शादी
ज्योति ने भरत को सुलाया ही था कि उसे नीचे से कार की
जानी-पहचानी आवाज़ सुनाई दी.
यह चंद्रू था, जो दिन भर के काम के बाद वापस लौटा था. पिछले एक
हफ्ते से इंटरव्यू चल रहे थे और चंद्रू को प्रमोशन और ट्रांसफर की उम्मीद थी.
उसने दरवाज़ा खोला, मुस्कुराते हुए चंद्रू भीतर आया. जूते उतारते हुए
उसने ज्योति की तरफ देखा और कहा,
“हमें दिल्ली जाना होगा, मुझे वहाँ सेन्ट्रल ऑफिस में पोस्टिंग दी गई
है.”
वह
बहुत खुश हो गई. वह इसलिए खुश थी, क्योंकि दिल्ली आगरा के पास है.
उसका सपना था कि ताज महल देखे. और बेशक, काश्मीर भी बहुत दूर
नहीं था.
डिनर
के बाद वे अगले प्लान के बारे में चर्चा करने लगे – शिफ्ट करने के बारे में.
चंद्रू तो जैसे सातवें आसमान पर था.
“मैनें
सोचा था कि पीटर को ही यह पोस्ट मिलेगी, मगर मेरा रेकॉर्ड
देखने के बाद, दिल्ली के बड़े अफसरों ने मेरी फरमाइश की.”
ज्योति
ने सोचा कि शादी के इन्विटेशन के बारे में बात करने का यही सही समय है. वेडिंग
कार्ड उसे सुबह मिला था. उसे मालूम था कि इस समय चंद्रू किसी भी बात के लिए तैयार
हो जाएगा.
“उससे
पहले हमें एक शादी में जाना है. मुझे मामा से इन्वीटेशन और एक व्यक्तिगत पत्र भी
मिला है, उनके बेटे की शादी है.”
“कौनसे
मामा? कोट्टायम के जोकर मामा?”
उसने
गुस्से का नाटक करते हुए कहा,
“तुम
मेरे रिश्तेदारों के बारे में एक भी अच्छा शब्द नहीं बोल सकते. पत्र लिखा है मेरे
बड़े मामा ने, जो हमारी शादी में इसलिए नहीं आ सके थे, क्योंकि मामी बीमार थी और वह उसे छोड़कर नहीं आ सकते थे. वह तुमसे मिले
नहीं हैं और चाहते हैं कि हम लोग शादी में आयें. शादी दुल्हन के गाँव में है, उसके नाना जी के पुश्तैनी घर में.”
“तुम्हारा
भी तो वहाँ पुश्तैनी मकान है, है ना?”
“हाँ,
मामा का ‘साला’ वहाँ अपने परिवार के साथ रहता है. मामा की
कोइम्बतूर में टेक्सटाइल शो-रूम है और एक बड़ा बंगला है. छुट्टियों में हम वहाँ
जाया करते थे. बेटे ने वहाँ एक और शो-रूम खोला है, और उसीकी
शादी है.”
“क्या
ख़याल है, पलक्काड के लिए टिकट मिल जायेंगे?”
“चलो
भी. शादी अगले महीने है, तुम्हारे दिल्ली में जॉइन करने से पूरे पंद्रह दिन पहले.
हम कोयम्बतूर तक कार से जा सकते हैं. मामा ने दो बसें बुक की हैं, और हम सब एक साथ जा सकते हैं, जैसा उन्होंने कहा
है. गाँव पलक्काड से आगे है, गुरुवय्यूर की तरफ. तुम मामा के
घर में कार छोड़ सकते हो.”
“ये
अच्छा रहेगा, भरत को गाँवों से होकर बस का सफ़र करना अच्छा
लगेगा. उसने गाँव देखे ही नहीं हैं.”
“हाँ, और अम्मा भी वहाँ होगी.”
“मगर
तुम्हारी अम्मा कोयम्बतूर में क्यों होगी? तुम्हारे गाँव से
यह दूसरा वाला गाँव बस कुछ ही किलोमीटर्स तो दूर है ना?”
