माँ की घर के अन्य कामों में मदद करती.

मैं उसकी चेतावनी को पूरी तरह भूल गई थी.

नन्हा बर्तन पिघल गया था और स्टोव्ह की गहराई में एक चमकदार गेंद के रूप में गिर गया था.

“अच्छा, कामाक्षी”, मैंने उससे कहा, “एक बात तो साबित हो गई – मेसन की आत्मा का अस्तित्व नहीं है. उस आत्मा को मुक्ति मिल गई है.”

 

**********

  

                          मॉनसून मैजिक 


राधा ने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखा.

आसमान बहुत काला था और बादल यूँ भाग रहे थे जैसे किसी चीज़ को दुबारा हासिल करना चाहते हों, जिसे वे अपने साथ ले जाना भूल गए थे.

तेज़ रफ़्तार में पर्वत और छोटे-छोटे गाँव ओझल होते जा रहे थे.

अभी दो घंटे का सफ़र बाकी था.

मेरी ज़िंदगी के सफ़र के मुकाबले में दो घंटे क्या चीज़ हैं? मैं करीब पचास साल से सफ़र कर रही हूँ.”

उसके चहरे पर क्षीण मुस्कान तैर गई.

उसके सामने बैठी महिला एक पत्रिका पढ़ने में मगन थी. किसी फिल्म ऐक्ट्रेस के दुस्साहसिक  कारनामों का लुत्फ़ उठा रही थी. दूसरा सह-प्रवासी एक बूढा आदमी था जो कुछ बुदबुदा रहा था, वह बीच-बीच में राधा की ओर देख लेता. .

राधा ने अपनी किताब बंद की और उसे बैग में रख दिया.

ये थी अलेक्सान्दर फ्रेटर की “चेज़िग द मॉनसून”. बहुत दिलचस्प किताब थी, ये लेखक की भारत में केरल से चेरापूंजी तक की यात्रा के बारे में थी, जहाँ कुछ वर्ष पूर्व तक मॉनसून की सबसे ज़्यादा बारिश हुआ करती थी. लेखक ने मॉनसून के क्षणों का पीछा किया था. बहुत रोचक और अच्छी तरह से लिखी गई किताब थी. भाषा का प्रवाह अद्भुत था और हर पल लेखक की उत्सुकता को दर्शाता था, बारिश का वर्णन – एक मासूम धार और फुहार से लेकर मूसलाधार बारिश तक, जो भयानक बाढ़ लाती है – शानदार था. 

कुछ ही पृष्ठ शेष बचे थे, मगर उसने किताब को बंद करके रख दिया.

अब वह बारिश को महसूस करना चाहती थी. बारिश फुहार की तरह शुरू हुई, चौड़ी खिड़की पर डिजाईन्स बनाते हुए. वह छोटे-छोटे नाले बना रही थी.

बौछारों ने पत्तों और घास को नहला दिया था जो अब प्यारे रंगों में चमक रहे थे. पेड़ हवा में झूम रहे थे. लाल मिट्टी पर पानी के डबरे बन गए थे. कुछ रास्तों पर आदमी और औरतें छाता खोले भागते दिखाई दे रहे थे. मवेशी बारिश की बूंदों का आनंद लेते हुए खड़े थे.

राधा हर पल का आनंद उठा रही थी.       

“साल कैसे गुज़र गए!!” उसने सोचा.

पच्चीस साल पहले उसने एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था.

तभी उसकी मुलाक़ात श्रीकांत से हुई थी.

साहित्य के प्रति प्यार उन्हें एक साथ लाया था, और जल्दी ही उन्होंने महसूस किया कि वे भी प्यार करने लगे हैं.

उसके माता-पिता और भाईयों का सख्त विरोध था क्योंकि श्रीकांत गरीब था, उसकी तीन छोटी बहनें थीं और माँ-बाप की भी देखभाल करनी थी.

विरोध तेज़ी से बढ़ता गया और उसका भाई राधा के लिए अपने एक अमीर दोस्त का रिश्ता लाया.

