यथार्थ
दिव्या आर्ट
गैलरी से बाहर आई और कुछ देर सीढ़ियों के पास रुकी.
बात यह
नहीं थी कि वह एक बार फिर से जाकर प्रदर्शित वस्तुओं को देखना चाहती थी. बिलकुल
नहीं. उसने अपने आप से कहा.
वह घर
की ओर चलने लगी.
अभी
दोपहर हो चुकी थी, मगर
सूरज बादलों के पीछे छुप गया था. दक्षिण की ओर काले-भूरे बादलों का आवरण भारी
बारिश की चेतावनी दे रहा था. उसे बारिश अच्छी लगती थी और उसे वे दिन याद आये, जब वह बैग में
छाता रखकर पूरी तरह से गीली घर आती थी. मगर वे उसके स्कूल और कॉलेज के दिन थे, और डाँट के साथ
गरम गरम रसम देने के लिए घर में अम्मा थी.
उसके
दिल में ऊपर वाले आसमान से ज़्यादा अन्धेरा था. “मुझे इस एक्ज़िबीशन को देखने के लिए
नहीं निकलना चाहिए था,” उसने सोचा. इन पेंटिंग्स के बारे में रिव्यू पढ़कर इन्हें
देखने के लिए आना बेवकूफी थी, जो यथार्थवाद, अतियथार्थवाद, कला के अध्यात्मिक पहलू इत्यादि की
प्रशंसा कर रहा था – मॉडर्न आर्ट के बारे में घिसे पिटे विचार, जबकि उसे मालूम था
कि यह उसके लिए नहीं है.
वह एक
आर्टिस्ट थी. फाईन आर्ट्स की विद्यार्थी. उसे याद आया कि कैसे इन विषयों पर वह
किताबें छान मारती थी, और अपनी कक्षा की चारदीवारी में उनके बारे में निबंध लिखा
करती थी.
मूर्ख, ढोंगी और
पाखंडी...
अपने
कॉलेज के दिनों में मैं यह सब थी, उसने सोचा. सिर्फ ज़्यादा नंबर पाने के लिए. ये
वो दिन थे जब दिल वाकई में जॉन कॉन्स्टेबल और रेम्ब्राँ के लिए धड़कता था, मगर
उंगलियाँ मॉडर्न आर्ट पर पन्ने के पन्ने लिख डालती थीं.
अंत
में, हम सभी पाखंडी हैं. मैलापुर से नुन्गबक्कम तक वह इन्हीं ख्यालों में खोई हुई
थी. उसे उन कलाकारों पर दया आ रही थी, जो भयानक आर्ट फॉर्म्स; अधूरे प्रसव प्रस्तुत
करते थे.
उसने
अपने आप से कहा,
“सोसायटी और मीडिया ने ऐसे आर्टिस्टों की तारीफ़ की है. सिर्फ एक सामाजिक पहचान की
ज़रुरत होती है, फिर
तो आप कुछ भी चीज़ बना दो, उसे
एक नाम दे दो, और
उसे आर्ट कह दो. अमीरों और प्रसिद्ध लोगों के लिए वक्त गुजारने का साधन! और इसे
प्रमोट करने के लिए ‘चमचे’ होते हैं.”
“ओह!
भगवान! मैं यह सब क्यों सोच रही हूँ? क्या मैं उनसे ईर्ष्या कर रही हूँ? क्या इसी को
‘इन्फ़ीरिआरिटी कॉम्प्लेक्स’ कहते
हैं? छिः! नहीं!”
वह
हंसी और उसने दरवाजा खोला.
“कितनी
जल्दी घर पहुँच गई मैं!”
उसने
चहरे पर पानी के छींटे मारे और हमेशा की प्रसन्नता लौट आई.
उसने
पलंग के नीचे सरकाई हुई बड़ी सूटकेस खीची. उसे खोलते हुए उसका दिल धड़कने लगा. उसने
एक-एक करके अपनी सारी पेंटिंग्स बाहर निकालीं. बारिश में भीगी हुई आदिवासी महिला, ठण्ड से कुछ
थरथराती हुई.
पानी
का गिरता हुआ झरना और बल खाती हुई नदी. नदी के किनारे पेड़ जिन पर बहार आई थी. चाँद
की रोशनी में झिलमिलाता मंदिर का गुम्बज...हर पेंटिंग उसी ने बनाई थी.
