फ्लाईट
.
‘मूवर्स एंड पैकर्स’ आखिर चले गए. नौकर अपार्टमेंट की सफाई में व्यस्त हो
गया. ज्योति खुश थी. उसने ट्रक की दिल्ली तक की पाँच दिनों के सफ़र के दौरान उसके
तुलसी, गुलाब और जेस्मीन के गमलों में पानी देने के लिए क्लीनर को पाँच सौ रुपये
दिए. उसे यकीन था कि उसके पौधे सुरक्षित रहेंगे.
सुबह के सात बजे थे और वे मद्रास-दिल्ली फ्लाईट पकड़ने
के लिए हवाई अड्डे के लिए निकलने वाले थे. अपनी उत्सुकता पर काबू न रखने के कारण
भरत भी जल्दी उठ गया था. यह उसकी पहली फ्लाईट थी. परिवार ने पड़ोसियों से बिदा ली.
कामाक्षी आंटी ने, जो उनके बिलकुल सामने रहती थी. ज्योति के हाथ में एक नया स्टील
का टिफिन बॉक्स थमा दिया.
“इसमें तीन इडलियाँ हैं चटनी पावडर के साथ,” वह
फुसफुसाई. ज्योति की आंखों में आँसू आ गए. उसे इस आंटी की याद आने वाली थी.
और अगले फ़्लैट वाली मिसेज़ खन्ना, ‘तीस दिनों में
हिन्दी सीखें’ किताब देते हुए बोलीं, “ज्यो, तुम्हारे लिये यह किताब फायदे की रहेगी,
क्योंकि दिल्ली के लोग मुम्बई के लोगों की अपेक्षा अच्छी हिन्दी बोलते हैं,
मुम्बई की हिन्दी तो गुजराती, मराठी, अंग्रेज़ी वगैरह का मिश्रण होती है. जैसे सभी भाषाओं
की खिचडी.”
‘चेक इन’ करने के बाद कहानियों की कुछ किताबें खरीदने
के लिए चंद्रू भरत को बुक-स्टाल पर ले गया. ज्योति हिन्दी वाली किताब निकालकर उसके
पन्ने पलटने लगी.
हिन्दी से उसका परिचय सिर्फ फिल्मों के माध्यम से था
और वह कुछ फ़िल्मी गाने भी गा सकती थी. मगर बोलचाल की हिन्दी की तो बात ही अलग थी.
उसे सब्जियों के, फलों के, किराना सामान के नाम जानना ज़रूरी था और बेशक बुनियादी
बातचीत के लिए एक कोर्स की भी आवश्यकता थी.
बाप-बेटा तीस मिनट में वापस आये और चंद्रू के चेहरे का
रंग उड़ा हुआ था.
उसने ज्योति को बताया,
“काश, ये बच्चा मुझे इस तरह शर्मिन्दा न करता.”
“क्या किया उसने?” ज्योति ने पूछा, उसे इस बात का दिलासा था कि कोई बहुत बड़ी बात नहीं
हुई थी, क्योंकि चंद्रू ज्वालामुखी की तरह नहीं लग रहा था,
जो अभी अभी फूटा हो.
“वहाँ एक आदमी था, जिसने एक किताब उठाई थी, और भरत उसके पास गया और पूछने लगा कि क्या उसके पेट
में एक छोटा बच्चा है. क्या तुम सोच सकती हो? इस बच्चे को ऐसी बातें कहाँ से सूझती हैं?”
ज्योति ने अपनी हंसी दबाने की कोशिश की जो किसी भी समय
फूट सकती थी. सौभाग्य से ‘बोर्डिंग अनाउन्समेंट’ हुई और वे गेट की तरफ चल पड़े.
बच्चे को कैसे मालूम होगा कि आदमी ‘प्रेग्नंट’ नहीं
होते हैं.
फ्लाईट बहुत भरी हुई नहीं थी और काफी सारी खाली सीटें
थीं. चंद्रू ने बच्चे की सीट बेल्ट बांधी. बच्चे को बर्ताव के बारे में सख्त
हिदायतें दी गईं और बच्चे ने चंद्रू की हर बात पर सिर हिला दिया.
एअर होस्टेस चॉकलेट्स की ट्रे लेकर आई और बच्चे ने
सिर्फ एक ही चॉकलेट उठाई. मुस्कुराते हुए एअर होस्टेस ने उसकी हथेलियों में कुछ
चॉकलेट्स थमा दीं, जिन्हें उसने खुशी-खुशी ले लिया. चंद्रू खुश था.