“मामा
चाहते हैं कि एक बड़े व्यक्ति के नाते अम्मा वहाँ रहे, कुछ चीज़ों की देखभाल के लिए.”
अगले
दिन उसने अपने मामा को फोन किया और अपने कोयम्बतूर पहुँचने के प्लान के बारे में
बताया. उसने अपनी माँ से भी बात की, चंद्रू के प्रमोशन
और दिल्ली ट्रांसफर के बारे में भी बताना नहीं भूली.
“वे
एक बहुत पॉश कॉलनी में क्वार्टर भी दे रहे हैं,” उसने कुछ गर्व से कहा.
ज्योति
बहुत खुश थी कि चंद्रू ने उसकी हर बात मान ली थी. वह ‘राशी सिल्क हाउस’ गई और मामी
के लिए एक साडी और मामा के लिए ज़री का पंचा खरीदा. जिस ममेरे भाई की शादी थी उसके
लिए एक अच्छा सा वैलेट खरीदा. आखिर वह काफी अच्छे पैसे कमाता था!!
और
माँ-बाप और बेटा कार से कोयम्बतूर
पहुंचे.
भरत
को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए इसकी सख्त
हिदायत के साथ एक पूरी लिस्ट दी गई.
मामा
के घर में उनका शानदार स्वागत किया गया. किट्टू मामा को अपनी बहन से चंद्रू के
प्रमोशन के बारे में पता चला था और दामाद की पोस्टिंग और उसका दिल्ली ट्रांसफर
शेखी मारने की बात थी.
ज्योति ने एक ट्रे मांगी और उसमें साडी और धोती रखी और
तीनों ने मामा और मामी के चरण स्पर्श किये. साड़ी पर छः इंच का ज़री का बॉर्डर देखकर
मामी की आंखें चमक उठीं. उसने साड़ी उठाकर चुपके से उस पर हाथ फेरा,
मानो देखना चाहती हो कि प्युअर सिल्क है या नहीं. अगले दिन सुबह-सुबह वे दो बसों
में निकले, करीब सत्तर लोगों का ग्रुप था – मित्र और रिश्तेदार. भरत ज्योति की गोद में
गहरी नींद सोया था और किट्टू मामा लगातार पान की पीक कमीज़ पर उड़ाते हुए चंद्रू से
बातें कर रहा था. चंद्रू के कान लाल हो रहे थे और ज्योति मन ही मन घबरा रही थी कि
कहीं वह उसके मामा को झिड़क न दे.
“मामा, तुम एक झपकी क्यों नहीं ले लेते?
जैसे ही हम वहाँ पहुंचेंगे, तुम्हारे लिए काफी काम होगा. तुम कल रात भी मुश्किल
से ही सोये थे,” उसने सुझाव दिया.
“ना-ना-ना, ज्यो! अब कुछ ही देर में हमें ओट्टापालम रुकना है
ब्रेकफास्ट के लिए. मेरे बचपन के दोस्त का होटल है वहाँ पर और जब भी हम इस गाँव से
गुज़रते हैं, हम वहीं ब्रेकफास्ट करते हैं.”
“अम्मा,” जैसे ही वे बस से उतरे, भरत ने कहा और तर्जनी उठा दी.
पता करने के बाद कि बाथरूम कहाँ है,
वह उसे सीधे छोटे से होटल के पीछे ले गई.
बाथरूम बहुत गंदा था.
“नहीं, मैं यहाँ नहीं करूंगा. बदबू आ रही है. मैं वापस
मद्रास जाना चाहता हूँ. ये जगह अच्छी नहीं है.”
बासे दूध की बू, दोसे का खट्टा आटा, बची-खुची सब्जियां...सबने मिलकर उस जगह को भयानक गंदा
बना दिया था.
आखिर में वह उसे एक आम के पेड़ के नीचे ले गई,
जहाँ भरत ने पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्वों से भरपूर गरम पानी का छिड़काव कर
दिया.
