Sunday, 21 May 2023

Golden Egg - 11

 

 

खोये हुए बर्तन का रहस्य

 

वह गायब हो गया था!

मैं एक बर्तन की बात कर रही हूँ, जिसे मैंने स्टोव्ह पर छोड़ा था. मैं पिछवाड़े – गार्डन में - गई थी थोड़ा सा धनिया पत्ता तोड़ने. जब मैं अपने पैर धोकर किचन में वापस आई, तो मैं चौंक गई, रसम् की स्वर्गीय खुशबू गायब हो चुकी थी. मुझे याद है कि बर्तन में रसम् उबल रहा था और उसकी ख़ास खुशबू पूरे घर में महक रही थी.

आश्चर्य है, कि स्टोव्ह पर रखा बर्तन भी गायब था.

अभी कुछ ही देर पहले नौकरानी, जो किचन की बगल में, डाइनिंग रूम में पोंछा लगा रही थी, बोली थी:

“अम्मा क्या खुशबू है रसम् की. मैंने कई घरों में काम किया है, मगर कोई भी तुम्हारे जैसा नहीं पकाता.”

मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुराई. मन ही मन खुश थी, नौकरानी भी मेरे पकाने की तारीफ़ कर रही थी. या, हो सकता है, कि तारीफ़ के पुल इसलिए बांधे जा रहे हों, कि इस घर में उसका भोजन सुरक्षित रहे.

आह! चापलूसी? चापलूसी किसे नहीं अच्छी लगती? मैं उसे कॉफ़ी, नाश्ता और लंच देती थी. ज़ाहिर है कि वह मेरे पकाने की तारीफ़ करेगी ही.

मेरे पति लंच के लिए घर आएंगे और मैंने रसम् और कंद फ्राय बनाने का इरादा किया था.

मुझे याद है कि मैंने रसम् वाला बर्तन स्टोव्ह पर रखा था, और जब मैं पिछवाड़े गार्डन में जा रही थी तब रसम् उबल रहा था.

हम हाल ही में मद्रास से इस छोटे से शहर लालगुडी आये थे और गैस का कनेक्शन मिलना तो अभी दूर की बात थी. गैस सिलिंडर लेने के लिए त्रिची जाना पड़ता था. मुझे केरोसिन का स्टोव्ह इस्तेमाल करना पड़ता था, एक कोयले की सिगड़ी – कुम्मटी और लकड़ियों वाला बड़ा ओव्हन भी था – पकाने और गरम करने के लिए. ओव्हन अपने चौड़े मुँह से लपटें फेंकता. मेरा बर्तन तो उस ज्वालामुखी में समा जाता. इसलिए, मैंने बर्तन को केरोसिन स्टोव्ह पर रखा था.

एक मिनट के लिए मेरी पीठ में ठंडी लहर दौड़ गई.

मेरी नौकरानी की बूढ़ी माँ कल सुबह मेरे पास आई थी, यह सुनिश्चित करके कि मैं घर में अकेली हूँ, जिससे वह ऊँची आवाज़ में बतिया सके. उसकी आवाज़ खूब ऊँची थी. मेरे पति दफ्तर चले गए थे, जो हमारे घर से नज़दीक ही था.

उसने बताया:

“तुम बहुत बहादुर हो, जो इस घर को किराए पर लिया. यह बंगला तीन साल से बंद था, क्योंकि कोई इसमें रहना ही नहीं चाहता था. पता है, कोने वाले कमरे की छत गिर गई थी और एक मेसन उसमें दब कर मर गया था.

ऐसा कहते हैं कि उसका भूत इस घर में घूमता है. बेशक, मैं इस बकवास में भरोसा नहीं करती.”

मैंने हँस कर उससे कहा,

“मैं भी इस सब में विश्वास नहीं करती. मुझे ऐसा कोई घर दिखाओ, जहाँ कभी कोई न मरा हो?”

मैंने उसे एक कप चाय दी और वह थोड़ी देर गपशप करने के बाद चली गई.

मेरे पति ने मुझे इस बारे में बताया था और हमने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था. वैसे, कोइ भी अमर नहीं है और एक न एक दिन सभी को मरना ही है. यह आत्महत्या का मामला नहीं था. हमारी नई-नई शादी हुई थी, और मैं बहुत सारी बातों पर शक करती थी.

मगर इस समय ये ख़याल क्यों मेरा पीछा कर रहा है? मैं कुछ चिडचिड़ाहट महसूस करने लगी.

