Thursday, 18 May 2023

Golden Egg - 9

 

 

क्या ‘वह’ आई थी?

        पुजारी मन्त्र पढ़ रहे थे. हवन की अग्नि शान से जल रही थी और जडी-बूटियों की सुगंध सभी कमरों में भर गई थी. बड़े ड्राइंग रूम में करीब बीस लोग बैठकर नवग्रह-शान्ति पूजा देख रहे थे. जब मेरे पति मन्त्रों को दुहरा रहे थे, तो मैं उनके पीछे खड़ी थी. उनके पास मेरी बहन और बहनोई बैठे थे, जो तीन दिन पहले अमेरिका से आये थे. मेरे पिता जी के चचेरे भाई की बीबी, अस्सी साल की महिला, जो अभी भी काफी स्वस्थ्य और सुन्दर थी, अपने बेटे और बहू के साथ कुछ दूर बैठी थी. मेरा एक और चचेरा भाई भी अपनी बीबी के साथ वहाँ था. अप्पा ड्राइंग रूम से कुछ फुट दूर अपने बेड-रूम में, बिस्तर पर बैठकर मन्त्र सुन रहे थे और उन्हें दुहरा रहे थे.  

मेरी माँ को गुज़रे बारह दिन हो गए थे और यह धार्मिक अनुष्ठानों का अंतिम दिन था.

मेरी चाची ने मुझे बुलाया.

“वह नहीं आई है. होम-हवन अभी समाप्त हो जाएगा.”

 वह उस महिला के बारे में बता रही थी, जो भोजन के लिए आकर साड़ी, ब्लाऊज़ पीस, पान और अन्य सौभाग्य अलंकारों से सम्मानित की जाने वाली थी.

“वह किसी भी पल आयेगी, आंटी,” मैंने कहा, “ड्राइवर उसे लाने गया है.”

मैंने अपनी माँ के फोटो की तरफ देखा जो एक छोटी साइड-टेबल पर रखा था. उसे चमेली के फूलों का हार पहनाया गया था.

जैसे वह मुझे चिढ़ा रही हो.

“तो, तुम्हें इस सब पर विश्वास होने लगा है. हाँ?

मैं मन ही मन मुस्कुराई. मुझे भगवान में दृढ़ विश्वास है. मगर मैं घंटों बैठकर प्रार्थनाएं नहीं गा सकती. दिन में दो बार दीपक जलाकर मन में गायत्री मन्त्र का जाप करना ही मेरे लिए बहुत है. मैं घटनाओं को शांत रहकर स्वीकार करती हूँ. बहस नहीं करती. कभी भी गुस्सा नहीं दिखाती.

मेरी माँ हमेशा आह भरकर मुझसे कहती, “तुम्हारी बहनें तुम्हारी तरह नहीं हैं. सबसे बड़ी तो अपने घर में हमेशा कोई न कोई पूजा करती रहती है. तुमसे बड़ी ऑफिस जाते हुए सारे सहस्त्रनाम कहती है. और वहाँ, अमेरिका में भी, वह काफी सारी पूजाएँ करती है. तुम कुछ भी नहीं करतीं.”

जैसे मैं कोई नास्तिक हूँ. ओह! मैं उसे कैसे समझाऊँ कि मेरे हृदय में पांडुरंग, नटराज बसते हैं, और देवी सदैव वहाँ नृत्य करती है. मैं हंसकर कहती हूँ,

“अगर तुम्हारे दामाद को काम से लौटने में थोड़ी भी देर हो जाती हैं तो तुम परेशान होने लगती हो, कि कहीं कुछ हो तो नहीं गया. तुम रात को बाईक चलाने वाले बच्चो के बारे में परेशान  रहती हो. मगर मुझे देखो. मेरा भगवान पर पूरा विश्वास है. गणेश हमेशा मेरी साड़ी का पल्लू पकड़ कर मेरे पीछे रहता है. विश्वास महत्वपूर्ण है.”

वह मेरी तरफ देखकर कहती,

“बातों में भला तुमसे कौन जीत सकता है?