दोनों बसों के आदमी, औरतें और बच्चे होटल में पहले ही
बैठ चुके थे. चूंकि मामा ने मालिक को अपने आगमन की पूर्व सूचना दे रखी थी,
इसलिए कई प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन ब्रेकफास्ट के लिए तैयार किये गए थे :
गरमा-गरम इडली. दोसा, वडा, पोंगल और पूरियां पेश की जा रही थीं. सांबार और प्याज
के साथ आलू की सब्जी ललचा रही थी.
चंद्रू ने
अपनी बगल में दो खाली कुर्सियां रखी थीं, और सामने मामा, उसकी पत्नी और ज्योति की माँ बैठे थे.
“मुझे चॉकोज़ चाहिए,”
भरत ने गला फाड़ा.
“जो चाहिए वह तुम्हें नहीं मिल सकता. जो दिया गया है,
उसे खाना सीखो. तुम्हें तो पूरियां अच्छी लगती हैं, है ना? पूरियां खा लो. सब्जी में बिल्कुल मिर्ची नहीं है.”
चंद्रू ने कडाई से कहा.
जब वह पूरियां खाने पर सहमत हो गया, तो किट्टू मामा की
जोरदार आवाज़ सुनाई दी...
“ऐ... चीमा, सुन्दरम, पंजा, चिन्ना – तुम सब यहाँ आओ.”
वह सब वेटर्स को अपनी मेज़ के पास बुला रहा था. ज़ाहिर
था कि वह हरेक को जानता है.
वे सब उनकी मेज़ के पास इकट्ठे हो गए और मामा ने गर्व
से उनकी और देखते हुए, मुस्कुराकर चंद्रू की ओर इशारा करते हुए कहा:
“क्या तुम जानते हो कि यह कौन है? मेरी भांजी ज्यो का
पति. हमारे घर का दामाद. पी चंद्रू. पी. चंद्रमौली. पुडुकोट्टाइ पंचपाकेशन
चन्द्रमौली. ये तंजौर की तरफ का है. ये मद्रास में बअअअडा ऑफिसर है. अब ये दिल्ली
जा रहा है एक बहुत बहुत बअअअअडी पोस्ट पर. अगर तुममें से किसी को दिल्ली में कोई
काम करवाना है, तो इससे पूछ सकते हो. ये खरा सोना है और है अच्छाई का
अवतार. किसी के भी लिए कुछ भी करेगा.”
चंद्रू को ब्रेकफास्ट कड़वा लगने लगा और ज्योति घबरा
रही थी कि वह क्या करेगा. सौभाग्य से उसने एक हल्की-सी कृत्रिम मुस्कान से जवाब
दिया.
इस बीच एक भारी भरकम आदमी, जो दूसरी बस में था, सिल्क की पीली कमीज़ पहने, आठ उँगलियों में अंगूठियाँ पहने, कलाई घड़ी जैसा मोटा
ब्रेसलेट पहने, बिना गर्दन की गर्दन में भारी सोने की चेन लटकाए उनके
पास आया और ज्योति की माँ को चिढाकर चंद्रू को अपना परिचय देने लगा.
“क्या, अक्का? तुम अपने दामाद को मुझसे नहीं मिलवा रही हो?
ओ.के. मैं ही उसे बता देता हूँ कि मैं कौन हूँ. मैं मार्गबंधु हूँ. मामी का भांजा,
मंगाम्बू से. मैं वहाँ मिरासदार हूँ. मेरा महल जैसा घर है. तुम्हें वहाँ आकर हमारे
यहाँ दो दिन रहना चाहिए.
ज्योति ने संदेह से भरत की ओर देखा (जो उसके इस मामा
की ओर देख रहा था) और इस डर से कि न जाने उसके मुँह से क्या निकल जाए,
उसे वहाँ से दूर खींचने की कोशिश करने लगी.
परन्तु नुक्सान हो ही गया!!
