मन्नत
चेन्नई सेन्ट्रल रेल्वेस्टेशन के प्रवेश द्वार से
कंपार्टमेंट तक जाना बहुत मुश्किल था. लोगों की भीड़ उमड़ी पड़ रही थी. ऐसा लग रहा था
मानो पूरे शहर की आबादी स्टेशन पर आ गई हो.
चंद्रू एक छोटी सूटकेस और एक ट्रेवल बैग लिए हुए था.
उसकी पत्नी ज्योति के दाएं कंधे पर भी एक ट्रेवल बैग थी, वह अपने बेटे का हाथ
पकडे हुए उसे करीब-करीब घसीट रही थी. उसकी सत्तर साल की माँ के हाथ में भी एक बैग
था और वह बडबडाते हुए इनके साथ-साथ चलने की कोशिश कर रही थी:
“इसीलिये मैं हमेशा कहती हूँ कि ट्रेन पकड़ने के लिए एक
घंटा पहले निकलना चाहिए. देखो, सिर्फ पंद्रह मिनट बचे हैं.”
“श्श्,चुप,
अम्मा. तुम्हारा दामाद (मतलब उसका पति) सुन लेगा. वैसे भी उन्हें पोर्टर्स पर
गुस्सा आ रहा है जो इन तीन बैग्स को ले जाने के लिए दो सौ रुपये मांग रहे थे.”
भरत भुनभुना रहा था, “मेरे पाँव दर्द कर रहे हैं. हमें इतना क्यों चलना है? तुम मुझे उठाती क्यों
नहीं हो?”
आखिरकार वे
अपने कम्पार्टमेंट तक पहुंचे और भीतर घुस गए.
लोग पहले से ही बैठ चुके थे, चंद्रू ने बैग्स को सीट्स
के नीचे धकेला. भरत खिड़की के पास बैठा अपनी नानी और माँ के साथ और चंद्रू सामने
वाली खिड़की के पास बैठ गया.
“मुझे ये खिड़की खोलना है,” भारत ने जोर से कहा.
“ए.सी. कम्पार्टमेंट में खिड़की नहीं खोल सकते, बेटा. इसमें खिड़कियाँ
सील की हुई होती हैं.”
“मगर मुझे बंद खिड़की नहीं चाहिए. इसे अभ्भी खोलो.”
“दामाद जी, आपको ऑर्डिनरी सेकण्ड क्लास में टिकट लेनी चाहिए थी. बच्चा ट्रिप का मज़ा
उठाता.”
चंद्रू ने त्योरी चढ़ाकर अपनी सास की ओर देखा, “पसीने के मारे हम मर
जाते.”
सौभाग्य से तभी ट्रेन चल पडी और भरत खिड़की से बाहर
दृश्यों को तेज़ी से गुज़रते हुए देखता रहा.
टी टी ई ने उनके टिकट चेक किये और चला गया. ज्योति ने
बैग खोला और खाना निकाला. माँ और चंद्रू की तरफ इडली के दो डिब्बे बढ़ा दिए. एक और
डिब्बा निकालकर वह भरत को खिलाने लगी. दो इडलियाँ खाने के बाद बच्चे ने और खाने से
इनकार कर दिया और वह खुद खाने लगी.
उसकी माँ बडबड़ा रही थी, “तुम इडली पर पानी छिड़कना भूल गईं. गले में अटक रही
हैं.”
हर बात में मीन मेख निकालने वाली बूढ़ी औरत को गला घुटकर
मरते हुए देखकर चंद्रू मन ही मन मुस्कुराया. खयाली पुलाव.
भरत अचानक अपनी सीट से उठा और सामने वाली सीट की ओर
लपका. एक अधेड़ आयु के दंपत्ति डिनर कर रहे थे – एग-बिरयानी. वह उनकी ओर देखता हुआ
खडा रहा – उसकी माँ को बहुत अटपटा लग रहा था.
“भरत, यहाँ आओ,” उसने हुक्म दिया.
भरत उनसे पूछ रहा था, “आप क्या खा रहे हैं? इसकी अलग खुशबू क्यों है? क्या मैं ये गेंद ले सकता हूँ?” वह बिरयानी के अंडे
की ओर इशारा कर रहा था.
ज्योति की माँ घबरा कर उठी. उसने भरत को दूर खींचने की
कोशिश की.