वे आराम से बैठे ही थे कि छः फुट का भारी-भरकम आदमी,
चमकदार सफ़ेद धोती और कुर्ता, उँगलियों में दो अंगूठियाँ पहने , गर्दन में
रुद्राक्ष के पेंडेंट की माला पहने और माथे पर विभूति लगाए बीच वाली सीट पर बैठ
गया.
वह उनकी तरफ मुडा और पान से लाल हुए अपने दांत दिखाते
हुए मुस्कुराया.
चंद्रू ने फुसफुसाकर अपनी बीबी से कहा,
“तुम्हारी बिरादरी का लगता है!! उम्मीद है,
कि वह कोई बात न शुरू कर दे.” उसके केरल मूल के बारे में चिढाने का कोई भी मौक़ा वह
नहीं छोड़ता था.
ज्योति मन ही मन मुस्कुराई.
उसे पता था कि इस बार चंद्रू गलत था.
उसने गौर किया था कि अपने भारी-भरकम शरीर को सीट में
दबाते हुए, वह जोर से फुसफुसाया था –
“मुरुगा, मेरे ईश्वर कार्तिकेय, जो पश्चिम घाट के पूर्व की ओर
की बिरादरी (जैसा चंद्रू कहता था) की ख़ास पहचान थी, जबकि उसकी बिरादरी के लोग
बैठने से पहले प्रार्थना करते हैं – कृष्णा/ गुरुवायूरप्पा / देवी/ सर्वेश्वरी /
जगदम्बिके/ महामाये / भगवती इत्यादि.
ये बात नहीं थी कि उन्हें मयूरारूढ भगवान से कोई
शिकायत थी. वे बिना किसी भेदभाव के सभी देवताओं की पूजा करते थे,
मगर इन नामों का उल्लेख अवश्य करते थे. इतनी श्रद्धा से ‘मुरुगा’
पुकारने वाले अक्सर पूर्व की तरफ के तमिल होते हैं.
वह चुप रही, मगर उसे मन ही मन लग रहा था कि कोई मजेदार बात होने
वाली है.
फ्लाइट ने ‘टेक ऑफ़’ किया और भरत बादलों में खो गया था,
जिन्हें चीरते हुए प्लेन जा रहा था. उसे यह अच्छा लग रहा था.
ब्रेकफास्ट दिया जा रहा था और ज्योति ने ब्रेकफास्ट
लेने से मना कर दिया, वह बच्चे को खिला रही थी.
“तुम क्यों नहीं खा रही हो? फ्लाईट दो घंटे से ज़्यादा लेगी और तुम्हें भूख लग
आयेगी.”
“मेरे पास कामाक्षी आंटी की दी हुई इडलियाँ हैं और मैं
वही खाऊँगी. आज अमावस्या है और मैं बासी खाना नहीं खाना चाहती.”
“बासी खाना? ये ताज़ा है; और अमावस्या हुई तो क्या?”
“आह! कल अगर कोई विदेशी साइंटिस्ट ‘अमावस्या और बासी
खाने पर उसका प्रभाव’ – ऐसा रिसर्च पेपर प्रकाशित करे, तो तुम उसे सिर चढ़ा लोगे.
मैं पारंपरिक सत्य पर विश्वास करती हूँ और मैं तुम्हारे रास्ते में भी नहीं आती,
है ना? अभी उस दिन पड़ोस की मिसेज़ मसिलामणी हमारे घर आकर पूछने लगी कि क्या मैं उसे
थोड़ा सांबार दे सकती हूँ – उसकी भांजी अचानक आ गई थी, मैं इस लड़की से मिल चुकी
हूँ. वह एयर लाइंस में फ़ूड इन्स्पेक्टर है, और फ्रीज़ करने से पहले हर चीज़ उसे देखनी पड़ती है. हाँ,
फ्रीज़ करने से पहले. खाने को ‘चिल ब्लास्टिंग’ प्रक्रिया से फ्रीज़ किया जाता है और तब ‘टेक ऑफ़’
से पहले उसे फ्लाईट में चढाते हैं. फिर उसे गर्म करके यात्रियों को दिया जाता है.
मुझे फ्रिज में रखे हुए खाने से कोई परहेज़ नहीं है, तुम्हें मालूम है. बात बस इतनी है,
कि मैं आज वह नहीं खाना चाहती.”
चंद्रू अपनी ट्रे की ओर देखने लगा.
‘चिल ब्लास्ट’ – यह चीज़ उसके लिए नई थी!!
चंद्रू ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा. बातूनी होस्टेस, जिसने
भरत की हथेलियाँ चॉकलेट्स से भर दी थीं, यह सब सुन रही थी, और उसने चंद्रू से कहा,
“ मैडम ठीक कह रही हैं.”