“मैं आपको जानता हूँ. नानी ने मुझे आपके बारे में बहुत
सारी कहानियां सुनाई हैं. उसने कहा था कि तुम अपने आसपास की किसी भी चीज़ को अजगर
की तरह निगल जाओगे. हाँ! हाँ! मलाप्पाम्बू मार्गाभान्तु (पायथन मैं)! क्या आप वही
हो?”
अगर चंद्रू के पास तीसरी आंख होती,
तो ज्योति की माँ पल भर में राख का ढेर बन गई होती. वह ऐसे लोगों से सख्त नफ़रत
करता था, जो दूसरों के जिस्म के बारे में ताने कसते हैं या कोई नाम देते हैं.
सौभाग्य से किसी ने उसे बुलाया, “मार्गु, तुम्हारी कॉफी आ गई है. आ जाओ. गरम-गरम पी
लो.”
जैसे ही वे एक-एक करके होटल से निकलकर बस की ओर जाने
लगे, होटल का मालिक परशुरामन जल्दी-जल्दी चंद्रू के पास आया.
“आपको पता है, मेरा एक सपना है. मैं दिल्ली में एक होटल खोलना चाहता
हूँ. मैंने पैसे भी जमा कर लिए हैं. आप शायद मझे कोई जगह ढूँढने में और लाइसेंस
दिलवाने में मेरी मदद करेंगे. आपकी उम्र लम्बी हो.”
चंद्रू ने मुस्कुराकर अपना सिर हिलाया और बस की तरफ
चला. वह मन ही मन ज्योति के मामा पर घूंसे बरसा रहा था. उसने सोचा,
काश वह ज्योति के साथ शादी में आने पर राजी ही न होता. वह अकेली ही आ जाती.
“परशु मामा तुमसे क्या कह रहे थे?”
जब वे अपनी सीटों पर बैठ गए तो ज्योति ने पूछा.
“वो पूछ रहे थे कि क्या दिल्ली आकर हमारे लिए खाना बना
सकते हैं?” उसने झिड़क दिया और उसे पता चल गया कि चंद्रू के साथ सब कुछ ठीक नहीं है.
सब किट्टू मामा की ही गलती थी!! परिवार के लोग उसे यूँ ही ऑल इंडिया रेडियो नहीं
कहते थे – परिवार के समाचार ऊँची आवाज़ में प्रसारित करना. आह! ये वो दिन थे जब
मोबाइल फोन और SMS मनुष्य की ज़िंदगी में नहीं आये थे. किसी को उनकी ज़रुरत
भी नहीं थी.
शादी दुल्हन के दादा जी के पैतृक घर में हुई,
जो पुरानी स्टाईल में बना हुआ खूब बड़ा, शानदार बंगला था. एक पंडाल लगाया गया था और किट्टू
मामा का बेटा बड़ा खुश था – लड़की बहुत सुन्दर थी – और सभी संबंधी इंतज़ाम से और खाने
से खुश थे. बड़े भारी सेन्ट्रल हॉल में एक कतार में रखे हुए चांदी के और स्टील के
बर्तन चमक रहे थे. मामी को कोई शिकायत नहीं थी. चंद्रू अपने आप को किट्टू मामा की
नज़रों के घेरे छुपा रहा था, ताकि कहीं कोई और ‘परिचय’ का तमाशा न हो जाए.
वह पीछे एक कुर्सी पर बैठकर विधियों का आनंद ले रहा
था. उसने रामासेरी इडलियों का सांबार और तीन तरह की चटनियों के साथ; पुट्टू,
वडा-सांबार और कद्दू के हलवे का, जिसमें से घी टपक रहा था, छक
कर ब्रेकफास्ट किया था, और इस सब के ऊपर बढ़िया कॉफी. नादस्वर से निकलती हुई संगीत
लहरियों पर वह सिर हिला रहा था और उसे ज्योति की एक झलक दिखाई दी जो एक बेहद
ख़ूबसूरत नौजवान से बातें कर रही थी, जो उस वातावरण से ज़रा भी मेल नहीं खा रहा था. वह
ख़ूबसूरत, सौम्य और परिष्कृत लग रहा था. उसे याद आया कि ज्योति उनके पड़ोसी के बेटे के
बारे में बता रही थी, जो लन्दन गया था, और शादी के लिए अपने किसी जर्मन दोस्त के साथ आने
वाला था : हाँ, उसे याद आया कि जर्मन दोस्त जो छ:-सात इडलियाँ गटक
गया था, डाइनिंग हॉल में उसके सामने बैठा था, और इससे पहले समारोह की वीडियो ले रहा
था.
