पेटबोला
ये जैसे घटनाओं का पूर्ण संयोजन था.
मुझे पूरा विश्वास था कि इस चिड़चिडे, नौजवान
सिक्यूरिटी गार्ड का उस ख़ूबसूरत बिल्ली के गायब होने में या उसकी मौत में हाथ था.
संबंध एकदम स्पष्ट था.
चलिए, समझाती हूँ कि मैं इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँची. उससे
पहले, आपको उलझन में डालने के बजाय, मुझे यह बताना पडेगा कि मैं किस बारे में बात कर रही
हूँ.
बात ऐसी है.
तीसरी मंजिल के हमारे अपार्टमेंट की बाल्कनी से मैं
हमारे पड़ोसी के घर को अच्छी तरह देख सकती हूँ. मेरा मतलब है,
सीमेंट का कम्पाउंड, गैरेज जिसमें तीन कारें हैं, आम का पेड़, नीम का पेड़, और बेशक, घर के लोगों को बाहर आते-जाते देख सकती हूँ. हमारा
संबंध उनसे बहुत कम था क्योंकि वे काफी व्यस्त थे और हम,
बूढ़े भी अपने काम से काम रखते थे. हमारी बातचीत सिर्फ एक इक्कीस साल के लडके से
होती थी, जिसे हम तब से जानते हैं, जब उन्नीस साल पहले हम इस अपार्टमेंट में आये थे. तब
वह बहुत छोटा था; एक प्यारा बच्चा. जब वह अपने चचेरे भाइयों के साथ फुटबॉल
या क्रिकेट खेलता, तो हम – मैं और मेरे पति – बाल्कनी से उसका हौसला
बढाया करते. कभी कभी वह ऊपर देख लेता और अगर मुझे बाल्कनी में खड़े देखता तो उसके चहरे
पर प्यारी मुस्कान छा जाती, वह हाथ हिलाता और पूछता, “आप कैसी हैं, आंटी?”
यह एक संयुक्त परिवार था – तीन भाईयों और उनके
परिवारों का जो उस बिल्डिंग में एक एक मंजिल पर रहते थे. समय के साथ बच्चे बड़े हो
गए, और हम उन्हें उतना नहीं देख पाते थे. क्रिकेट नहीं,
फुटबॉल नहीं.
फिर,
आई वह बिल्ली.
कहानी के आरम्भ की ओर चलते हैं.
मुझे आपको बताना पडेगा कि बिल्ली मेरे कथानक का केंद्र
है.
यह एक कैलिको बिल्ली थी. अच्छा,
सही सही बताऊँ तो कैलिको बिल्ली सफ़ेद होती है और उसके बदन पर कहीं-कहीं काले और
पीले-भूरे धब्बे होते हैं. वह ख़ूबसूरत बिल्ली (ज़्यादातर कैलिको बिल्लियाँ मादा
होती हैं, जहाँ तक मेरा ख़याल है) कंपाऊंड में घूमा करती: कार-शेड में या डोर-मैट पर
सो जाती; दीवार पर चढ़ जाती और कार शेड की छत पर गिरे हुए आम के पत्ते देखती या फिर
सर्दियों की हल्की धूप में थोड़ी देर वहाँ सो जाती. गर्मियों में वह टीन की गर्म छत
पर नज़र नहीं आती. दिन में तीन बार उसे खाना दिया जाता – वह महिला अथवा उसका पति एक
बॉक्स में कुछ लाते और पाँच-छः मुट्ठियाँ एक लाल बाउल में डाल देते जो इस बिल्ली
का था.
उस बिल्डिंग के वाचमैन कुछ महीनों में बदला जाते,
क्योंकि वे किसी एजेंसी की मार्फ़त आया करते थे. बूढा वाचमैन उस बिल्ली को बहुत
चाहता था. वह उसके पीछे-पीछे जाती, और वाचमैन भी अपने लंच बॉक्स में से उसे कुछ खाना दे
देता.
फिर यह नौजवान वाचमैन प्रकट हुआ.
बिल्ली उसकी परवाह नहीं करती थी,
क्योंकि वह उसे भगा दिया करता. मैंने उसे दो-तीन बार उस ख़ूबसूरत प्राणी को भगाते
हुए देखा था – बेशक, मेमसा’ब और सा’ब को पता चले बगैर,
जो उसे बेहद प्यार करते थे.
लोंकडाउन की वजह से नौकरानियां इस बिल्डिंग में काम पर
नहीं आती थीं, जैसा कि लगभग सभी घरों का हाल था. मैंने नौकरानियों
को भी अपने लंच बॉक्स से बिल्ली को खाना देते हुए देखा था.
