गंदा काढ़ा
नरेंद्रन
को खूब प्यास लगी थी. उसका गला सूख गया था.
झुलस
गया था.
जब
वह मुम्बई से बीकानेर के पास स्थित इस गाँव के लिए निकला था, तो उसके सहयोगियों ने उसे आगाह किया था.
“तुम
आसाम में ज़िंदा रह सकते हो. चाहो तो उत्तर प्रदेश में भी. वहाँ चाहे जैसी परिस्थिति
हो...दंगे, गोली-बारी, लूट पाट...तुम्हें
खाना और पानी मिल जाएगा. मगर यहाँ...” राहुल सिंह ने अपनी बात पूरी किये बिना उसकी
तरफ देखा.
नरेंद्रन
मुस्कुराया था.
“कहो
भी, राहुल. तुम क्या कहना चाह रहे थे?”
कपाडिया
बीच में टपक पडा.
“मैं
बताता हूँ. तुम भूख और प्यास से मर जाओगे. और खासकर वह गाँव...कहानियां, जो हम सुनते हैं, भयानक हैं. लोगों की बात सुनकर
रिपोर्टिंग करो, इतना ही काफी है. तुम्हें वहाँ जाने की
ज़रुरत नहीं है.”
नरेंद्रन
दोस्तों की बात मान ही नहीं सका.
उसने
सुना था कि लोग बिना पानी के, बिना खाने के मक्खियों की तरह
मर रहे हैं. मवेशी तो पूरे ख़तम हो गए थे.
वह
गुस्से से लाल हो रहा था. उसका दिल भारी था. ..ऐसा कैसे हो सकता था...ऐसा क्यों
हुआ.
सरकार
तो लोगों से कह रही थी कि भुखमरी के कारण कोई मौत नहीं हुई है और युद्ध स्तर पर
वहाँ सहायता पहुंचाई जा रही है. वह स्वयँ जाकर पूरी परिस्थिति देखना चाहता था.
उसका
मद्रासी दोस्त, राजाराम उसके साथ स्टेशन तक आया था. वह
प्रोत्साहन का महान स्त्रोत था.
नरेन्
बीकानेर पहुँचा और बस से या बैलगाड़ी से गाँव-गाँव गया.
इस
विशिष्ठ जगह को देखकर उसे बहुत धक्का लगा.
उसे
पहली बार “गरीबी की रेखा से नीचे”, इन शब्दों का मतलब समझ में आया.
पिछले
गाँव में उसे सवारी ढूँढ़ने की समस्या का सामना करना पड़ा था. बसों ने इस गाँव में
जाना बंद कर दिया था.
पहले
तो उसके गाड़ीवान ने वहाँ जाने से मना कर दिया.
“वो
शैतान की भूमि है, साहब. इस गाँव में, जहाँ सौ से ज़्यादा आदमी थे, अब सिर्फ बीस या तीस ही
बचे हैं. बहुत सारे मर गए, कुछ गाँव छोड़ कर चले गए. चारे की
कमी से मवेशी मर गए. दया आती है, साहब...बहुत दयनीय हालत
है.” गाडीवान ‘बोली’ गाडी को गाँव की ओर ले जाते हुए बता रहा था. वह नरेन् को भारी
किराए के वादे पर ले जा रहा था.
‘बोली’
ने गाड़ी में पानी के तीन कैन रखे, कुछ समोसे और मिठाइयां भी रखीं.
उसका दिल बहुत नर्म था. नरेन् महसूस कर सकता था.
“हो
सकता है, वहाँ कुछ बच्चे हों, साहब...और अगर आप वहाँ कुछ देर
रुकने वाले हैं, और फोटो भी खींचने वाले हैं, तो आपको भी भूख लग आयेगी.” नरेन् ने भी बस स्टॉप पर एक छोटी सी दूकान से
देसी बिस्कुटों के कुछ पैकेट खरीदे थे.
गाड़ी
ने वीरान, ‘शैतान की भूमि’ में प्रवेश किया.
‘शायद
नरक ऐसा ही होता होगा,’ गाँव पर पहली नज़र डालते ही नरेन् के
मन में फ़ौरन ये ख़याल कौंध गया.
मौत
जैसे सन्नाटे में भी गाँव जागा हुआ प्रतीत हो रहा था.
छोटी
सी चाय की दुकान मरियल संगीत से नरेन् को आमंत्रित कर रही थी.
उसे
लगा कि अमिताभ बच्चन उससे पूछ रहा है, ‘मेरे अंगने में
तुम्हारा क्या काम है?...”
“क्या
चाय है?” नरेन् ने पूछा.
दुकानदार
करीब अस्सी साल का लग रहा था.
‘है, बेटा. बैठो. क्या तुम सरकार से आये हो? मिनिस्टर के
प्रतिनिधि?”