कहीं उस मेसन का भूत तो बर्तन नहीं ले गया?

हा हा हा! भूत, जिसे रसम् पसंद है? वह उड़ता हुआ आया होगा और उसने स्टोव्ह से बर्तन हटाया होगा?

मैंने फ़ौरन इन अजीबोगरीब विचारों को दूर हटाया और पिछवाड़े कुएँ के पास गई जहाँ नौकरानी बर्तन साफ़ कर रही थी.

“कामाक्षी, क्या मैंने तुम्हें रसम् वाला बर्तन धोने के लिए दिया है?

उसने परेशानी से मेरी तरफ देखा.

“अम्मा, मैंने पोंछा लगाते समय रसम् के बारे में तुमसे कहा था. तब तो वह स्टोव्ह पर ही था.”

“अरे, अब वो वहाँ नहीं है. मैं अय्या के लिए नया सांबार बना रही हूँ. (वह मेरे पति को ‘अय्या’ – साहब – कहकर संबोधित करती थी.) मैं ये देखने के लिए आई थी कि कहीं बर्तन यहाँ तो नहीं है, किचन में तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है.”

“नहीं, अम्मा, मुझे पक्का याद है कि वह स्टोव्ह पर था और उबल रहा था. हो सकता है...” उसने कुछ हिचकिचाते हुए मेरी ओर देखा...हाँ, आगे कुछ कहे या नहीं.

कहे या ना कहे...

फिर वह अपने कंधे सिकोड़कर बोली,

“क्या हम उस कमरे में जाकर देखें?

उसका इशारा उस छोटे से कमरे की तरफ था जहाँ मेसन मर गया था और जहाँ ‘रात को उसकी आत्मा घूमती थी.’

“वह मेरे बाथरूम के पास है, और इस तरफ से भी खुलता है.”

घर के आख़िरी हिस्से में एक छोटा सा बाथरूम-टॉयलेट था मज़दूरों के लिए.

अब मैं भी थोड़ी घबरा गई.

हालांकि मैं बेकार की बातों में विश्वास नहीं करती और इस अफवाह में भी कि यह घर भुतहा है, मगर मैं कुछ परेशान हो गई. हमें यहाँ आये एक महीना हो गया था और हमें कोई भी अजीब बात नज़र नहीं आई थी और ‘छोटे कमरे के बारे में पड़ोसियों की बकवास की हमें आदत हो गई थी. बंगला सुन्दर था, सामने की तरफ फूलों का गार्डन और पिछवाड़े में किचन-गार्डन था. बहुत सारे केले के पेड़ थे. नौकरानी ने बताया था कि बारिश के मौसम में कुएँ में इतना पानी भर जाता था कि हम अपने हाथों से पानी निकाल सकते थे.

हमें घर पसंद था.

हमारा एक अच्छा पूजा-घर था जहाँ सारे भगवान मुस्कुराया करते – तस्वीरों के रूप में या मूर्तियों के रूप में. मैं हमेशा से चाहती थी कि एक अलग पूजा-घर हो, जैसा मेरे मायके में और ननिहाल में था. मेरी इच्छा यहाँ आकर पूरी हुई थी. और, हालांकि मैं आत्माओं में तो विश्वास करती थी, मगर मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि यह घर भुतहा है.

“बकवास!!” मैंने हँस कर कहा था.

मगर इस ‘गायब हुए बर्तन ने मेरे मन में एक अनजाना भय पैदा कर दिया था.

अगर, भूत तो आधी रात के बाद ही तैरते हैं.

हम दोनों ने डरते हुए छोटे वाले कमरे का दरवाज़ा खोला. वह साफ़ किया गया था, और उसमें टाईल्स की छत से होकर सूरज की किरण आ रही थी. घर के पिछवाड़े और किचन में टाईल्स लगाई गई थीं. और ऑफिस के इस घर को किराए पर लेने से पहले उसकी पुताई हुई थी और पुरानी टाईल्स को हटा कर नई टाईल्स लगाई गई थीं.

यहाँ कोई ‘बर्तन’ नहीं था. मैं इस कमरे में पहली बार आई थी वह मुझे काफी गर्म और आरामदेह लग रहा था.

हम वापस गए.

‘गायब हुए बर्तन’ का रहस्य सुलझा नहीं था.

 मैंने खाना बना लिया और किचन का प्लेटफॉर्म साफ़ कर दिया, और एक पत्रिका लेकर पन्ने पलटने लगी.

मेरा मन नहीं लग रहा था.