मैंने इस सिक्यूरिटी गार्ड को – शायद उसका नाम संजय था
– कभी-कभी वहाँ की मैडम से चाय का बड़ा मग लेते हुए देखा था.
एक दिन मैंने उस सुन्दर प्राणी की दर्द भरी ‘म्याऊँ’
सुनी और उस चिड़चिड़े वाचमैन को उसके पीछे भागते देखा. वह शेड में रखी लाल कार के
पीछे छिप गई. उन दिनों कारें कम ही निकाली जाती थीं. वह हाथ में एक लंबा डंडा लिए
उसे ढूंढ रहा था, इस इंतज़ार में कि वह बाहर आयेगी. मगर वह बाहर ही नहीं
आई, शायद उसे खतरे का एहसास हो गया था. मगर उसे खिलाने का कार्यक्रम यथावत चलता
रहा और अब मैं उसे सीढ़ियों पर या डोरमैट पर बैठे नहीं देखती थी. दरवाज़े और दीवार
के बीच की जगह पर भी वह नहीं दिखाई देती.
मैंने महसूस किया कि वह वाचमैन से कतरा रही है. मुझे
समझ में नहीं आता था कि उस प्यारे प्राणी को सताने से उसे कौन सी खुशी हासिल होती
है. बिल्ली भी भांप गई थी कि यह इंसान उससे नफ़रत करता है, जिसकी वजह शायद उसी को
मालूम थी.
फिर
वह गायब हो गई!
मेरी आदत थी कि मैं हर रोज़ सुबह अपनी बाल्कनी में खड़े
होकर उसे लाल बाउल से प्यार से अपना खाना खाते देखती थी. मैं देख रही थी कि वह
महिला और उसके पति बदहवासी से उसे ढूंढ रहे थे. हाँलाकि बिल्ली को घर के भीतर जाना
मना था, मगर बेशक, वह उनकी लाडली थी. वे वाचमैन से पूछ रहे थे,
और उनके हाव भावों से ज़ाहिर हो रहा था, कि वाचमैन उसके बारे में कुछ भी मालूम होने से इनकार
कर रहा था.
खाना लाल बाउल में तब तक पडा रहता,
जब तक कौए आकर टुकडे न ले जाते. यह दो दिन चला, फिर उस दंपत्ति ने बिल्ली को
ढूँढना बंद कर दिया.
मेरा दिल मुझसे कह रहा था कि बिल्ली के गायब होने में
इस वाचमैन का हाथ है.
उस ख़ूबसूरत बिल्ली के बारे में सोचकर मैं बहुत उदास
थी.
फिर मेरे मन में एक विचार कौंध गया – ‘पेटबोलापन’!
मुझे याद है कि मेरे पति और बच्चे मेरा मज़ाक उड़ाया
करते, जब मैं कोई बीस साल पहले ‘पेटबोलेपन’ का एक सप्ताह का क्रैश कोर्स करना
चाहती थी, जब हम मुम्बई में थे.
मुझे याद है
कि मेरी सास ने भी खडूसपन से कहा था, “बेकार नाई ने एक बिल्ले को पकड़ा और उसकी हजामत बना
दी.”
मगर मुझे वाकई में दिलचस्पी थी,
इसलिए मैंने वह कोर्स कर लिया. बेशक, मैंने कठपुतलियों के कोई ‘शो’ नहीं किये,
मगर मैं मार्केट में आवाजें निकालकर मज़ा लेती थी, सब्जियों और फलों पर कमेन्ट करती. कुछ सब्जियों को
बोलने पर मजबूर करती और एक महिला को तो मैंने डरा ही दिया,
जो सब्जी वाले से बहुत ज़्यादा भाव-ताव कर रही थी. वो एक अलग कहानी है.
तो, मैंने तय कर लिया कि मैं अपना ‘पेटबोली’ का हुनर
इस्तेमाल करके एक छोटा सा जासूसी कारनामा करूंगी, यह पता करने के लिए कि क्या सिक्यूरटी वाले छोकरे ने बिल्ली को मारकर उसे फेंक दिया था!
अगली सुबह मैं बाल्कनी में बैठ गई और जैसे ही वह छोकरा
अपनी चाय पीने के लिए बैठा, मैंने आवाज़ निकाली...
“म्याऊँ“...
वह चौंक गया और फर्श पर अपना ‘मग’ रखकर खडा हो गया और
इधर-उधर देखने लगा. सौभाग्य से उसने ऊपर नज़र नहीं डाली और मुझे नहीं देखा.
आसपास किसी बिल्ली को न देखकर वह अपने ‘चाय के कार्यक्रम’ पर
वापस आया.