राधा ने विद्रोह कर दिया. टीचर की नौकरी करने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी – उसके भाइयों ने उससे कहा था. मगर उसे पढ़ाना अच्छा लगता था. उसे बच्चों का साथ अच्छा लगता था. उसे उनके सवालों के जवाब देना और उन्हें ज्ञान प्रदान करना अच्छा लगता था.

चूंकि विरोध की इस त्सुनामी के आगे वह कुछ भी नहीं कर सकती थी, इसलिए वह अपनी कुछ चीज़ें लेकर और सर्टिफिकेट्स लेकर घर से निकल गई और दूसरे शहर के किसी स्कूल में पढ़ाने लगी.

श्रीकांत के घर में परिस्थितियाँ कुछ ऐसी थीं कि वह तुरंत उससे शादी नहीं कर सकता था. उसके पास कोई और उपाय न था...उसने दूसरे शहर जाने का फैसला कर लिया.

राधा ने स्वयं को अपने परिवार से पूरी तरह अलग करने का फैसला कर लिया. जब वह घर से जा रही थी, तो उस पर गालियों की बौछार हो रही थी.

उसकी माँ की आवाज़ गुस्से से गूँज रही थी,

“एक दिन तुम वापस यहीं आओगी, मनहूस लड़की! कितने दिन अकेली रहोगी?”

वह नहीं रुकी.

‘घर नामक शब्द उसके लिए विस्मृति में चला गया था. लोग इतने अमानवीय कैसे हो सकते हैं?

क्या दौलत प्यार के ऊपर हावी हो गई थी? उसने श्रीकांत से बिदा नहीं ली थी.

उसने सोचा, कि उसमें कोई तुक नहीं था.

उस दिन भी बारिश हो रही थी जब वह अपना घर छोड़कर निकली थी.

“मेरी ज़िंदगी में बारिश की अहम् भूमिका है,” उसने बाहर देखते हुए सोचा.

अब बारिश बहुत तेज़ हो गई थी और ट्रेन की रफ़्तार कम हो गई थी.

“एक घंटा देरी से चल रही है,” सामने बैठे बूढ़े आदमी ने उससे कहा. वह मुस्कुराई...

ट्रेन उसके गंतव्य पर आकर रुकी. वह पहुंच गई थी और बारिश भी रुक गई.

एक टैक्सी रोकी, अपने दोनों सूटकेस उठाने के लिए उसे एक कुली मिल गया, सामान रखवाकर वह टैक्सी में बैठ गई.

टैक्सी ड्राइवर प्रसन्न चित्त व्यक्ति था, जिसने सामान रखवाने में उसकी सहायता की.

शान्ति निलय.

यह था नाम उस ‘ओल्ड एज होम का जहाँ वह जाने वाली थी.

हाँ. इसका उसके लिए बहुत महत्त्व था....इस नाम का. उसे शान्ति की इच्छा थी. 

जीवन के संध्या काल में शान्ति. उसकी यादें अब उसकी चिर संगिनी रहेंगी.

श्रीकांत की यादें.

उसने इस वृद्धाश्रम के बारे में अखबार में इश्तेहार देखा था, और यह भी कि वह एक महिला को ढूंढ रहे हैं, जो आश्रमवासियों को संगीत और मंत्रोच्चारण सिखा सके और आध्यात्मिक कहानियों से उन्हें अवगत  कराये. वह इस सब के लिए योग्य थी.

“बच्चों को पढ़ाने से बड़ों को पढ़ाने तक.”

‘आह!! क्या दोनों में कोई अंतर है?’ वह सोच रही थी.

इस संस्था के साथ ई-मेल्स का आदान-प्रदान हुआ था और उसने यहाँ आने का फैसला कर लिया. यह एक सुरक्षित आश्रय-स्थल था. उसे एक छोटे से घर और अच्छे खाने का वादा किया गया था. यहाँ कोई पॉलिटिक्स नहीं होगी, व्यर्थ की अफवाहें नहीं होंगी. उन्होंने उसे लिखा था कि वहाँ एक बड़ी लाइब्रेरी भी है.

टैक्सी से उतरते हुए वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी.

टैक्सी ड्राइवर बहुत खुश हो गया, जब राधा ने उसे काफी अच्छे पैसे दिए.