उसके
मौत जैसे पीले चहरे पर और आंखों में आशा की एक किरण कौंध गई.
“नहीं, जनाब. मैं अखबार से हूँ.”
बूढ़े
आदमी ने एक छोटे गंदे कप में चाय डालकर उसे थमाई.
चाय
बहुत बकवास होगी, बेटा. मेरी गाय के लिए चारा ही नहीं
है. बिल्कुल पर्याप्त नहीं है. मेरा बेटा, बहू और पोता आज
सुबह अच्छी वाली गाय लेकर चले गए.”
“कहाँ?” नरेन् ने पूछा. चाय एकदम पनीली और काली थी.
एकदम
गंदा काढ़ा.
बूढ़े
ने हताशा से अपने हाथ फैलाए और कंधे उचकाए.
“कहाँ
गए हैं, असल में मुझे मालूम नहीं है. जहाँ भी जाएँ, खुशी से
रहें, आराम से रहें..”
चाय
कड़वी थी – बूढ़े आदमी की ज़िंदगी जैसी.
“तुम
क्यों नहीं गए उनके साथ?”
“हुम्म्मम्
. अस्सी साल पहले इस गाँव की गोद में आया था. मेरी नाल अभी भी ज़िंदा है. मैं बड़ा
हुआ. मैंने प्यार किया. अपनी चहेती से ब्याह किया. मैं करीब-करीब पूरे गाँव को दूध
डालता था. इत्ती सारी गायें होती थी टपरी में. अपनी किस्मत पे भरोसा ही नहीं होता.
अब मैंने कित्ती सारी मौतें भी देख ली हैं. मैं इस जगह को छोड़ना नहीं चाहता. वो
कुछ दिन पहले मर गई. शायद महीना भर हुआ होगा या उससे कुछ कम या ज़्यादा. मैं और
मेरी गाय भी जल्दी ही मर जायेंगे.”
चाय
नरेन् के गले से नीचे नहीं उतर रही थी.
गंदी
भूरी. कड़वी. एकदम स्वादहीन.
पिछले
दस दिनों से हर कोई मिनिस्टर के आने की उम्मीद कर रहा है. इसीलिये मैंने आपसे वो
सवाल पूछा था.”
इस
बीच एक दुबली-पतली औरत हड्डियों के ढाँचे जैसे बच्चे को लेकर दुकान में आई.
“आओ, बच्ची. प्यारा कैसा है?”
उसने
उसकी तरफ चाय का एक कप बढाया. उसने थरथराती, पतली उँगलियों से
कप को लपक लिया और एक घूँट में पी गई. बच्चा उसके कंधे पर गहरी नींद में था.
“पिताजी, प्यारा मर रहा है, धीरे धीरे मर रहा है,” उसने सूखी आँखों से भयानक शब्द
फुसफुसाकर कहे.
सूखे
के पास आंसुओं और भावनाओं को भी चूसने की, उन्हें सूखा करने
की शैतानी ताकत थी.
वास्तविकता.
भयानक वास्तविकता. नरेन् ने बूढ़े को पचास रुपये दिए और औरत के पीछे गया. घर वीरान
थे. कुएँ एकदम हड्डी जैसे सूख गए थे. कुछ दूरी पर उसे कुछ चीलें दिखाई दीं ; मरे
हुए जानवरों पर मंडरा रही होंगी.
पेड़
बिलकुल बिना पत्तों के. हर तरफ मौत की गंध.
इंसानों
की आंखों में कोई चमक नहीं थी; जिनसे हर खुशी और जीने की इच्छा
भी छिन गई थी.
रास्ते
पर एक परिवार बैठा था. नरेन् उनकी तरफ गया.
“अम्माजी...क्या
मिनिस्टर आयेगा?”
“वह
ज़रूर आयेगा, मेरे प्यारे बच्चे.”
“फिर, पानी आयेगा, है ना? है ना? क्या वह लॉरियों में पानी भरके लाएगा?”
चार
साल का बच्चा तीस साल की औरत से पूछ रहा था, उसकी आंखों में
उत्सुकता की धुंधली सी चमक थी.
“म्मम्”
एक चार महीने का दुबला-पतला शिशु माँ की सूखी छाती से हवा चूस रहा था.
“फिर
वह मिठाई, रोटियाँ लाएगा...है ना?”
“हाँ,
मेरे हीरे.”
“पापाजी
कब आयेंगे?”
“तुम
सो जाओ, मेरे बच्चे. जैसे ही तुम सोकर उठोगे, वे यहाँ
होंगे.”
वह
उसकी बगल में दुबक गया, मगर हड्डियों की इस छोटी सी पोटली
में नींद आने का नाम नहीं ले रही थी.
“अम्माजी.”
“ऊँ...”
उसने पूछा, उसकी आवाज़ में परेशानी साफ़ झलक रही थी.