“म्याऊँ”.
मैंने फिर कहा, इस बार ज़्यादा देर तक और ज़्यादा दर्द से.
यही सब शाम को भी दुहराया गया और मैं देख सकती थी कि
वह बेचैन हो गया है.
अब “म्याऊँ” बार बार सुनाई देने लगा और कभी-कभी तो
उसके बिलकुल पास भी.
एक सप्ताह बीत गया. मैं अपने हुनर का मज़ा ले रही थी.
फिर एक दिन...
काफी सारी आवाजें सुनाई दीं,
तो मैंने नीचे झांककर देखा.
सिक्यूरिटी वाला छोकरा अपने घुटनों पर बैठकर पति-पत्नी
से – बिल्ली के चाहने वालों से गुजारिश कर रहा था.
उस महिला ने ऊपर देखा और मुझे बाल्कनी की रेलिंग पर
झुका देखा.
अठारह साल की मुस्कानों के आदान प्रदान ने बातचीत को
मौक़ा दिया. उसने मुझसे कहा,
“इस आदमी ने हमारी बिल्ली को मार डाला और दूर जाकर
फेंक दिया! वह स्वीकार कर रहा है. कहता है कि बिल्ली उसके पीछे पड़ गई है और
सुबह-शाम रोती है और वह ये सब बर्दाश्त नहीं कर सकता. वह नौकरी छोड़ना चाहता है.”
“उसने ऐसा क्यों किया?” मैंने पूछा.
“वह कहता है कि उसे बचपन से ही बिल्लियों से नफ़रत है,
जब एक बिल्ली ने उसे काट कर लहूलुहान कर दिया था. वह अपना काम छोड़ना चाहता है,
और हमें कोई आपत्ति नहीं है. कैसा खतरनाक कारनामा! आह! मेरी प्यारी लूलू.”
उसने नाक से सूं सूं किया.
लूलू उस बिल्ली का नाम था.
उसकी जगह पर एक हफ्ते बाद एक बूढ़े वाचमैन को रखा गया.
हाँ, उसी बूढ़े वाचमैन को जिसके पीछे-पीछे लूलू भागती थी और
वह अपने लंच बॉक्स से उसे कुछ तुकडे दिया करता था.
एक महीना बीत गया. मैं अपने आप से काफी संतुष्ट थी कि
मैं अपने ‘पेटबोली’ के हुनर का ‘ह्त्या’
जैसे संगीन जुर्म के इकबाल करवाने में प्रयोग कर सकी थी.
मैं नीचे कम्पाउंड की दीवार के पास लगे पेड़ से कुछ फूल
तोड़ने गई थी.
“आप कैसी हैं, मैडम?”
ये पड़ोस वाला वाचमैन था, वह बहुत बातूनी था.
मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराई.
“तो, तुम वापस आ गए?”
“हाँ, मैडम. मैं बीमार था, इसलिए छुट्टी ली थी. अब मैं ठीक हूँ.”
उसका वज़न काफी कम हो गया था.
मैंने हिचकिचाते हुए उससे पूछा,
“वो पहले वाला लड़का...मेरा मतलब है...वो छोकरा,
जिसने बिल्ली को मार डाला था...क्या कहीं और काम कर रहा है?”
मुझे कुछ अपराध बोध भी हो रहा था, कि उसने नौकरी छोड़ दी थी.
“आआ!! वो एक सच्ची कहानी है,
मैडम,” वह मुस्कुराकर आगे बोला,
“कल मैंने यहाँ आते हुए उसे एक बंगले में देखा था. वह
काम पर आया ही था. उसके पास बन्स का पैकेट था. उसने कहा कि वह हर रोज़ पड़ोस की चार बिल्लियों
को खिलाता है. और शायद इसे साबित करने के लिए बिल्लियाँ दौड़ती हुई उसके पास आईं....करीब
सात बिल्लियाँ, न सिर्फ चार, और वह बन्स के टुकडे करके उन्हें दे रहा था. वह बड़ा
खुश लग रहा था. अजीब बात है, मैडम. कैसा बदलाव! ईश्वर महान है. वह छोकरा दयालु
आत्मा बन गया है.”
मैं घर वापस चली आई. मेरे दिल से एक बड़ा बोझ उतर गया
था. मेरे मन का अपराध बोध दूर हो गया.
थैंक्स गॉड, ‘पेटबोलेपन’ ने उस छोकरे को अवसाद ग्रस्त नहीं किया,
बल्कि उसे एक दयालु आत्मा के रूप में परिवर्तित कर दिया.
हाँ, ईश्वर सचमुच में महान है.
**********
No comments:
Post a Comment