जब उसने शान्ति निलय में प्रवेश किया तो दो महिलाओं और एक पुरुष ने बड़ी प्रसन्नता से उसका स्वागत किया.

‘मुझे ये मुस्कुराते हुए चेहरे अच्छे लगते हैं,’ राधा ने सोचा.

“मैडम, उम्मीद है आपका सफ़र अच्छा रहा,” राजाराम ने अपना परिचय देते हुए कहा. वह यहाँ असिस्टेंट मैनेजर था. दोनों महिलाओं ने उसे आदर से बिठाया और उसके लिए गर्म कॉफी का ऑर्डर दिया.

“कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, मैडम और फिर आप मैनेजर से मिलेंगी, जो आपको ऑफिशियल अपोइन्ट्मेन्ट लेटर देंगे.”

बढ़िया कॉफी के बाद उसे मैनेजर के कमरे में ले जाया गया.

उसने मैनेजर की और देखा जो उसका स्वागत करने के लिए उठकर खडा हो गया था.

मैनेजर.

श्रीकांत था.

वह उसकी ओर गौर से देखने लगी. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

वह ज़्यादा नहीं बदला था.

बाल थोड़े पीछे की तरफ चले गए थे, मगर...उसके गाल का डिम्पल...उसके होंठ पर बाईं ओर का तिल...ये...ये था...श्रीकांत.

वह भी सम्पूर्ण अविश्वास से उसकी तरफ देख रहा था.

वह लड़खड़ा गया....हकलाने लगा...

“ये सिग्नेचर हैं...आपने...लिखा है...राधाश्री. कल्पना भी नहीं की थी कि ये तुम होगी!”

उसके होंठ थरथराये.

“हाँ, राधाश्री...तुम्हारे नाम का श्री.”

अब उसकी आंखों में आँसू आ गए थे.

मेज़ पर उसकी एक फोटो थी. एक फोटो जो काफी साल पुरानी थी. स्कूल के ग्रुप फोटो से अलग करके निकाली गई थी.

धब्बेदार लाल-भूरी.

वह भी उसकी यादों में ही जी रहा था.

कितना बड़ा अंतराल, राधा! मैं इंतज़ार करता रहा. मुझे यह विश्वास था कि किसी दिन हम ज़रूर मिलेंगे,” वह बुदबुदाया.

अब दोनों मुस्कुरा रहे थे.

बारिश फिर से शुरू  हो गई थी.

 

******

 

 

एक नई ज़िंदगी

वीणा ने खिड़की से बाहर देखा, आकाश काला और अमंगल प्रतीत हो रहा था.

‘अब किसी भी समय बारिश हो सकती है’, वह फुसफुसाई. उसके दिल में खुशी की लहर दौड़ रही थी.

तेज़ हवा बहाने लगी और पेड़ झूलने लगे. पत्ते कंपकंपाने लगे. गुलाब झुक गए. घास के पत्ते एक दूसरे पर गिरकर हवा की लय में नृत्य करने लगे. ऐसा लग रहा था कि बारिश का बड़ी खुशी से स्वागत किया जा रहा था.

मॉनसून हमेशा ही जादू बुनता है.

अब, वह एक फुहार के रूप में आरम्भ हुई. हल्की फुहार मोटी-मोटी बूंदों के रूप में बदल कर, सारे पेड़ों को, झाड़ियों को, पत्तों को, फूलों को और कलियों को भिगोते हुए धरती पर गिरने लगी. लाल धरती पर छोटी-छोटी नदियाँ बन गईं. बड़ी जल्दी पानी के डबरे बन गए. 

वीणा के हृदय में खुशी का एहसास था.

उसे बारिश अच्छी लगती थी. उसे सराबोर भीगना अच्छा लगता था. चेहरे पर और फ़ैली हुई बांहों पर गिरती ठंडी बूंदों को महसूस करना और अंत में पूरी तरह सराबोर हो जाना, कैसी आश्चर्यजनक भावना थी यह, पूरी तरह भीग जाना!

 उसके ख़याल उस विशिषदिन पर वापस गए, जब बारिश ने पूरी तरह उसके जीवन के प्रवाह को बदल दिया था.

