Tuesday, 23 May 2023

Golden Egg - 13

 एक नई ज़िंदगी

 

वीणा ने खिड़की से बाहर देखा, आकाश काला और अमंगल प्रतीत हो रहा था.

‘अब किसी भी समय बारिश हो सकती है’, वह फुसफुसाई. उसके दिल में खुशी की लहर दौड़ रही थी.

तेज़ हवा बहने लगी और पेड़ झूलने लगे. पत्ते कंपकंपाने लगे. गुलाब झुक गए. घास के पत्ते एक दूसरे पर गिरकर हवा की लय में नृत्य करने लगे. ऐसा लग रहा था कि बारिश का बड़ी खुशी से स्वागत किया जा रहा था.

मॉनसून हमेशा ही जादू बुनता है.

अब, वह एक फुहार के रूप में आरम्भ हुई. हल्की फुहार मोटी-मोटी बूंदों के रूप में बदल कर, सारे पेड़ों को, झाड़ियों को, पत्तों को, फूलों को और कलियों को भिगोते हुए धरती पर गिरने लगी. लाल धरती पर छोटी-छोटी नदियाँ बन गईं. बड़ी जल्दी पानी के डबरे बन गए. 

वीणा के हृदय में खुशी का एहसास था.

उसे बारिश अच्छी लगती थी. उसे सराबोर भीगना अच्छा लगता था. चेहरे पर और फ़ैली हुई बांहों पर गिरती ठंडी बूंदों को महसूस करना और अंत में पूरी तरह सराबोर हो जाना, कैसी आश्चर्यजनक भावना थी यह, पूरी तरह भीग जाना!

 उसके ख़याल उस विशिष्ठ दिन पर वापस गए, जब बारिश ने पूरी तरह उसके जीवन के प्रवाह को बदल दिया था.

शादी एक महीने में होने वाली थी और सुदीप घर आया था, उसे अपनी नई कार में ड्राइव पर ले जाने के लिए, जो उसने हाल ही में खरीदी थी.

“बारिश होने वाली है, सुदीप. तुम अपनी ड्राइव को कल तक के लिए क्यों नहीं टाल देते? अब चाय पियो और मैं तुम दोनों के लिए गरम समोसे तल देती हूँ,” वीणा की माँ नलिनी ने सुदीप से कहा, जब वह सोफे पर बैठ गया.

“अभी नहीं, आंटी. मुझे मालूम है कि वीणा को बारिश पसंद है. हम आधे घंटे में वापस आ जायेंगे. मुझे एक घंटे के अन्दर घर पहुँचना है, क्योंकि मेरी बहन सरस आज रात को आ रही है.”

वीणा के पैरों में मानो स्प्रिंग लग गई थी, जब वह कार की तरफ जा रही थी.

लव-बर्ड्स की तरह वे लगातार बातें कर रहे थे. सुंदर भविष्य के लिए सपने बुन रहे थे.

सुदीप मसूरी की आई.ए.एस अकादमी में लेक्चरर के पद पर नियुक्त हुआ था. वीणा को मसूरी जाने का ख़याल बहुत अच्छा लगा था क्योंकि वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य ऊटी से बहुत अलग नहीं था, जहाँ वह बड़ी हुई थी.

उसका भी अपना व्यवसाय था. हाँ...वह एक उभरती हुई लेखिका थी और उसके दो उपन्यास ‘बेस्ट सेलर बन गए थे.

ऊटी बहुत प्यारी जगह थी और वीणा के पिता  को विरासत में कुछ ज़मीन मिली थी, जहाँ वे चाय उगाते थे. उनका कुन्नूर में एक कॉफी प्लांटेशन भी था. परिवार छोटा सा था और ज़िंदगी प्लान्टेशन और मज़दूरों की भलाई के इर्द गिर्द ही घूमती थी. उसके माता-पिटा दोनों को पढ़ने का बहुत शौक था और वीणा ने भी पढ़ने का शौक उन्हीं से लिया था. घर के दो कमरों में अलमारियों में किताबें भरी थीं – पुराने क्लासिक्स से साहित्य तक और आध्यात्मिक क़िताबें. नेशनल ज्योग्राफिक मैगजीन्स का बढ़िया कलेक्शन था. सोलह साल की उम्र से वीणा ने लिखना शुरू किया था. कुछ कविताओं से लेकर, जो कुछ मैगज़ीन्स में प्रकाशित हुई थीं, वह कहानियों तथा उपन्यास की ओर मुडी, और उसके दो उपन्यास ‘बेस्ट सेलर हो गए थे. अब वह एक व्यावसायिक लेखिका बन गई थी.