भरत को खिलाने और उसे थोड़ा दूध देने के बाद ज्योति ने
अपनी इडलियाँ निकालीं.
भरत खिड़की से बाहर आसमान को और धरती को देख रहा था,
उसकी आंखें विस्मित थीं.
तभी
अगली सीट पर बैठे आदमी ने चंद्रू को टोका.
“क्या
तुम पुदुकोट्टाई चंद्रमौली के पोते हो? पंजू और मीनाक्षी
के बेटे?”
ज्योति
की पतली उँगलियों के बीच में इडली का टुकड़ा मानो जम गया.
“वा!!!
अब बादल बरसने ही वाला है,” उसने अपने आप से कहा. आगे की बातचीत
का इंतज़ार करते हुए वह अपनी इडलियों का लुत्फ़ उठा रही थी.
चंद्रू
ने सिर हिलाया.
“मैं
आपके बिल्कुल पड़ोस में रहता था. बाद में दिल्ली चला गया, पच्चीस साल पहले. तुम तो तब बहुत छोटे थे. मगर बिल्कुल अपनी माँ की तरह हो
– बहुत सुन्दर महिला...मुझे और मेरी पत्नी को आपका परिवार बहुत अच्छा लगता था.
तुम्हारी माँ ने मेरी पत्नी को कई पकवान बनाना सिखाया. मेरी पत्नी बहुत स्वादिष्ट
पारुप्पू उसिली बनाती है, जिसे तुम्हारी माँ ने सिखाया था.
मुझे उनकी पूरण पोली की याद है. आहाहा!! मुँह में रखते ही पिघल जाती थी. तुम्हारा
बड़ा भाई अब कहाँ है? मेरे ख़याल में उसका नाम शंकरन है.”
“अभी
वह यू.एस. में है.”
“ओह!
अच्छा है. हमारा बेटा भी यू.एस. में है. और हमारी बेटी लन्दन में है. तुम्हारी एक
बड़ी बहन है ना, तुमसे पंद्रह साल बड़ी. शायद, पद्मा है उसका नाम. उसने घर छोड़कर एक दूसरी जाति के लडके से शादी कर ली,
मुझे याद है. क्या तमाशा हुआ था!! तुम्हारे दादा-दादी बहुत नाराज़ थे, और तुम्हारी माँ कितने ही दिनों तक रोती रही थी. हम उन्हीं दिनों दिल्ली
आ गए थे. अब कहाँ है वह?”
चंद्रू
कुछ चिड़चिड़ा रहा था – उसके पारिवारिक मामलों के बारे में ये जोकर जोर जोर से बात
कर रहा था!!”
“वह
और उसका परिवार अच्छे हैं. वह मुम्बई में है और बहुत अच्छी तरह से हैं. मेरे
जीजाजी बहुत अच्छे इंसान हैं और मेरे माता-पिता अक्सर उनसे मिलते हैं.” उसे पता था
की उसने जोकर के उत्साह पर पानी फेर दिया है, जो कुछ चटपटी बात
सुनने के लिए उतावला था.
“अच्छी
बात है. अगर लड़का अच्छा है तो हम बुरा क्यों मानें? हम कितनी ही
ऐसी शादियों के बारे में सुनते है, जो अरेंज्ड होते हुए भी
टूट जाती हैं. अगर पति-पत्नी सुखी हों तो फिर कोइ बात ही नहीं है. वैसे, मेरा नाम विश्वनाथ है. अगर तुम्हारे माता-पिता को मेरा नाम बताओगे, तो
याद आ जाएगा. मैं विकासपुरी में रहता हूँ. मेरा अपना घर है. मैं मलय मंदिर समिति
का सदस्य भी हूँ,” उसने अपना कार्ड निकालकर चंद्रू की तरफ बढाते हुए कहा. आपको
हमारे घर आना होगा. अगर कोई छोटी-मोटी ज़रुरत हो तो मुझे और मेरी पत्नी को आपकी मदद
करने में बहुत खुशी होगी.”
फिर
वह ज्योति की तरफ मुड़ कर बोला,
“तुम
पलक्कड़ से हो, है ना? जैसे ही तुमने अपने
बच्चे को ‘कोंडे’ (बच्चे!) कहकर पुकारा, मैं समझ गया. तुम्हें पता है, ये छोटा चंद्रू सिर्फ
एक सोने की करधनी बांधे नंगा भागा करता था. करधनी में सामने की ओर एक बड़े पीपल के
पत्ते का डिजाइन था!! कम से कम पाँच तोले का होगा. इसकी माँ के पिता की ज्वेलरी की
दूकान थी, और वह पूरी दुनिया को दिखाना चाहती थी कि उसके
माँ-बाप ने पोते को क्या भेंट दी है!! हा हा हा!!! पड़ोसी बड़े प्यार से उसे ‘नंगा
चंद्रू’ कहते थे.”