शादी एक महीने में होने वाली थी और सुदीप घर आया था, उसे अपनी नई कार में ड्राइव पर ले जाने के लिए, जो उसने हाल ही में खरीदी थी.

“बारिश होने वाली है, सुदीप. तुम अपनी ड्राइव को कल तक के लिए क्यों नहीं टाल देते? अब चाय पियो और मैं तुम दोनों के लिए गरम समोसे ताल देती हूँ,” वीणा की माँ नलिनी ने सुदीप से कहा, जब वह सोफे पर बैठ गया.

“अभी नहीं, आंटी. मुझे मालूम है कि वीणा को बारिश पसंद है. हम आधे घंटे में वापस आ जायेंगे. मुझे एक घंटे के अन्दर घर पहुँचना है, क्योंकि मेरी बहन सरस आज रात को आ रही है.”

वीणा के पैरों में मानो स्प्रिंग लग गई थी, जब वह कार की तरफ जा रही थी.

लव-बर्ड्स की तरह वे लगातार बातें कर रहे थे. सुंदर भविष्य के लिए सपने बुन रहे थे.

सुदीप मसूरी की आई.ए.एस अकादमी में लेक्चरर के पद पर नियुक्त हुआ था. वीणा को मसूरी जाने का ख़याल बहुत अच्छा लगा था क्योंकि वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य ऊटी से बहुत अलग नहीं था, जहाँ वह बड़ी हुई थी.

उसका भी अपना व्यवसाय था. हाँ...वह एक उभरती हुई लेखिका थी और उसके दो उपन्यास ‘बेस्ट सेलर बन गए थे.

ऊटी बहुत प्यारी जगह थी और वीणा के पिता  को विरासत में कुछ ज़मीन मिली थी, जहाँ वे चाय उगाते थे. उनका कुन्नूर में एक कॉफी प्लांटेशन भी था. परिवार छोटा सा था और ज़िंदगी प्लान्टेशन और मज़दूरों की भलाई के इर्द गिर्द ही घूमती थी. उसके माता-पिटा दोनों को पढ़ने का बहुत शौक था और वीणा ने भी पढ़ने का शौक उन्हीं से लिया था. घर के दो कमरों में अलमारियों में किताबें भरी थीं – पुराने क्लासिक्स से साहित्य तक और आध्यात्मिक क़िताबें. नेशनल ज्योग्राफिक मैगजीन्स का बढ़िया कलेक्शन था. सोलह साल की उम्र से वीणा ने लिखना शुरू किया था. कुछ कविताओं से लेकर, जो कुछ मैगज़ीन्स में प्रकाशित हुई थीं, वह कहानियों तथा उपन्यास की ओर मुडी, और उसके दो उपन्यास ‘बेस्ट सेलर हो गए थे. अब वह एक व्यावसायिक लेखक बन गई थी.

वीणा का जन्म लन्दन में हुआ था और उसने वहाँ प्राइमरी तक पढाई की थी. फिर परिवार भारत आ गया और उसके पिता श्रीधरन ने ऊटी में रहने और अपने पुरखों के चाय और कॉफी के बागानों को संभालने का फैसला कर लिया. श्रीधरन और नलिनी भारत वापस आना चाहते थे और उन्हें यहाँ की  पारंपरिक जीवन शैली से प्यार हो गया. वीणा के लन्दन में जन्म लेने का फ़ायदा यह था कि वह ‘क्वीन्स रॉयल कॉमनवेल्थ एसे कॉम्पीटीशन’ और ‘फोटोग्राफी कॉम्पीटीशन’ में हिस्सा ले सकती थी. उसे फोटोग्राफी का शौक था और वह आज भी उस समय को याद करके खुश होती है, जब चार साल पहले उसे हर मैजेस्टी क्वीन एलिजाबेथ के साथ चाय पर बुलाया गया था, जब उसने ‘फोटोग्राफी कॉम्पीटीशन’ में सिल्वर मैडल जीता था.

     

 

 

 

 

    

 

  

           

 

 

   

   

 

 

 

 

 

     

 

 

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सुनहरा अंडा - सम्पूर्ण

  सुनहरा अंडा       लेखिका उषा सूर्या         अंग्रेज़ी से अनुवाद आ. चारुमति रामदास                    ...