वीणा का जन्म लन्दन में हुआ था और उसने वहाँ प्राइमरी तक पढाई की थी. फिर परिवार भारत आ गया और उसके पिता श्रीधरन ने ऊटी में रहने और अपने पुरखों के चाय और कॉफी के बागानों को संभालने का फैसला कर लिया. श्रीधरन और नलिनी भारत वापस आना चाहते थे और उन्हें यहाँ की पारंपरिक जीवन शैली से प्यार हो गया. वीणा के लन्दन में जन्म लेने का फ़ायदा यह था कि वह ‘क्वीन्स रॉयल कॉमनवेल्थ एस्से कॉम्पीटीशन’ और ‘फोटोग्राफी कॉम्पीटीशन’ में हिस्सा ले सकती थी. उसे फोटोग्राफी का शौक था और वह आज भी उस समय को याद करके खुश होती है, जब चार साल पहले उसे हर मैजेस्टी क्वीन एलिजाबेथ के साथ चाय पर बुलाया गया था, जब उसने ‘फोटोग्राफी कॉम्पीटीशन’ में सिल्वर मैडल जीता था.

उस अवसर पर पूरा परिवार लन्दन गया था.

वीणा सुदीप से ऊटी में डिस्ट्रिक्ट लाइब्रेरी में मिली थी और दोनों के बीच बहुत जल्दी प्यार फूलने लगा. मसूरी आई. इ.एस. अकादमी में फैकल्टी मेंबर था सुदीप, और वह अक्सर ऊटी आया करता था, जहाँ उसके पिता का बिज़नेस था. उसके पिता सीधे-सादे इन्सांन थे, मगर माँ बहुत तानाशाह किस्म की और लालची थी. उसने वीणा के रिश्ते को इसलिए मंज़ूर किया था, क्योंकि उसके पिता के चाय और कॉफी के बागान थे, और वीणा लोकप्रिय लेखिका थी. इस औरत के लिए पैसा ही सब कुछ था, जो खुद भी एक बहुत धनी परिवार से थी.

सुदीप बहुत सावधानी से कार चला रहा था, क्योंकि बारिश तेज़ हो गई थी.

जब वे वापस लौट रहे थे, तो वीणा ने एक जगह पर उसे कार रोकने के लिए कहा, क्योंकि उसे बारिश को महसूस करना था. उसने चिडचिडाते  हुए कार रोकी, क्योंकि वह गीला नहीं होना चाहता था. जैसे ही उसने कार रोकी और स्टीयरिंग के पीछे बैठा, वीणा बाहर निकालकर बारिश की बूंदों का मज़ा लूटती रही जो उसके चेहरे पर गिर रही थीं. बारिश कम होने लगी और सूरज ने बादलों से झांकते हुए मुस्कुरा कर कहा, “देखो, कितनी अच्छी तरह नहलाया है मैंने पेड़ों को! कितने   ताज़ातरीन और खुश नज़र आ रहे हैं!” वीणा मुस्कुराई और वापस कार में बैठ गई.

“मुझे ये बिल्कुल समझ में नहीं आता, वीणा...भीगने में तुम्हें बच्चों जैसी खुशी होती है! ऊह!  मैं तो कभी न भीगता, चाहे दुनिया की पूरी दौलत ही क्यों न दे दो,” सुदीप ने कार स्टार्ट करते हुए कहा था.

वह हंसी और बोली,

“मगर मैं खुश हूँ कि तुम मुझे मेरे मन की करने देते हो. सोचो, अगर तुम सनकी होते और मुझे कार से उतरने से मना करते...किसी ‘मेंटल की तरह!!” वह कल्पना में ही काँप गई.