“ये अच्छी आदत नहीं है. तुम्हें लोगों से पूछना नहीं
चाहिए कि वे क्या खा रहे हैं. और हम इस तरह का खाना नहीं खाते – अंडा वगैरह.”
“क्या वो अंडा है? अंडा क्या होता है?”
उस आदमी ने कहा, “कोई बात नहीं, दादी जी, वह बच्चा है. मेरे बच्चे, यह हमारा खाना है और
तुम्हें इसे नहीं खाना चाहिए.” वह देख रहा था कि वह एक कट्टर महिला है.
“मगर क्यों?”
वह नानी से छिटकने की कोशिश कर रहा था.
“ओके. ऐसा सरकारी नियम है ट्रेनों में. हरेक को सिर्फ
अपना ही खाना खाना चाहिए. अगर तुमने इसे खाया तो तुम्हें पुलिस पकड़ लेगी.”
ज्योति उनकी तरफ देखकर मुस्कुराई, उन्होंने बड़ी चतुराई
से हालत को संभाल लिया था.
“मुझे जाना है,” बच्चे ने अपनी छोटी उंगली उठाई.
चंद्रू अपनी सीट से उठा और ज्योति ने उसे रोकने की
कोशिश की.
“मैं जाती हूँ. वह हमेशा ऐसा ही कहता है और पॉटी करके आयेगा.”
“नहीं, अम्मा, मैं पॉटी नहीं करूंगा. मुझे अप्पा के साथ टॉयलेट जाना
है.”
चंद्रू उसे टॉयलेट ले गया.
बच्चे ने पॉटी ही की.
चंद्रू उसे अकेला छोड़कर अपनी पत्नी को बुलाने नहीं जा
सकता था. उसने अपने आप को गालियाँ दीं. अब उसे बच्चे को साफ़ करना पडेगा...जो उसने
पहले कभी नहीं किया था. उसने तो छुटपन में उसकी नैपीज़ भी नहीं बदली थीं.
“हो गया, अप्पा.”
उसने बच्चे से खड़े होने के लिए कहा.
“मगर अम्मा तो मुझे बैठे हुए ही धुलाती है.”
“मैं तुम्हारी अम्मा नहीं हूँ! सुन
रहे हो? अब खड़े हो जाओ!!”
बच्चा ठिनठिनाने लगा और चंद्रू ने कठिन काम शुरू किया.
इस बीच ज्योति को पूर्वानुमान हो गया कि उसका बच्चा
शायद महान काम करने वाला है, और वह टॉयलेट की ओर गई और दरवाज़ा भडभड़ाने लगी. (उसने
सोचा कि चंद्रू बच्चे को वेस्टर्न टॉयलेट
ले गया होगा). कुछ देर में दरवाज़ा खुला और एक लाल चहरे वाले,
परेशान सरदारजी नज़र आये, जो गुस्से से उसकी ओर देखते हुए निकल गए.
वह चुपचाप अपनी सीट पर लौट आई, वह
नहीं चाहती थी कि चंद्रू को इस गड़बड़ का पता चले. फिर तो उसका कोई अंत ही नहीं
होता.
बच्चे की जीन्स और उसकी टी शर्ट का निचला हिस्सा पूरी
तरह गीले हो गए थे. उसे उसकी ड्रेस बदलनी पडी.
“मैं ऊपर जाकर सोना चाहता
हूँ,” भरत चिल्लाया.
“नहीं,
जैसा कहता हूँ वैसा करो. तुम नीचे सोना. अगर ऊपर गए तो गिर जाओगे,”
चंद्रू ने कठोरता से कहा. वह अभी भी बेटे को ‘साफ़ करने’ के अनुभव से उबरा नहीं था.
“नईईईईईईईई...मैं वहाँ सोना चाहता हूँ,”
अपने निर्णय पर जोर देते हुए वह चीखा.
“तुम वहाँ नहीं सो सकते, भरतु,” नानी ने उसे शांत करने की कोशिश की,
“वहाँ पूछन्दी (राक्षस) है, जो बच्चो को निगल जाता है.”
“तुम्हारी माँ बच्चे के दिमाग में यह सब बकवास क्यों
भर रही है?” चंद्रू ने हौले से दखल दी.
ज्योति ने पलट कर जवाब दिया,
“ओके, स्कॉलर. अगर कर सकते हो, तो उसे वैज्ञानिक तरीके से समझाने की कोशिश करो. उसे
एक लेक्चर दो. मैं सोने जा रही हूँ.”