‘अगर
मैं भी अपनी एक एक्ज़िबीशन लगाऊँ तो,’ उसने सोचा और
हँस पडी. इन्हें देखने की तकलीफ कौन उठाएगा? असल में, क्या कोई आर्ट गैलेरी इन्हें प्रदर्शित
भी करेगी? उसे
याद आया कि उसने कुछ दिन पहले एक रिव्यू पढ़ा था, जिसमें एक आर्ट-क्रिटीक ने ऐसी
प्रस्तुतियों को ‘कैलेण्डर आर्ट’ कहा था.
एक
असली पेंटिंग एक खामोश कविता होती है. मगर खामोश कवितायेँ कौन पढ़ता है?
टेलीफोन
की घंटी बजी. दिव्या फोन लेने के लिए भागी. यह उसके पति, जयंत का फोन
था, जो ऑफिस से
बात कर रहा था.
“दिव्या, जी.एम. यहाँ
अचानक आये हैं. वह हमारे यहाँ डिनर पे आयेंगे. मैं जल्दी पहुँचने की कोशिश करूंगा.”
मिस्टर
सिन्हा... उन्हें साउथ इन्डियन खाना पसंद है.
ऊप्स!
पापड तलने के लिए नारियल का तेल नहीं है.
उसे
याद आया कि नौकरानी बता रही थी, कि चार ब्लॉकस छोड़कर एक बिल्डिंग में नई किराने
की दुकान खुली है.
जब तक
वह उस दुकान में पहुँची, जो एक
फ़्लैट में थी, बारिश
की बूँदें गिरने लगी थीं.
काऊंटर
पर बैठे बूढ़े आदमी ने मुस्कुरा कर उसका स्वागत किया. आटा छान रही एक औरत के पास एक
छोटा बच्चा बैठा था. फ़्लैट के सामने वाले कमरे को दुकान में बदल दिया गया था.
दीवारों
पर भूतपूर्व और वर्त्तमान नेताओं की तस्वीरें लगी थीं.
वाह!
ये क्या है?
एक
ख़ूबसूरत ऑइल पेंटिंग भी थी – एक पहाड़; पेड़ों की पत्तियों के बीच से डूबता हुआ सूरज
अपनी चमक बिखेर रहा था; लाल-नारंगी चमक पेड़ों के पत्तों की लहरों पर पड रही थी, जो अब घास के
मैदान में बहने लगी थी; सुनहरा स्पर्श...जादुई...
उसने
अपने भीतर एक उत्तेजना महसूस की.
बूढा
आदमी उसे वापस दुनिया में खींच लाया.
“ये
लीजिये, मैडम, एक सौ बीस
रुपये.”
उसका
दिल गुनगुना रहा था.
उसने
बेदिली से अपनी आंखें उस पेंटिंग से हटाईं.
“आपने
ये पेंटिंग कहाँ से खरीदी?”
‘ओह!
वो वाली? मेरे
सबसे छोटे बेटे ने बनाई है.”
“क्या
एक ही है? क्या
कुछ और भी हैं? मतलब, क्या मैं
उन्हें देख सकती हूँ?”
बूढ़े
ने उसकी बात काटी, “इस सब के लिए टाइम कहाँ है? वह सुबह छः बजे जाता है और सिर्फ रात को दस बजे
ही वापस आता है.”
“ओह!
वह कहाँ काम करता है? किसी
स्टूडियो में?”
“नहीं, अगले शहर में
हमारी एक और दूकान है. जब वह काउंटर पर बैठता है, तो सिर्फ रात को नौ बजे ही वहाँ से
उठ पाता है.”
वह उसे
टाल रहा था. उसे अन्य ग्राहकों को देखना था.
“उसे
विदेश से ‘इन्वीटेशन’ मिला
था. मैंने सख्ती से मना कर दिया. क्यों वक्त बर्बाद करना है!”
घर की ओर
लौटते हुए वह आर्ट गैलरी की बकवास कलाकृतियों को याद कर रही थी. और अतिरंजित तारीफ़;
और भीड़.
बारिश
की मोटी बूँदें गिरने लगी थीं.
एक
लाजवाब,
उत्कृष्ट,
प्रतिभावान और दैवी कलाकार को आम काउन्टर के पीछे बैठकर पैसे गिनने पड़ते हैं, और उड़द की दाल
और इमली जैसी चीज़ों के लिए बिल्स बनाने पड़ते हैं.
उसके
दिल में टीस उठी.
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