तब वह हुआ....

कार अचानक फिसल गई, झटके से मुड़ गई और रास्ते के एक पेड़ से टकराई. दरवाज़ा झटके से खुल गया और वीणा बाहर फेंक दी गई.

बस, यही आख़िरी बात थी जो उसे याद थी.

जब वह ICU में जीवन से संघर्ष कर रही थी, तो उसे माता-पिता के चिंतामग्न चेहरे याद रहे. ICU के दिन भयानक थे. जल्दी ही उसकी तबियत में सुधार होने लगा; अस्पताल से छुट्टी देने से पहले उसे कुछ दिन किसी और कमरे में रखा गया.

घर आकर वीणा पहली बार मुस्कुराई और उसके माता-पिता के चेहरे खुशी से दमक उठे.

“भगवान वास्तव में महान है और दयालु है,” उसकी माँ ने हौले से कहा.

“अम्मा...सुदीप कैसा है?

उसकी माँ खामोश हो गई.

उसके पिता ने बताया. उनकी आवाज़ में कड़वाहट थी.

“उसके शरीर पर मुश्किल से कोई खरोंच आई होगी. वह बिना किसी चोट के बाहर आया....मगर तुम, मेरी बच्ची...”

उनकी आवाज़ थरथरा रही थी.

बाद में उन्होंने उसे बताया कि सुदीप की शादी किसी और लड़की के साथ पक्की हो गई थी, अमीर घर की लड़की है. वधू सुदीप की माँ के रिश्ते में है. वह कुछ न कर सका. अपनी माँ की दलीलों के आगे हतबल था. अगर सुदीप इनकार करता  तो उसने आत्महत्या करने की धमकी भी दी थी. वह सिर्फ एक बार अस्पताल आया था वीणा को देखने, जिसके बाद वह फिर कभी नहीं आया.

“वीणा, तुम्हें मज़बूत होना होगा. तुम्हारे सामने पूरी ज़िंदगी पडी है. अपना लेखन शुरू करो. उस शौक को वापस लाओ. हम दोनों तुम्हारे साथ हैं. शायद तुम्हारे लिए कोई और है, सुदीप से बेहतर इंसान.” श्रीधरन ने उससे कहा था.

वीणा ने बाहर देखा, बारिश पूरी तरह रुक गई थी. सूरज चमक रहा था. बादल भी बिखर रहे थे.

वह अपनी व्हील चेयर मेज़ के पास लाई. उसे अपनी किताब पर काम करना था.

“गतिशीलता सिर्फ मेरे हाथों में ही नहीं है, वह मेरे दिल में भी है,” उसने अपने आपसे फुसफुसाकर कहा.

 

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Monday, 22 May 2023

Golden Egg - 12

  

                          मॉनसून मैजिक 


राधा ने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखा.

आसमान बहुत काला था और बादल यूँ भाग रहे थे जैसे किसी चीज़ को दुबारा हासिल करना चाहते हों, जिसे वे अपने साथ ले जाना भूल गए थे.

तेज़ रफ़्तार में पर्वत और छोटे-छोटे गाँव ओझल होते जा रहे थे.

अभी दो घंटे का सफ़र बाकी था.

मेरी ज़िंदगी के सफ़र के मुकाबले में दो घंटे क्या चीज़ हैं? मैं करीब पचास साल से सफ़र कर रही हूँ.”

उसके चहरे पर क्षीण मुस्कान तैर गई.

उसके सामने बैठी महिला एक पत्रिका पढ़ने में मगन थी. किसी फिल्म ऐक्ट्रेस के दुस्साहसिक  कारनामों का लुत्फ़ उठा रही थी. दूसरा सह-प्रवासी एक बूढा आदमी था जो कुछ बुदबुदा रहा था, वह बीच-बीच में राधा की ओर देख लेता. .

राधा ने अपनी किताब बंद की और उसे बैग में रख दिया.