आखिर में नानी से एक कहानी सुनते हुए बच्चा सो गया.
वह किसी फ़रिश्ते की तरह लग रहा था.
ये तो मैंने आपको बताया ही नहीं कि
यह यात्रा किस लिए थी.
तीन साल पहले एक वायरल अटैक में बच्चा लगभग मरते-मरते
बचा था, तब उसकी उम्र थी सिर्फ डेढ़ साल. और ज्योति की माँ ने मन्नत मानी थी कि
बच्चे के वज़न के बराबर मक्खन किसी एक विशेष मंदिर में अर्पण करेंगी. वह अपनी बेटी
और दामाद से कहती आ रही थी कि वे जाकर मन्नत पूरी करें, मगर चंद्रू टालता जा रहा था.
और, वह एक महीना पहले गांव से उनके पास आ धमकी और उनके
पीछे पड़ गई. आखिरकार उसे सफलता मिल ही गई, चंद्रू की नाराज़गी के बावजूद.
“आखिर ये बुढ़िया औरों के लिए मन्नत क्यों मांगती है और हमें मुसीबत में डालती है?”
उसने ज्योति से शिकायत की थी.
“क्या तुम्हें याद है कि भरत की हालत कितनी गंभीर थी?
अगर उसने वह मन्नत न मानी होती तो, क्या तुम सोचते हो कि बच्चा आज हमारे साथ होता?
तुम ऐसा ही कहते हो. आखिर तुम्हारे माँ-बाप तो मन्नतों और मंदिर की ट्रिप्स की कोई
कदर ही नहीं करते. तुम्हारा परिवार तो अधार्मिक है.”
चंद्रू खामोश रहा.
कुछ और कहता तो उसके माँ-बाप का भी बातचीत में ज़िक्र
हो जाता.
वह परेशान हो रहा था कि तौलने के दौरान भरत मंदिर की बड़ी
भारी तराजू पर खामोशी से बैठेगा या नहीं.
जब उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया तो वहाँ भक्तों की
भारी भीड़ थी.
“हमें इन दिनों में नहीं आना चाहिए था. मेरे दोस्त बता
रहे थे कि मंदिर में अय्यप्पा भक्तों की बाढ़ आई होगी. तुम्हारी माँ ने जिद की.
तुम्हारा दिमाग कहाँ गया था?”
चंद्रू दबी आवाज़ में बडबडाया, ताकि सिर्फ उसकी पत्नी
ही सुके.
“थोड़ा धीरज रखो. भगवान की कृपा से हमें जल्दी दर्शन हो
जायेंगे.”
“ओह! क्या इस बारे में भी भगवान से बात कर ली है?
अगर वह हमें शीघ्र दर्शन दे, तो तुमने क्या मन्नत मानी है?”
वह चुप रही.
“अम्मा, मुझे पानी चाहिए.”
“बच्चे, तुम अभी पानी नहीं पी सकते. हम मंदिर के बिलकुल पास
हैं. हम भगवान की पूजा करेंगे और बाहर आने के बाद तुम्हारे लिए कूल-ड्रिंक
खरीदेंगे.:
“मगर मुझे अभ्भी कूल ड्रिंक चाहिए.”
तभी भीड़ में धक्का-बुक्की हुई और बच्चा बिसूरने लगा.
चंद्रू का चेहरा लाल हो रहा था.
एक भले पुजारी ने, जो उनकी परेशानी देख रहा था,
उन्हें एक ओर को खीचा और एक बगल वाले प्रवेश द्वार से जाने के लिए कहा.
बूढ़ी औरत भाव विभोर हो गई.
“दामाद जी, आपकी कृपा से आज मुझे बहुत अच्छे दर्शन हुए. भगवान आप
पर कृपा करे. मुझे तो अब जीवन में किसी चीज़ की ज़रुरत नहीं है. बस मोक्ष ; मुझे
सिर्फ मोक्ष चाहिए,”
चंद्रू फिर ख्यालों में मुस्कुराया, ‘तथास्तु’
वह बुदबुदाया.
मन्नत पूरी करने वालों की लाइन बड़ी थी. काली धोतियों वाले
भक्त मन्त्र पढ़ते हुए उमड़े पद रहे थे.
“मुझे लिम्का चाहिए.”
“यहाँ लिम्का नहीं है, बच्चे. पहले तुम्हारा वज़न कर लेंगे और फिर मैं
तुम्हारे लिए एक कूल ड्रिंक और खिलौनों की दूकान में एक नई कार खरीदूंगी.”