परफ्यूम की एक तेज़ खुशबू ने उसे सिर घुमाने पर मजबूर
किया, और उसने ज्योति की मामी को एक बहुत वृद्ध महिला के साथ आते हुए देखा,
जो उम्र के साथ झुक गई थी. वृद्धा उसके पास बैठी और मामी कहने लगी:
“ये मेरी माँ हैं,. दामाद जी. पिछले महीने निन्न्यानवें साल की हो गईं.
जिद कर रही थी कि उन्हें तुम्हारे पास लाऊँ. थोड़ी देर उनसे बात कर लो और मैं बाद
में आकर उन्हें ले जाऊंगी.”
दंतहीन, मिठासभरी वृद्धा ने उसका हाथ पकड़ा और कहा:
“मेरी बेटी ने तुम्हारे बारे में सब कुछ बताया है. मैं
तुम्हारी शादी में नहीं आ सकी, क्योंकि मैं अपने बड़े बेटे के पास त्रिवेंद्रम में
थी. ज्योति ने बताया कि तुम दिल्ली जा रहे हो. मैं बीस साल पहले काशी जाते हुए
वहाँ गई थी. तब मेरे पति ज़िंदा थे. ज्योति की माँ ने बताया कि तुम एक नए बंगले में
जाने वाले हो.”
“नए नहीं, मामी, सरकारी घर है, और मुझसे पहले वाले ने अभी उसे खाली किया है.”
“ओह, तब तुम्हें प्रवेश करने से पहले नवग्रह शान्ति करवाना
चाहिए. हो सकता है, उन्होंने वहाँ किचन में बकरे और मुर्गियां काटी हों
और हमें उन जानवरों की आत्माएं (‘जंतु’ – उसने इस शब्द का प्रयोग किया था) वहाँ
नहीं चाहिए. – तुम्हें पता है, वे मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं, हाँ लोग
झपेटे में आ जाते हैं!! और उनसे छुटकारा पाना बड़ा मुश्किल होता है. ओह! वह एक
लम्बी प्रक्रिया है.”
चंद्रू ने कल्पना की कि कैसे एक मरी हुई मुर्गी की
आत्मा उसकी सास के शरीर में प्रवेश कर रही है, और उसने उसे कुकडू-कू करते हुए इधर उधर भागते देखा.
उसके चेहरे पर चिढाने का भाव आ गया. “कु-कु”... नौ गज की कांचीपुरम सिल्क की साडी
में एक मुर्गी इधर उधर भाग रही है!!!
“हंसो मत. मैं मज़ाक नहीं कर रही हूँ. दामाद जी. कई साल
पहले मेरी बहू को अचानक गुस्से के दौरे पड़ते थे. हमने एक ज्योतिषी को बुलाकर उसके
भूत, वर्त्तमान और भविष्य के बारे में प्रश्न पूछा. उसने बताया कि एक मृत बकरी
की आत्मा उसके भीतर प्रवेश कर गई है (ज़ाहिर है!!! ज़िंदा आत्मा तो ऐसा नहीं कर सकती
थी... वरना तो वह आत्मा का स्थानांतर हो जाता)!! फिर हमें आधी रात को कुछ साधना
वगैरह करनी पडी थी जिससे उस आत्मा से मुक्ति मिले.”
उसने मलयालम फिल्मों में आधी रात को ऐसे तांत्रिक
प्रकार किये जाते हुए देखे थे और उसके बदन में झुरझुरी दौड़ गई थी!!
इत्तेफाक से किसी सलाह के लिए कोई उसे लेने आया और वह
चली गई.
“ऊऊफ!! क्या भयंकर प्रकार है!!