ये थी अलेक्सान्दर फ्रेटर की “चेज़िग द मॉनसून”. बहुत दिलचस्प किताब थी, ये लेखक की भारत में केरल से चेरापूंजी तक की यात्रा के बारे में थी, जहाँ कुछ वर्ष पूर्व तक मॉनसून की सबसे ज़्यादा बारिश हुआ करती थी. लेखक ने मॉनसून के क्षणों का पीछा किया था. बहुत रोचक और अच्छी तरह से लिखी गई किताब थी. भाषा का प्रवाह अद्भुत था और हर पल लेखक की उत्सुकता को दर्शाता था, बारिश का वर्णन – एक मासूम धार और फुहार से लेकर मूसलाधार बारिश तक, जो भयानक बाढ़ लाती है – शानदार था. 

कुछ ही पृष्ठ शेष बचे थे, मगर उसने किताब को बंद करके रख दिया.

अब वह बारिश को महसूस करना चाहती थी. बारिश फुहार की तरह शुरू हुई, चौड़ी खिड़की पर डिजाईन्स बनाते हुए. वह छोटे-छोटे नाले बना रही थी.

बौछारों ने पत्तों और घास को नहला दिया था जो अब प्यारे रंगों में चमक रहे थे. पेड़ हवा में झूम रहे थे. लाल मिट्टी पर पानी के डबरे बन गए थे. कुछ रास्तों पर आदमी और औरतें छाता खोले भागते दिखाई दे रहे थे. मवेशी बारिश की बूंदों का आनंद लेते हुए खड़े थे.

राधा हर पल का आनंद उठा रही थी.       

“साल कैसे गुज़र गए!!” उसने सोचा.

पच्चीस साल पहले उसने एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था.

तभी उसकी मुलाक़ात श्रीकांत से हुई थी.

साहित्य के प्रति प्यार उन्हें एक साथ लाया था, और जल्दी ही उन्होंने महसूस किया कि वे भी प्यार करने लगे हैं.

उसके माता-पिता और भाईयों का सख्त विरोध था क्योंकि श्रीकांत गरीब था, उसकी तीन छोटी बहनें थीं और माँ-बाप की भी देखभाल करनी थी.

विरोध तेज़ी से बढ़ता गया और उसका भाई राधा के लिए अपने एक अमीर दोस्त का रिश्ता लाया.

राधा ने विद्रोह कर दिया. टीचर की नौकरी करने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी – उसके भाइयों ने उससे कहा था. मगर उसे पढ़ाना अच्छा लगता था. उसे बच्चों का साथ अच्छा लगता था. उसे उनके सवालों के जवाब देना और उन्हें ज्ञान प्रदान करना अच्छा लगता था.

चूंकि विरोध की इस त्सुनामी के आगे वह कुछ भी नहीं कर सकती थी, इसलिए वह अपनी कुछ चीज़ें लेकर और सर्टिफिकेट्स लेकर घर से निकल गई और दूसरे शहर के किसी स्कूल में पढ़ाने लगी.

श्रीकांत के घर में परिस्थितियाँ कुछ ऐसी थीं कि वह तुरंत उससे शादी नहीं कर सकता था. उसके पास कोई और उपाय न था...उसने दूसरे शहर जाने का फैसला कर लिया.

राधा ने स्वयं को अपने परिवार से पूरी तरह अलग करने का फैसला कर लिया. जब वह घर से जा रही थी, तो उस पर गालियों की बौछार हो रही थी.

उसकी माँ की आवाज़ गुस्से से गूँज रही थी,

“एक दिन तुम वापस यहीं आओगी, मनहूस लड़की! कितने दिन अकेली रहोगी?”

वह नहीं रुकी.

‘घर नामक शब्द उसके लिए विस्मृति में चला गया था. लोग इतने अमानवीय कैसे हो सकते हैं?

क्या दौलत प्यार के ऊपर हावी हो गई थी? उसने श्रीकांत से बिदा नहीं ली थी.

उसने सोचा, कि उसमें कोई तुक नहीं था.

उस दिन भी बारिश हो रही थी जब वह अपना घर छोड़कर निकली थी.

