‘IT’
‘IT’ खरीदने के बाद
ईश्वर शॉपिंग मॉल से बाहर आया.
उसके शॉपिंग के दिन काफी कम हो गए
थे. बाहर वह सिर्फ लाइब्रेरी और गोल्फ लिंक्स में जाता था. उसे किताबें पढ़ना और
म्यूजिक सुनना अच्छा लगता था.
वह रास्ता पार कर रहा था तो उसे एक परिचित आवाज़
सुनाई दी. उसने मुडकर देखा कि डेविड किसी व्यक्ति के साथ नव निर्वाचित अमेरिकन
प्रेसिडेंट के बारे में बहस कर रहा था.
डेविड पुराना दोस्त था, मगर अभी डेविड
से मिलने का उसका कोई इरादा नहीं था.
भगवान!! अगर वह मुझे देख ले तो!
डेविड बहुत जिज्ञासु था, वह किसी
व्यक्ति के मुँह से वह बात निकलवाने में माहिर था, जो वह छुपाना चाहता. वह जोंक की तरह
चिपक जाता और किसी डेंटिस्ट की तरह आपके दिमाग को (न कि मसूड़ों को) सुन्न करके
आपके भेद निकलवा लेता. ईश्वर कुछ भी बताना नहीं चाहता था. और डेविड को तो किसी हाल
में नहीं. उसके घर पहुँचने से पहले सारी दुनिया को ‘IT’ के बारे में
पता चल जाता.
‘IT’ को कमीज़ की जेब में रखे वह खुशी-खुशी घर पहुँचा.
जैसे ही उसने बड़े-भारी कम्पाउंड में पैर रखा, वह माधवन से टकराया, जो बगल वाले अपार्टमेंट में
रहता था.
“आह!
ईश्वर सर! मैंने आपको मॉल में जाते देखा था. मैं आपके साथ आना चाहता था, मगर मुझे
घर जल्दी पहुँचना था – मेरी बीबी को फौरन कुछ किराना सामान चाहिए था. आपने क्या
खरीदा?” उसने
कमीज़ की जेब से बाहर झांकते हुए ‘IT’ को देखते हुए पूछा.
‘सब
जानना चाहता है ईडियट,’ ईश्वर मन ही मन बुदबुदाया
और बोला,
“ ये? ओह, ये? हुम्...अपने
तक ही रखना माधवन. पिछले दो दिनों से सीने में हल्का दर्द महसूस हो रहा था. तुम तो
जानते हो कि अगले हफ्ते हम मेरे भाई की शादी के लिए दिल्ली जा रहे हैं, है ना?”
अभी
फ़ौरन किसी डॉक्टर के पास जाने का मेरा इरादा नहीं है. मैंने बस, कुछ सोर्बिट्रेट
टेब्लेट्स खरीदी हैं, अगर दर्द उठे तो. घबराने की कोई बात नहीं है, माधवन. मैं
बिल्कुल अच्छा हूँ. इस ट्रिप से पहले मैं घर वालों को परेशान नहीं करना चाहता.”
लिफ्ट
में उसने ‘IT’ को
कमीज़ और बनियान के बीच सरका दिया. कमीज़ को कसकर बंद करते हुए वह अपने अपार्टमेंट की
ओर गया.
श्री
ने दरवाज़ा खोला.
“तुम
कहाँ थे इतनी देर? जाओ, हाथ-पैर धो
लो. कॉफी तैयार हो रही है.”
वह
उनके बेडरूम में गया और सोचने लगा कि ‘IT’ को कहाँ छुपाये. वह नीचे झुका और ‘IT’ को पलंग के
नीचे सरका दिया.
“है!
आप क्या कर रहे हो,
दादाजी?”
ये
अरुण था.
नन्हा
शरारती बच्चा.
ईश्वर
इसीसे तो टकराना नहीं चाहता था.
उसने
ऐसा दिखाया जैसे कुछ सिक्के गिरा दिए हों
और उन्हें उठा रहा हो.
“कुछ
नहीं, कुछ
भी तो नहीं. ये एक रुपये का सिक्का पलंग के नीचे चला गया था और मैंने उसे उठा
लिया.. बस.”
अरुण
हंसने लगा,
“घुटनों के बल झुके हुए तुम इतने मजेदार लग रहे थे. घुटनों और हाथों पर. मैंने
सोचा कि तुम पलंग के नीचे छुपने वाले हो.”
“कैसा
मज़ाक है?” श्री
कॉफ़ी का कप लेकर कमरे में आई.
“तुम्हें
उन्हें देखना चाहिए था, अभी.
गुडी-मुडी बने हुए...हां हां हां...घुटनों और हाथों के बल...”
“कुछ
नहीं, श्री. मैंने बस एक सिक्का गिरा दिया, उसीको बाहर निकाल रहा था.”