और मैं, जो उसके अनुसार नास्तिक थी, आज के दिन एक सुमंगली का सम्मान करने वाली थी – उसे खाना खिलाकर और भेंट वस्तुएं प्रदान करके. आंटी ने मुझसे कहा था, “देखो, गायत्री, करीब पचास साल बाद हमारे परिवार में किसी सुमंगली का निधन हुआ है.

मुझे मालूम है कि तुम्हें इन बातों पर विश्वास नहीं है. मगर बड़ी होने के नाते, मैं कुछ कहना चाहती हूँ. तुम्हें तेरहवीं पर किसी सुमंगली को भोजन के लिए आमंत्रित करना है और उसे लाल रंग की साड़ी देना है.”

मैं सहमत हो गई. मेरे पति को नौ गज की लाल साड़ी लेने के लिए उस भयानक ठंडे दिन में भागना पडा. नल्ली की साउथ एक्सटेंशन वाली ब्रांच में लाल साड़ी नहीं थी. आखिरकार मुनीरका की एक दुकान में वह मिल गई.

“ओह! तुम्हारी माँ ने मुझे दौड़ा दिया.”

और मेरी माँ मुझे चिढाते हुए मुस्कुरा रही थी. मैं भी मुस्कुरा रही थी.

“चिट्टी ने मुझसे कहा कि उस महिला के रूप में आज तुम यहाँ आने वाली हो, इसीलिये!” मैंने अपने आप से कहा.   

वह महिला अन्दर आई. वह ऊँची और अच्छी कद काठी की थी. मेरी माँ जैसी गोरी तो नहीं थी, मगर पचास से ऊपर की उम्र में भी काफी सुन्दर थी. कानों की और नाक की कृत्रिम बालियाँ चमक रही थीं. उसके गले में पीला धागा था. कांच की और प्लास्टिक की चूड़ियाँ खनखना रही थीं. बहुत प्यारी महिला थी.

“तुम्हारी सास यहाँ है,” मैंने अपने पति से कहा और मेरी बहन ने मेरी तरफ देखा.

“कम से कम आज तो ऐसी छिछोरी बात न बोलो,” वह हमेशा से संवेदनशील रही है.

पूजा समाप्त हो गई और पुजारियों के साथ ही वह महिला भी खाने के लिए बैठी.

मैं और मेरी बहन उसे परोस रहे थे.

अजीब बात थी. जिस तरह से वह खा रही थी, उससे मुझे माँ की याद आ रही थी. वह चाव से खीर खा रही थी. (मुझे एक चम्मच और दो गायत्री...मैं एक ज़्यादा डाओनिल-        डायबिटीज़ की गोली ले लूँगी).

खाने के बाद वह पान खाने बैठी. हाँ.

बिलकुल मेरी माँ की तरह...पान के ऊपर पान खाए जा रही थी. हम अपनी माँ को – बकरी- कहते थे.

उसे साड़ी, ब्लाउज पीस और छोटा सा आईना, कंघी बहुत अच्छे लगे. दक्षिणा पाकर वह खुश हो गई. उसने कहा कि उसे खाना पसंद आया था. केटरर ने ही उसका नाम सुझाया था, और हमारा ड्राईवर उसे लेकर आया था, और अब वापस छोड़कर भी आयेगा.

वह जाने के लिए उठी.

उसने मुझसे कहा,

“अगर तुम्हें किसी मिठाई या नमकीन की ज़रुरत हो तो तुम मुझे बता सकती हो. मैं बना दूंगी और तुम्हारा ड्राईवर – अब उसे मेरा घर मालूम है – लेकर आ सकता है. मैं पापड, चिप्स और अचार भी बनाती हूँ.” उसने हमसे बिदा ली.

जब वह दरवाज़े से बाहर निकली तो मुझे लगा कि मैंने उसका नाम भी नहीं पूछा था.

“आंटी, आपका नाम?” मैंने और मेरी बहन ने एक साथ पूछा.

वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई. मैंने सोचा कि वह मुझे चिढा रही थी. पता नहीं...

उसने कहा, “मोहना.”

और सीढियां उतरकर सर्दियों की उस ठंडी शाम में बाहर निकल गई.

हम दोनों जैसे फर्श से चिपके खड़े थे. भगवान जाने, कितनी देर.

.

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      मोहना मेरी माँ का नाम था.

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