“अम्मा.”   

ये कामाक्षी थी.

“तुमने मुझे स्टोव्ह साफ़ करने के लिए कहा था, बत्तियां बाहर खींचकर केरोसिन भरने को कहा था. मैंने बाकी सब काम पूरा कर लिया है, अगर मुझे स्टोव्ह दो तो वह काम कर लेती हूँ.”

मैं किचन में गई और स्टोव्ह बाहर लाई, अब तक वह बरामदे में कुछ फटे हुए कपड़ों के साथ, कैरोसिन का डिब्बा, एक चुंगी और पम्प लेकर बैठ गई थी.

मैं उससे कुछ दूर बैठ गई, उसे देखते हुए और शुक्र मनाते हुए कि मुझे स्टोव्ह साफ़ नहीं करना है, और कालिख और कैरोसीन से हाथ खराब नहीं करने हैं,       

शुरू करने से पहले उसने मेरी तरफ कुछ उम्मीद से देखा.

“अम्मा, मैं एक सायबू को जानती हूँ, जो रिटायर्ड पादरी है. वह बहुत बूढा है और उसने बहुत सारे लोगों को खोई हुई चीज़ों को वापस पाने में मदद की है. असल में, उसने हमारी गाय भी ढूंढ दी थी, अगले गाँव से, जहाँ हमारे रिश्तेदार ने अपनी टपरी में उसे छुपा रखा था. सायबू सिर्फ एक पान का पत्ता लेकर उस पर काजल फेरता है, और कुछ मन्त्र पढ़ता है. कुछ ही पलों में पत्ता आपको खोई हुई चीज़ का सही पता बता देता है. हम उसकी मदद ले सकते हैं और तुम्हारा बर्तन वापस पा सकते हैं.”

मैंने उसकी ओर देखा और जोर से हंसने लगी.

“कामाक्षी, सामने का दरवाज़ा बंद है, और तुम पिछवाड़े में बर्तन धो रही थीं. आखिर कोई यहाँ आकर तो बर्तन नहीं चुरा सकता था.”

अगर वो आत्मा...मेसन वाली, उसने बर्तन उठा लिया हो तो? ‘उसने उसे गार्डन में गाड दिया होगा.”

उसे मेसन की आत्मा पर विश्वास होने लगा था.

उसने मुझे दोपहर में जाकर उस बूढ़े आदमी से मिलने के लिए मना लिया. बेदिल से मैं राज़ी हो गई.

उसने स्टोव्ह का ऊपरी हिस्सा हटाया, जहाँ से बत्तियां निकलती थीं. उसकी आंखें किसी चीज़ पर ठहर गईं.

वह हँसते हुए लोटपोट हो गई.

मैंने उसे घूरा.

वहाँ, उसके हाथों में मेरा ‘रसम् का बर्तन’ था एक चमकती हुई गेंद के रूप में.

ऊप्स!!

मुझे याद आया – मेरी माँ मुझे हमेशा चेतावनी देती थी, “इस बर्तन को स्टोव्ह पर रखकर इधर उधर घूमने न चली जाना. अगर इसमें रखा हुआ पदार्थ भाप बन गया, तो बर्तन पिघल जाएगा.”

इस छोटे शहर में आने से पहले उसने मुझे सख्त हिदायत दी थी. ये – हमारी शादी के फ़ौरन बाद की बात है. उस समय तक हम ससुराल वाले घर में ताँबे के बर्तन में रसम् बनाया करते थे, और मैंने कभी भी इस ख़ास बर्तन का प्रयोग नहीं किया था, जो टीन की किसी मिश्र धातु से बना था.

शादी से पहले मैंने कभी भी पूरा खाना नहीं बनाया था. बेशक, मैं दोसे और चपाती बनाया करती और माँ की घर के अन्य कामों में मदद करती.

मैं उसकी चेतावनी को पूरी तरह भूल गई थी.

नन्हा बर्तन पिघल गया था और स्टोव्ह की गहराई में एक चमकदार गेंद के रूप में गिर गया था.

“अच्छा, कामाक्षी”, मैंने उससे कहा, “एक बात तो साबित हो गई – मेसन की आत्मा का अस्तित्व नहीं है. उस आत्मा को मुक्ति मिल गई है.”

 

**********

No comments:

Post a Comment

सुनहरा अंडा - सम्पूर्ण

  सुनहरा अंडा       लेखिका उषा सूर्या         अंग्रेज़ी से अनुवाद आ. चारुमति रामदास                    ...