“क्या
पूरे निकाल लिए? मैं
झाडू लगाकर पलंग के नीचे देख लेती हूँ, कि कुछ और सिक्के तो नहीं पड़े हैं.”
“नहीं!
नहीं! नहीं! मैंने बस यही एक रुपये का सिक्का गिराया था. बाकी के सब मेरी जेब में
हैं.”
“ओके.
ओके. मगर इसके लिए इतना परेशान होने की ज़रुरत क्या है?”
अरुण
गायब हो गया, और
ईश्वर कॉफी की चुस्कियां लेने लगा. उसने सोचा कि उसे पलंग के नीचे से ‘IT’ को निकाल कर
कहीं और रखना चाहिए.
श्री
के जाने के बाद उसने दरवाज़ा बंद किया और फ़ौरन घुटनों पर झुक कर ‘IT’ को बाहर निकाल
लिया. उसे निकट ही माधुरी की आवाज़ सुनाई दी और उसने फ़ौरन गद्दा उठाकर ‘IT’ को गद्दे के
नीचे रख दिया और पलंग पर बैठ गया.
माधुरी
भीतर आई और उसने पूछा, “आपने
दरवाज़ा क्यों बंद किया था?”
“ओह!
कुछ नहीं. कुछ भी तो नहीं. बस यूँ ही. बहुत हवा चल रही है.”
“हवा? चलो भी, अप्पा. खिड़की
उस तरफ है और दरवाज़े से तो हवा आती ही नहीं है. ओके, मैं आपको कुछ दिखाना चाहती हूँ, जो मैंने आज
सुबह खरीदा है.”
“अभी
नहीं,
माधुरी. बाद में. अब मैं कुछ देर यहाँ बैठना चाहता हूँ.”
माधुरी
ने परेशानी से उसकी ओर देखा. यहाँ बैठना है? किसलिए? उसने कंधे उचकाए और चली गई.
ईश्वर
ने गद्दे के नीचे से ‘IT’ को
बाहर निकाला और बाथरूम में घुस गया. उसने स्नान किया और एक कुर्ता पहना.
‘IT’ सुरक्षित था, जेब के भीतर
टंका हुआ.
वह
पूजाघर में गया.
उसने
माथे पर विभूति लगाई और ‘IT’ को
छुपाने के लिए कोई अच्छी जगह ढूँढने लगा.
“आप
यहाँ हैं? आप
क्या कर रहे हैं, ताता?”
‘भाग
जा’. उसने मन ही मन अपने पोते को गाली दी.
दरवाज़ा
बंद करो और बाहर जाओ, अरुण.
मैं कुछ प्रार्थना करूंगा. मैं नहीं चाहता कि कोई परेशान करे.”
अरुण
हैरान-सा बाहर गया, वह
परेशान था कि न जाने उसके दादा जी को क्या हो गया है! यह पहली बार था, जब वह अपने
दादा जी को प्रार्थना करते हुए देख रहा था.
ईश्वर
ने कुछ देर इंतज़ार किया.
आह! अब
मैदान साफ़ है.
यह सही
जगह है. यहाँ कोई भी ‘IT’ को नहीं देखेगा. उसने ‘IT’ को दीपदान वाले लकड़ी के तख्ते के
नीचे रखा, जिस पर चांदी का दीप जल रहा था.
थोड़ी
देर में वह उठकर बाहर आया.
जब वह
और श्री अपने कमरे में चले गए तो ड्राइंग रूम असाधारण रूप से सजीव हो उठा : अरुण
और श्री बालाजी को ईश्वर के बारे में बता रहे थे.
“अप्पा, दादा जी को कुछ हो रहा है. वह
घुटनों के बल झुककर पलंग के नीचे देख रहे थे! और बोले कि उन्होंने एक सिक्का गिरा
दिया है, जिसे वे बाहर निकाल रहे हैं.”
बालाजी
ने, जो इंडिया-श्रीलंका एक दिवसीय मैच के हाईलाइट्स देख रहा था, अपनी आंखें
अरुण की ओर घुमाईं.
“गिरे
हुए सिक्के को ढूँढने में अजीब क्या है? इसमें गलत क्या है?” वह कुछ तैश
में बोला.
“मैं
भी सोच रही हूँ, कि
अप्पा को कुछ हो रहा है,”
माधुरी ने अपने ससुर के बारे में पुश्ती जोड़ी.
वह
बिस्तर पर बैठे थे, कुछ
कर भी नहीं रहे थे और बोले कि वे वहीं कुछ देर अकेले रहना चाहते हैं.”
बालाजी
हँस पडा.
“छोडो
भी, मधु, वह जहाँ जी
चाहे बैठ सकते हैं, है ना? तुम लोग कुछ
अजीब ही तरह से बर्ताव कर रहे हो. तुम दोनों को ही कुछ हो गया है...”
