मॉनसून मैजिक
राधा ने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखा.
आसमान बहुत काला था और बादल यूँ भाग रहे थे जैसे किसी
चीज़ को दुबारा हासिल करना चाहते हों, जिसे वे अपने साथ ले जाना भूल गए थे.
तेज़ रफ़्तार में पर्वत और छोटे-छोटे गाँव ओझल होते जा
रहे थे.
अभी दो घंटे का सफ़र बाकी था.
“मेरी
ज़िंदगी के सफ़र के मुकाबले में दो घंटे क्या चीज़ हैं? मैं करीब पचास साल से सफ़र कर रही हूँ.”
उसके चहरे पर क्षीण मुस्कान तैर गई.
उसके सामने बैठी महिला एक पत्रिका पढ़ने में मगन थी. किसी
फिल्म ऐक्ट्रेस के दुस्साहसिक कारनामों का
लुत्फ़ उठा रही थी. दूसरा सह-प्रवासी एक बूढा आदमी था जो कुछ बुदबुदा रहा था,
वह बीच-बीच में राधा की ओर देख लेता. .
राधा ने अपनी किताब बंद की और उसे बैग में रख दिया.
ये थी अलेक्सान्दर फ्रेटर की “चेज़िग द मॉनसून”. बहुत
दिलचस्प किताब थी, ये लेखक की भारत में केरल से चेरापूंजी तक की यात्रा के
बारे में थी, जहाँ कुछ वर्ष पूर्व तक मॉनसून की सबसे ज़्यादा बारिश
हुआ करती थी. लेखक ने मॉनसून के क्षणों का पीछा किया था. बहुत रोचक और अच्छी तरह
से लिखी गई किताब थी. भाषा का प्रवाह अद्भुत था और हर पल लेखक की उत्सुकता को
दर्शाता था, बारिश का वर्णन – एक मासूम धार और फुहार से लेकर मूसलाधार बारिश तक,
जो भयानक बाढ़ लाती है – शानदार था.
कुछ ही पृष्ठ शेष बचे थे, मगर उसने किताब को बंद करके रख दिया.
अब वह बारिश को महसूस करना चाहती थी. बारिश फुहार की
तरह शुरू हुई, चौड़ी खिड़की पर डिजाईन्स बनाते हुए. वह छोटे-छोटे नाले
बना रही थी.
बौछारों ने पत्तों और घास को नहला दिया था जो अब
प्यारे रंगों में चमक रहे थे. पेड़ हवा में झूम रहे थे. लाल मिट्टी पर पानी के डबरे
बन गए थे. कुछ रास्तों पर आदमी और औरतें छाता खोले भागते दिखाई दे रहे थे. मवेशी
बारिश की बूंदों का आनंद लेते हुए खड़े थे.
राधा हर पल का आनंद उठा रही थी.
“साल कैसे गुज़र गए!!” उसने सोचा.
पच्चीस साल पहले उसने एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाना
शुरू किया था.
तभी उसकी मुलाक़ात श्रीकांत से हुई थी.
साहित्य के प्रति प्यार उन्हें एक साथ लाया था,
और जल्दी ही उन्होंने महसूस किया कि वे भी प्यार करने लगे हैं.
उसके माता-पिता और भाईयों का सख्त विरोध था क्योंकि
श्रीकांत गरीब था, उसकी तीन छोटी बहनें थीं और माँ-बाप की भी देखभाल करनी थी.
विरोध तेज़ी से बढ़ता गया और उसका भाई राधा के लिए अपने
एक अमीर दोस्त का रिश्ता लाया.
राधा ने विद्रोह कर दिया. टीचर की नौकरी करने की ज़रुरत
नहीं पड़ेगी – उसके भाइयों ने उससे कहा था. मगर उसे पढ़ाना अच्छा लगता था. उसे
बच्चों का साथ अच्छा लगता था. उसे उनके सवालों के जवाब देना और उन्हें ज्ञान
प्रदान करना अच्छा लगता था.
चूंकि विरोध की इस त्सुनामी के आगे वह कुछ भी नहीं कर
सकती थी, इसलिए वह अपनी कुछ चीज़ें लेकर और सर्टिफिकेट्स लेकर घर से निकल गई और दूसरे
शहर के किसी स्कूल में पढ़ाने लगी.
श्रीकांत के घर में परिस्थितियाँ कुछ ऐसी थीं कि वह
तुरंत उससे शादी नहीं कर सकता था. उसके पास कोई और उपाय न था...उसने दूसरे शहर
जाने का फैसला कर लिया.
राधा ने स्वयं को अपने परिवार से पूरी तरह अलग करने का
फैसला कर लिया. जब वह घर से जा रही थी, तो उस पर गालियों की बौछार हो रही थी.
उसकी माँ की आवाज़ गुस्से से गूँज रही थी,
“एक दिन तुम वापस यहीं आओगी,
मनहूस लड़की! कितने दिन अकेली रहोगी?”
वह नहीं रुकी.
‘घर’ नामक शब्द उसके लिए विस्मृति में चला गया था. लोग
इतने अमानवीय कैसे हो सकते हैं?
क्या दौलत प्यार के ऊपर हावी हो गई थी?