“मेरी ज़िंदगी में बारिश की अहम् भूमिका है,” उसने बाहर देखते हुए सोचा.

अब बारिश बहुत तेज़ हो गई थी और ट्रेन की रफ़्तार कम हो गई थी.

“एक घंटा देरी से चल रही है,” सामने बैठे बूढ़े आदमी ने उससे कहा. वह मुस्कुराई...

ट्रेन उसके गंतव्य पर आकर रुकी. वह पहुंच गई थी और बारिश भी रुक गई.

एक टैक्सी रोकी, अपने दोनों सूटकेस उठाने के लिए उसे एक कुली मिल गया, सामान रखवाकर वह टैक्सी में बैठ गई.

टैक्सी ड्राइवर प्रसन्न चित्त व्यक्ति था, जिसने सामान रखवाने में उसकी सहायता की.

शान्ति निलय.

यह था नाम उस ‘ओल्ड एज होम का जहाँ वह जाने वाली थी.

हाँ. इसका उसके लिए बहुत महत्त्व था....इस नाम का. उसे शान्ति की इच्छा थी. 

जीवन के संध्या काल में शान्ति. उसकी यादें अब उसकी चिर संगिनी रहेंगी.

श्रीकांत की यादें.

उसने इस वृद्धाश्रम के बारे में अखबार में इश्तेहार देखा था, और यह भी कि वह एक महिला को ढूंढ रहे हैं, जो आश्रमवासियों को संगीत और मंत्रोच्चारण सिखा सके और आध्यात्मिक कहानियों से उन्हें अवगत  कराये. वह इस सब के लिए योग्य थी.

“बच्चों को पढ़ाने से बड़ों को पढ़ाने तक.”

‘आह!! क्या दोनों में कोई अंतर है?’ वह सोच रही थी.

इस संस्था के साथ ई-मेल्स का आदान-प्रदान हुआ था और उसने यहाँ आने का फैसला कर लिया. यह एक सुरक्षित आश्रय-स्थल था. उसे एक छोटे से घर और अच्छे खाने का वादा किया गया था. यहाँ कोई पॉलिटिक्स नहीं होगी, व्यर्थ की अफवाहें नहीं होंगी. उन्होंने उसे लिखा था कि वहाँ एक बड़ी लाइब्रेरी भी है.

टैक्सी से उतरते हुए वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी.

टैक्सी ड्राइवर बहुत खुश हो गया, जब राधा ने उसे काफी अच्छे पैसे दिए.

जब उसने शान्ति निलय में प्रवेश किया तो दो महिलाओं और एक पुरुष ने बड़ी प्रसन्नता से उसका स्वागत किया.

‘मुझे ये मुस्कुराते हुए चेहरे अच्छे लगते हैं,’ राधा ने सोचा.

“मैडम, उम्मीद है आपका सफ़र अच्छा रहा,” राजाराम ने अपना परिचय देते हुए कहा. वह यहाँ असिस्टेंट मैनेजर था. दोनों महिलाओं ने उसे आदर से बिठाया और उसके लिए गर्म कॉफी का ऑर्डर दिया.

“कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, मैडम और फिर आप मैनेजर से मिलेंगी, जो आपको ऑफिशियल अपोइन्ट्मेन्ट लेटर देंगे.”

बढ़िया कॉफी के बाद उसे मैनेजर के कमरे में ले जाया गया.

उसने मैनेजर की और देखा जो उसका स्वागत करने के लिए उठकर खडा हो गया था.

मैनेजर.

श्रीकांत था.

वह उसकी ओर गौर से देखने लगी. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

वह ज़्यादा नहीं बदला था.

बाल थोड़े पीछे की तरफ चले गए थे, मगर...उसके गाल का डिम्पल...उसके होंठ पर बाईं ओर का तिल...ये...ये था...श्रीकांत.

वह भी सम्पूर्ण अविश्वास से उसकी तरफ देख रहा था.

वह लड़खड़ा गया....हकलाने लगा...

“ये सिग्नेचर हैं...आपने...लिखा है...राधाश्री. कल्पना भी नहीं की थी कि ये तुम होगी!”