बच्चे ने तराजू के पलड़े पर बैठने से साफ़ इनकार कर
दिया. मनाना, धमकाना, चिल्लाना – कुछ भी काम न आया.
पेप्सी (जिसकी उनके घर में सख्त मनाही थी) की,
नई खिलौने वाली कार ही, नई ड्रेस की रिश्वत
– कुछ भी काम न आया.
एक सिक्यूरटी गार्ड, जो यह सब देख रहा था उनके पास आया और कडाई से बच्चे
की ओर देखते हुए उसने ऑर्डर दिया:
“फ़ौरन इस पलड़े पर बैठ, नहीं तो मैं तुम्हें जेल में डाल दूँगा.”
बच्चा चुपचाप पलड़े पर चढ़ गया और वहाँ बैठ गया.
जब सफ़ेद मक्खन के पैकेट्स तराजू के दूसरे पलड़े पर रखे
जा रहे थे, तो वह मुँह बनाए बैठा रहा.
जैसे ही सिक्यूरिटी गार्ड दूर गया, चंद्रू बडबडाया, “ईडियट,
बेवकूफ. उसका चेहरा तो देखो!!”
“देखो, कितनी बार मैंने तुमसे कहा है कि बच्चे के
सामने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल मत करो!! अगर वह सिक्यूरिटी गार्ड सुन लेता तो?
तुम्हारी और तुम्हारे पिता का ये बौद्धिक घमंड है. तुम्हारे लिए तो,
तुम्हें छोड़कर बाकी सब ईडियट्स और बेवकूफ हैं.” ज्योति चंद्रू पर चिल्लाई.
“चुप रहो, ज्योति, लोग देख रहे हैं,” उसकी माँ फुसफुसाई.
यह महान यंत्रणा आखिरकार पूरी हुई.
अब उन्हें वाकई में भूख लगी थी और वे अपने हॉटेल के
रेस्टारेंट में घुसे.
“मुझे नूडल्स चाहिए.”
“यहाँ तुम्हें नूडल्स नहीं मिलेंगे, भरत, वे सिर्फ
चावल देते हैं. जो दिया गया है, वही खाओ.” चंद्रू की आवाज़ कठोर थी.
“मगर मुझे आज चावल नहीं खाना है. मुझे नूडल्स चाहिए.
तो फिर, क्या मैं सैंडविच ले सकता हूँ?”
“वो सब यहाँ नहीं मिलेगा, बच्चे. जब हम घर पहुँच
जायेंगे, तो अम्मा जो चाहोगे, बना देगी. ओके?”
“बच्चे को जंक फ़ूड दे-देकर बिगाड़ दिया है,”
चंद्रू बीच में टपक पडा.
वेटर खाने की तीन थालियाँ लाया और एक छोटी प्लेट में
चावल, दाल और पापड.
भरत ने वेटर से पूछा,
“क्या तुम्हारे पास रंगीन चावल है,
अंडे के साथ?”
वेटर ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं. अगर तुम ये सब खा लोगे तो मैं तुम्हें एक
मिठाई दूँगा.”
खाना बड़ी देर तक चलता रहा, इसके बाद वे हॉटल से ‘चेक आउट’ करके स्टेशन के लिए
निकले.
“सुनो, दामाद जी. ये यात्रा मेरे लिए बहुत अच्छी थी.
देखो...भगवान दयालु है. अगर तुम बीमारी या मुसीबत के दौरान उससे कोइ मन्नत मांगते
हो, तो वह तुम्हारी सारी तकलीफे दूर करता है. वासु से (चंद्रू का छोटा भाई,
जिसके लिए वे जोर शोर से एक अच्छी बहू की तलाश कर रहे थे) कहना कि वह तिरुपति में
बाल देने की मन्नत मांगे. उसे एक सुन्दर पत्नी मिलेगी, बिल्कुल पद्मावती देवी जैसी.”
जब वे कम्पार्टमेंट में बैठ गए तो चंद्रू ने अपनी
पत्नी से कहा,
“अगर तुम्हारी माँ ने फिर कोई मन्नत मांगी,
तो मैं तुम्हें तलाक दे दूँगा!!! ये सब पूरी ज़िंदगी याद रहेगा!! मैं सच कह रहा
हूँ.”
और गर्भ गृह में भगवान मुस्कुरा रहे
थे.
*****
No comments:
Post a Comment