एक जानवर की आत्मा से मुक्ति पाने के लिए, जिसने
मनुष्य को अपनी चपेट में ले लिया था, आधी रात को तांत्रिक पूजा करना! ये पलक्कड
वाले सनकी हैं, उसने अपने आप से कहा.
वह उस बड़े हॉल के बीच में गया और उसने देखा कि दुल्हन
को मंगलसूत्र पहनाने से पहले नौ गज की साड़ी पहनाने के लिए ले जाया जा रहा था.
मामा बड़े जोश में उसकी तरफ देखते हुए प्रमुख पुजारी से
बात कर रहा था. हे भगवान! बुड्ढे ने मुझे देख लिया, चंद्रू ने सोचा, सत्तर साल का प्रमुख पुजारी उसी की ओर आ रहा था.
“नमस्कार, नमस्कार, नमस्कार! मैं साम्बशिवम् हूँ – परिवार का पुजारी.
मैं अच्छे-बुरे दिनों में इनके साथ रहा हूँ. सुना कि
तुम दिल्ली जा रहे हो. मेरा साडू-भाई विकासपुरी में रहता है. वह वहाँ अम्मान मंदिर
का प्रधान पुजारी है.”
अच्छा! अब ये आदमी नवग्रह पूजा करवाने के लिए उस
पुजारी को मेरे पीछे लगा देगा!! अब मैं इससे कैसे पीछा छुडाऊँ! चंद्रू परेशान हो
रहा था.
पुजारी कह रहा था:
“ये रहा उसका विजिटिंग कार्ड. अपने पास रखो. तुम्हें
अपने माता-पिता के वार्षिक श्राद्ध के लिए किसी साउथ इन्डियन पुजारी को ढूँढने की
ज़रुरत नहीं पड़ेगी. उसे मोबाइल नंबर पर फोन कर दो. वह सब कुछ ले आयेगा और एक दिन
पहले ही एक औरत को भी भेज देगा स्पेशल खाना बनाने के लिए.”
चंद्रू घबरा गया.
उसने कहा, “मामा, मेरे माता-पिता अभी ज़िंदा हैं.”
पुजारी थोड़ा चौंक गया और माफी माँगने लगा. वह खिसक
लिया और वापस अपने ख़ास आसन पर बैठ गया.
मार्केटिंग के लिए इतना कुछ.
अब क्या? चंद्रू सोच रहा था. उसका दिल चाह रहा था कि मद्रास
वापस चला जाए. मगर ज्योति और भरत को खूब मज़ा आ रहा था. भरत ने कुछ दोस्त बना लिए
थे और वे लोग खेल रहे थे, बीच बीच में डाइनिंग हॉल में आ जाते और मुँह में कुछ डाल
लेते. कहीं बच्चे का पेट न बिगड़ जाए.
अचानक चंद्रू को भूख लग आई. शादी के सभी संस्कार पूरे
हो चुके थे और हर कोई डाइनिंग हॉल की ओर जा रहा था.
वह भी उनके पीछे हो लिया, एक बड़े केले के पत्ते की कल्पना करते हुए जिस पर थीं काफी
सारी सब्जियां, मिठाइयां, चासनी में डूबी इमरती, आम का अचार और गाढा दही, पूरी जैसे पापड जिनका एक ख़ास
स्वाद था, केले के चिप्स – नमकीन और मीठे.
उसका ‘मूड’ अच्छा हो गया.
उसकी कमीज़ पर पान की पीक उड़ाने वाले किट्टू मामा को
भूल जाओ.
बकरियों और मुर्गियों की आत्माओं को भूल जाओ. उन्हें
ऊधम मचाकर किसी और के शरीर में जाने दो.
उस पुजारी को भूल जाओ जो उसके तंदुरुस्त माता-पिता का
श्राद्ध करने चला था.
किट्टू मामा की बकवास को भूल जाओ.
सब भाड में जाएँ!
वह पलक्कड़ के ख़ास विवाह-भोज का आनंद
उठाने वाला था, जो बेमिसाल है...
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