उसके होंठ थरथराये.

“हाँ, राधाश्री...तुम्हारे नाम का श्री.”

अब उसकी आंखों में आँसू आ गए थे.

मेज़ पर उसकी एक फोटो थी. एक फोटो जो काफी साल पुरानी थी. स्कूल के ग्रुप फोटो से अलग करके निकाली गई थी.

धब्बेदार लाल-भूरी.

वह भी उसकी यादों में ही जी रहा था.

कितना बड़ा अंतराल, राधा! मैं इंतज़ार करता रहा. मुझे यह विश्वास था कि किसी दिन हम ज़रूर मिलेंगे,” वह बुदबुदाया.

अब दोनों मुस्कुरा रहे थे.

बारिश फिर से शुरू  हो गई थी.

 

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Sunday, 21 May 2023

Golden Egg - 11

 

 

खोये हुए बर्तन का रहस्य

 

वह गायब हो गया था!

मैं एक बर्तन की बात कर रही हूँ, जिसे मैंने स्टोव्ह पर छोड़ा था. मैं पिछवाड़े – गार्डन में - गई थी थोड़ा सा धनिया पत्ता तोड़ने. जब मैं अपने पैर धोकर किचन में वापस आई, तो मैं चौंक गई, रसम् की स्वर्गीय खुशबू गायब हो चुकी थी. मुझे याद है कि बर्तन में रसम् उबल रहा था और उसकी ख़ास खुशबू पूरे घर में महक रही थी.

आश्चर्य है, कि स्टोव्ह पर रखा बर्तन भी गायब था.

अभी कुछ ही देर पहले नौकरानी, जो किचन की बगल में, डाइनिंग रूम में पोंछा लगा रही थी, बोली थी:

“अम्मा क्या खुशबू है रसम् की. मैंने कई घरों में काम किया है, मगर कोई भी तुम्हारे जैसा नहीं पकाता.”

मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुराई. मन ही मन खुश थी, नौकरानी भी मेरे पकाने की तारीफ़ कर रही थी. या, हो सकता है, कि तारीफ़ के पुल इसलिए बांधे जा रहे हों, कि इस घर में उसका भोजन सुरक्षित रहे.

आह! चापलूसी? चापलूसी किसे नहीं अच्छी लगती? मैं उसे कॉफ़ी, नाश्ता और लंच देती थी. ज़ाहिर है कि वह मेरे पकाने की तारीफ़ करेगी ही.

मेरे पति लंच के लिए घर आएंगे और मैंने रसम् और कंद फ्राय बनाने का इरादा किया था.

मुझे याद है कि मैंने रसम् वाला बर्तन स्टोव्ह पर रखा था, और जब मैं पिछवाड़े गार्डन में जा रही थी तब रसम् उबल रहा था.

हम हाल ही में मद्रास से इस छोटे से शहर लालगुडी आये थे और गैस का कनेक्शन मिलना तो अभी दूर की बात थी. गैस सिलिंडर लेने के लिए त्रिची जाना पड़ता था. मुझे केरोसिन का स्टोव्ह इस्तेमाल करना पड़ता था, एक कोयले की सिगड़ी – कुम्मटी और लकड़ियों वाला बड़ा ओव्हन भी था – पकाने और गरम करने के लिए. ओव्हन अपने चौड़े मुँह से लपटें फेंकता. मेरा बर्तन तो उस ज्वालामुखी में समा जाता. इसलिए, मैंने बर्तन को केरोसिन स्टोव्ह पर रखा था.

एक मिनट के लिए मेरी पीठ में ठंडी लहर दौड़ गई.

मेरी नौकरानी की बूढ़ी माँ कल सुबह मेरे पास आई थी, यह सुनिश्चित करके कि मैं घर में अकेली हूँ, जिससे वह ऊँची आवाज़ में बतिया सके. उसकी आवाज़ खूब ऊँची थी. मेरे पति दफ्तर चले गए थे, जो हमारे घर से नज़दीक ही था.