“नहीं
अप्पा! क्या तुमने कभी दादा जी को पूजाघर में बैठे देखा है? तो, वो वहाँ थे.
और उन्होंने मुझे दरवाज़ा बंद करके जाने के लिए कहा. बोले, कि ध्यान करना
है!! इसका क्या जवाब है आपके पास?”
बालाजी
ने जवाब नहीं दिया. अप्पा क्या कर रहे हैं?
अब वह
भी कुछ परेशान हो गया. क्या अप्पा को पूजाघर में जाकर देखूँ, ध्यान करते हुए!!
फोन की
घंटी बजी और बालाजी ने रिसीवर उठाया.
“ओह, माधवन अंकल? कैसे हैं आप?”
“........”
“ऐसी
बात है?”
“..........”
“नहीं, मैं उन्हें
नहीं बताऊँगा कि आपने फोन किया था. बहुत अच्छा किया आपने, जो मुझे
बताया.”
उसने
रिसीवर रख दिया.
“माधुरी, अरुण, तुम लोग ठीक
कह रहे थे. शायद अप्पा ने सोर्बिट्रेट टेब्लेट्स खरीदी
हैं...पता है ना, जिन लोगों को हार्ट की प्रॉब्लम होती
है. वह हमसे कुछ छुपा रहे हैं. माधवन अंकल बता रहे थे कि अप्पा के सीने में कुछ
दर्द है.”
अरुण
सीधे पूजाघर में गया और चारों और टेबलेट्स की स्ट्रिप्स ढूँढने लगा, अगर वह
स्ट्रिप्स पूजाघर में हों तो... उसे कुछ नहीं मिला. आखिर में उन तीनों ने फैसला
किया कि अगले दिन इस बारे में बात करेंगे.
मेज़ लग
चुकी थी और पूरा परिवार नाश्ते के लिए इकट्ठा हो गया था.
जब
ईश्वर भीतर आया, तो सब
वहीं थे : उसकी पत्नी श्री, बेटा
बालाजी, बहू
माधुरी और पोता अरुण.
उसने
सोचा कि सभी बेहद चुप हैं. माधुरी ने उसकी प्लेट में दो इडलियाँ परोसीं.
“आज
कुछ मीठा क्यों नहीं है, मेरी
बच्ची? आज
वेलेंटीन डे है, और तुमने मुझे बालाजी की गिफ्ट नहीं दिखाई. क्या भूल गईं?”
वह
उसके पिता के समान था.
“अच्छा, गिफ्ट बाद में
दिखाना, मगर
स्वीट कहाँ है?”
वह
रोने लगी.
“आपने
हमसे छुपाया क्यों, अप्पा? जैसे आपकी
तबियत के मुकाबले में दिल्ली की ट्रिप ज़्यादा ज़रूरी है?”
“तुम
क्या कह रही हो?” ईश्वर ने पूछा.
श्री
परेशान हो गई.
“क्या
आपकी तबियत ठीक नहीं है?” उसने
पूछा.
बालाजी
ने कहा:
“कल
रात को माधवन अंकल ने फोन किया था और कहा कि आपने सोर्बिट्रेट की टेब्लेट्स खरीदी
हैं....”
ईश्वर
ठहाका मारकर हँस पडा!! वो चिपकू माधवन!! मुझे उसके बारे में सोचना चाहिए था!!
“शांत
रहो, सब
लोग. मैं आप लोगों की ही तरह एकदम तंदुरुस्त हूँ,” उसने कहा.
“आप
क्या छुपा रहे थे, ताता?”
ईश्वर
उठा और पूजाघर में गया, वह ‘IT’ लेकर बाहर आया.
“श्री
के साथ शादी हुए बावन साल हो गए. मैंने उसे किसी भी मौके पर कोई गिफ्ट नहीं दिया.
मैंने सोचा कि इस वेलेंटीन डे पर उसे कोई गिफ्ट दूँगा, जैसा बालाजी पिछले पंद्रह
सालों से कर रहा है.”
उसने
वह छोटा पैकेट खोला और श्री के हाथ में छोटा सा मखमली बैग रखा.
उसमे
ख़ूबसूरत ईयर-रिंग्स का सेट था
...सोने
में जड़े हुए हरे पत्थर.
‘हैपी
वेलेंटीन डे,” उसने
श्री से कहा.
वह
बेटे की ओर देखकर मुस्कुराया, यह कहते हुए, “हार्ट प्रॉब्लम? IT is!!!”
बूढ़े
आदमी का पहला वेलेंटीन गिफ्ट अपनी बूढ़ी पत्नी को!!
हाय!!! रोमांस देर से ज़रूर आ सकता है! मगर कभी ख़त्म नहीं
होता.
***
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