“अगर
पापा जी भी प्यारा चाचा की तरह मरने लगे तो?”
उसकी
देह काँप गई.
“नहीं, मेरे बेटे, नहीं.” उसने ब्लाऊज के भीतर से रंग उड़ा
मंगलसूत्र निकाला और फुसफुसाकर “गौरी मैय्या” कहते हुए आंखों से लगा लिया.
रास्ते
के दूसरी ओर बने मंदिर के अँधेरे गर्भगृह में गौरी मैय्या खडी थी, घुप खामोशी से उनकी ओर देखते हुए. पुजारी मर चुका था, इसलिए वह भी भूखी थी.
नरेन्
उस औरत के पास गया.
“बहन, तुम्हारे पति कहाँ काम करते हैं?”
उसने
नरेन् की तरफ देखा और फटी हुई साडी का पल्लू सिर पर ले लिया.
“यहाँ
के स्कूल में. वो टीचर हैं. वो मिनिस्टर से मिलने गए हैं.”
“तुम
रास्ते पर क्यों बैठी हो? क्या तुम्हारा घर नहीं है?”
उसने
कुछ गज दूर, मंदिर के पीछे एक घर की ओर इशारा किया.
“टपरी
में दो मरी हुई गायें हैं. बदबू बर्दाश्त नहीं हो रही है, और चीलों का शोर गुल.”
उसने
उसकी तरफ देखा,
“क्या
मिनिस्टर आयेगा?”
उसने
अपने मन को शांत करने की कोशिश की.
“वह
ज़रूर आयेगा, बहन.”
“उसने
‘बोली’ से बहुत सारा पानी और खाने की चीज़ें लाने को कहा, और उन्हें वहाँ मौजूद कुछ लोगों में बांट दिया.
जब
वह मुम्बई वापस आया तो उसका दिल गुस्से और दुःख से भरा हुआ था.
फोटोग्राफ्स
और वर्णन देखकर एडिटर बहुत खुश हुआ.
“बढ़िया, नरेन्. इसे फ्रंट पेज पर डालूँगा. बिक्री खूब होगी.”
नरेन्
ने महसूस किया कि घृणा की लहर ने उसे घेर लिया है.
प्रॉफिट.
पैसा. कैश.
ओके, नरेन्, मैंने तुम्हारा टिकट बुक करवा दिया है. तुम
दिल्ली जा रहे हो गुट निरपेक्ष राष्ट्रों के सम्मलेन को ‘कवर’ करने के लिए, हमारे स्पेशल रिपोर्टर के रूप में.
शुभ कामनाएँ.”
नई
दिल्ली ने अपने पूरे सौन्दर्य और सम्पन्नता से उसका स्वागत किया. राजमार्ग,
दुकानें, फूलों से लदे हुए पेड़, हर चीज़ उसे उत्तेजित कर रही
थी.
उसे
फिडेल कास्त्रो की एक अच्छी तस्वीर खींचने में सफलता मिली.
पूरे
सप्ताह के दिल के दर्द के बाद उस रात उसे अच्छी नींद आई.
होटल
में ब्रेकफास्ट शानदार था. उसके विचार पिछले दिन की कास्त्रो की स्पीच पर ही
केन्द्रित थे. उसने कास्त्रो के विचारों पर कुछ किताबें पढी थीं. कुछ विचार उसके
दिमाग में गहरे पैठ गए थे. कुछ ने उसे रुलाया भी था. कुछ आग की तरह थे, दिल को जलाने वाले..
“अमीरों
को लूट कर उन्हें गरीब बनाना और समाज में अमीरों के और गरीबों के बीच संतुलन
स्थापित करना बेवकूफी है. सच्ची क्रान्ति है आर्थिक दर्जा ऊंचा करना, उनका जो गरीबी की रेखा के नीचे हैं और उन्हें आरामदायक ज़िंदगी प्रदान
करना...”
उसके
साथ दैनिक ‘मॉर्निंग स्टार’ का रिपोर्टर पार्थसारथी था.
“तुम्हारे
विचारों की कीमत एक कौड़ी की है नरेन्. हाथ में कॉफी ठंडी हो गई है.”
नरेन्
को झटका लगा.
उसने
हाथ के कप से पीना शुरू किया.
वहाँ
उसे कॉफी नहीं दिखाई दे रही थी.
उसे
एक द्रव दिखाई दे रहा था, जो पनीला और गंदा भूरा था.
चाय
की दूकान वाला बूढा, मरता हुआ प्यारा, रास्ते पर बैठा हुआ परिवार.
क्या
मिनिस्टर वहाँ गया होगा?
वह
उठा और कप को महंगे फूलदान में उंडेल दिया जो मेज़ को सजा रहा था.
वह
बहुत गाढ़ी, बहुत स्ट्रॉंग थी उसके लिए.
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