चंद्रू
के कान लाल हो गए थे, क्योंकि कोने वाली सीटों के सभी
यात्री इस बातूनी आदमी को सुन रहे थे और खिलखिला रहे थे. उसे बेहद शर्म महसूस हो
रही थी, जैसे उसे बिना कपड़ों के, सिर्फ
एक गहना पहने हुए पकड़ा गया हो!!
ज्योति
को – ‘अच्छा लग रहा था’.
“तुम्हारा
छोटा बेटा अब इसे पहन रहा होगा. बेशक, आजकल माँ-बाप अपने
बच्चों को बिना कपड़ों के नहीं निकलने देते. पहले ही दिन से. कितने सारे ब्रैंड्स
हैं नैपीज़ के.”
ज्योति
सिर्फ मुस्कुरा दी.
मगर
उसे याद आया कि ये ‘चीज़’, किसी पारिवारिक शादी में, कुछ साल पहले, उसकी ननंद के गले की शोभा बढ़ा रही थी. हुम्म्म्मम्...तो ये
बात है! कोई चीज़ जो कानूनन उसके बेटे की होनी चाहिए थी!!
इस
बीच बहुत मेहेरबान चंद्रू भरत को टॉयलेट ले गया.
उसे
इस ‘मुक्ति’ की ज़रुरत थी! छि:!! कैसा जोकर आदमी है...अच्छी
खासी फ्लाईट का सत्यानाश कर दिया.
अचानक
आई फ़्लश की भयानक आवाज़ ने, जिसे ‘सु सू’ के बाद चलाया गया था, बच्चे को भयभीत कर दिया, जिसका कारण सिर्फ उसे ज्ञात था, चंद्रू को नहीं. वह चीखकर अपने पिता से लिपट गया. उसका चेहरा पीला पड़ गया
था और वह तभी कुछ शांत हुआ, जब चंद्रू उसे उठाकर बाहर लाया,
यह समझाते हुए कि ‘वो’ सिर्फ आवाज़ थी. मगर भरत जानता था कि
यह सिर्फ आवाज़ नहीं है और उसे इस आवाज़ के उद्गम और उसके स्त्रोत के बारे में मालूम
था.
जब
वह अपनी जगह पर बैठ गया तो उसने ज्योति से कहा,
“अम्मा, नानी ठीक कहती थी!!”
ज्योति
ने परेशानी से उसकी ओर देखा.
चंद्रू
समझ गया कि नानी ने बच्चे के दिमाग में कोई बकवास भर दी है.
भरत
कहता रहा,
“अम्मा, याद है? नानी कहती थी, कि अगर
मैं ‘पॉटी’ नहीं करूंगा, तो टॉयलेट के भीतर वाला राक्षस मुझे
काट लेगा? वह वहाँ था. वो राक्षस!! वह इत्ती जोर से
चिल्लाया!! अप्पा ने मुझे फ़ौरन उठा लिया!! हाँ, अम्मा. सच
में – वो वहाँ था. मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ. और वह दिखाई भी नहीं दे रहा था, जैसा नानी ने बताया था.”
ज्योति
ने उसे फ़ौरन चुप किया और कहा.
“ओके, ओके, अब तुम थोड़ी देर सो जाओ. तुम बहुत सुबह उठे थे
ना. तुम्हें नींद की ज़रुरत है.”
उसने
डर के मारे चंद्रू की और देखा ही नहीं.
“तुम्हारी
माँ को इन बेवकूफियों के अलावा कुछ और आता ही नहीं है?”
मगर
चंद्रू भी दूसरी ओर देख रहा था, इस डर से कि कहीं वह उसके नंगे
भागने के बारे में चिढाने न लगे.
‘मुरुगा, मेरे भगवान’ को दो बार याद करके विश्वनाथ सो गया था.
भरत
ने भी किसी फ़रिश्ते की तरह अपनी आंखें बंद कर ली थीं.
चंद्रू
भी सोने का नाटक कर रहा था.
ज्योति
मन ही मन मुस्कुराई और ‘तीस दिनों में हिन्दी सीखो’ निकालकर याद करने लगी –
अदरक
– Ginger
भिन्डी
– Lady
Finger
बैंगन
– Brinjal
सबसे
पहली बात है किचन की चीज़ों के बारे में जानना!!
दही
– Curd
काली
मिर्च –
Pepper
अचार
– Pickle
उसकी
भी आंखें बंद होने लगीं.
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