उसने श्रीकांत से बिदा नहीं ली थी.
उसने सोचा, कि उसमें कोई तुक नहीं था.
उस दिन भी बारिश हो रही थी जब वह अपना घर छोड़कर निकली
थी.
“मेरी ज़िंदगी में बारिश की अहम् भूमिका है,”
उसने बाहर देखते हुए सोचा.
अब बारिश बहुत तेज़ हो गई थी और ट्रेन की रफ़्तार कम हो
गई थी.
“एक घंटा देरी से चल रही है,”
सामने बैठे बूढ़े आदमी ने उससे कहा. वह मुस्कुराई...
ट्रेन उसके गंतव्य पर आकर रुकी. वह पहुंच गई थी और
बारिश भी रुक गई.
एक टैक्सी रोकी, अपने दोनों सूटकेस उठाने के लिए उसे एक कुली मिल गया,
सामान रखवाकर वह टैक्सी में बैठ गई.
टैक्सी ड्राइवर प्रसन्न चित्त व्यक्ति था,
जिसने सामान रखवाने में उसकी सहायता की.
शान्ति निलय.
यह था नाम उस ‘ओल्ड एज होम’ का जहाँ वह जाने वाली थी.
हाँ. इसका उसके लिए बहुत महत्त्व था....इस नाम का. उसे
शान्ति की इच्छा थी.
जीवन के संध्या काल में शान्ति. उसकी यादें अब उसकी
चिर संगिनी रहेंगी.
श्रीकांत की यादें.
उसने इस वृद्धाश्रम के बारे में अखबार में इश्तेहार
देखा था, और यह भी कि वह एक महिला को ढूंढ रहे हैं, जो आश्रमवासियों को संगीत और मंत्रोच्चारण सिखा सके
और आध्यात्मिक कहानियों से उन्हें अवगत कराये.
वह इस सब के लिए योग्य थी.
“बच्चों को पढ़ाने से बड़ों को पढ़ाने तक.”
‘आह!! क्या दोनों में कोई अंतर है?’
वह सोच रही थी.
इस संस्था के साथ ई-मेल्स का आदान-प्रदान हुआ था और
उसने यहाँ आने का फैसला कर लिया. यह एक सुरक्षित आश्रय-स्थल था. उसे एक छोटे से घर
और अच्छे खाने का वादा किया गया था. यहाँ कोई पॉलिटिक्स नहीं होगी,
व्यर्थ की अफवाहें नहीं होंगी. उन्होंने उसे लिखा था कि वहाँ एक बड़ी लाइब्रेरी भी
है.
टैक्सी से उतरते हुए वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी.
टैक्सी ड्राइवर बहुत खुश हो गया,
जब राधा ने उसे काफी अच्छे पैसे दिए.
जब उसने शान्ति निलय में प्रवेश किया तो दो महिलाओं और
एक पुरुष ने बड़ी प्रसन्नता से उसका स्वागत किया.
‘मुझे ये मुस्कुराते हुए चेहरे अच्छे लगते हैं,’ राधा
ने सोचा.
“मैडम, उम्मीद है आपका सफ़र अच्छा रहा,”
राजाराम ने अपना परिचय देते हुए कहा. वह यहाँ असिस्टेंट मैनेजर था. दोनों महिलाओं
ने उसे आदर से बिठाया और उसके लिए गर्म कॉफी का ऑर्डर दिया.
“कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी,
मैडम और फिर आप मैनेजर से मिलेंगी, जो आपको ऑफिशियल अपोइन्ट्मेन्ट लेटर देंगे.”
बढ़िया कॉफी के बाद उसे मैनेजर के कमरे में ले जाया
गया.
उसने मैनेजर की और देखा जो उसका स्वागत करने के लिए उठकर
खडा हो गया था.
मैनेजर.
श्रीकांत था.
वह उसकी ओर गौर से देखने लगी. उसे अपनी आंखों पर विश्वास
नहीं हो रहा था.
वह ज़्यादा नहीं बदला था.
बाल थोड़े पीछे की तरफ चले गए थे,
मगर...उसके गाल का डिम्पल...उसके होंठ पर बाईं ओर का तिल...ये...ये था...श्रीकांत.
वह भी सम्पूर्ण अविश्वास से उसकी तरफ देख रहा था.
वह लड़खड़ा गया....हकलाने लगा...
“ये सिग्नेचर हैं...आपने...लिखा है...राधाश्री. कल्पना
भी नहीं की थी कि ये तुम होगी!”
उसके होंठ थरथराये.
“हाँ, राधाश्री...तुम्हारे नाम का श्री.”
अब उसकी आंखों में आँसू आ गए थे.
मेज़ पर उसकी एक फोटो थी. एक फोटो जो काफी साल पुरानी थी.
स्कूल के ग्रुप फोटो से अलग करके निकाली गई थी.
धब्बेदार लाल-भूरी.
वह भी उसकी यादों में ही जी रहा था.
कितना बड़ा अंतराल, राधा! मैं इंतज़ार करता रहा. मुझे यह विश्वास था कि किसी
दिन हम ज़रूर मिलेंगे,” वह बुदबुदाया.
अब दोनों मुस्कुरा रहे थे.
बारिश फिर से शुरू हो गई थी.
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