उसने बताया:

“तुम बहुत बहादुर हो, जो इस घर को किराए पर लिया. यह बंगला तीन साल से बंद था, क्योंकि कोई इसमें रहना ही नहीं चाहता था. पता है, कोने वाले कमरे की छत गिर गई थी और एक मेसन उसमें दब कर मर गया था.

ऐसा कहते हैं कि उसका भूत इस घर में घूमता है. बेशक, मैं इस बकवास में भरोसा नहीं करती.”

मैंने हँस कर उससे कहा,

“मैं भी इस सब में विश्वास नहीं करती. मुझे ऐसा कोई घर दिखाओ, जहाँ कभी कोई न मरा हो?”

मैंने उसे एक कप चाय दी और वह थोड़ी देर गपशप करने के बाद चली गई.

मेरे पति ने मुझे इस बारे में बताया था और हमने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया था. वैसे, कोइ भी अमर नहीं है और एक न एक दिन सभी को मरना ही है. यह आत्महत्या का मामला नहीं था. हमारी नई-नई शादी हुई थी, और मैं बहुत सारी बातों पर शक करती थी.

मगर इस समय ये ख़याल क्यों मेरा पीछा कर रहा है? मैं कुछ चिडचिड़ाहट महसूस करने लगी.

कहीं उस मेसन का भूत तो बर्तन नहीं ले गया?

हा हा हा! भूत, जिसे रसम् पसंद है? वह उड़ता हुआ आया होगा और उसने स्टोव्ह से बर्तन हटाया होगा?

मैंने फ़ौरन इन अजीबोगरीब विचारों को दूर हटाया और पिछवाड़े कुएँ के पास गई जहाँ नौकरानी बर्तन साफ़ कर रही थी.

“कामाक्षी, क्या मैंने तुम्हें रसम् वाला बर्तन धोने के लिए दिया है?

उसने परेशानी से मेरी तरफ देखा.

“अम्मा, मैंने पोंछा लगाते समय रसम् के बारे में तुमसे कहा था. तब तो वह स्टोव्ह पर ही था.”

“अरे, अब वो वहाँ नहीं है. मैं अय्या के लिए नया सांबार बना रही हूँ. (वह मेरे पति को ‘अय्या’ – साहब – कहकर संबोधित करती थी.) मैं ये देखने के लिए आई थी कि कहीं बर्तन यहाँ तो नहीं है, किचन में तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है.”

“नहीं, अम्मा, मुझे पक्का याद है कि वह स्टोव्ह पर था और उबल रहा था. हो सकता है...” उसने कुछ हिचकिचाते हुए मेरी ओर देखा...हाँ, आगे कुछ कहे या नहीं.

कहे या ना कहे...

फिर वह अपने कंधे सिकोड़कर बोली,

“क्या हम उस कमरे में जाकर देखें?

उसका इशारा उस छोटे से कमरे की तरफ था जहाँ मेसन मर गया था और जहाँ ‘रात को उसकी आत्मा घूमती थी.’

“वह मेरे बाथरूम के पास है, और इस तरफ से भी खुलता है.”

घर के आख़िरी हिस्से में एक छोटा सा बाथरूम-टॉयलेट था मज़दूरों के लिए.

अब मैं भी थोड़ी घबरा गई.

हालांकि मैं बेकार की बातों में विश्वास नहीं करती और इस अफवाह में भी कि यह घर भुतहा है, मगर मैं कुछ परेशान हो गई. हमें यहाँ आये एक महीना हो गया था और हमें कोई भी अजीब बात नज़र नहीं आई थी और ‘छोटे कमरे के बारे में पड़ोसियों की बकवास की हमें आदत हो गई थी. बंगला सुन्दर था, सामने की तरफ फूलों का गार्डन और पिछवाड़े में किचन-गार्डन था. बहुत सारे केले के पेड़ थे. नौकरानी ने बताया था कि बारिश के मौसम में कुएँ में इतना पानी भर जाता था कि हम अपने हाथों से पानी निकाल सकते थे.

हमें घर पसंद था.

हमारा एक अच्छा पूजा-घर था जहाँ सारे भगवान मुस्कुराया करते – तस्वीरों के रूप में या मूर्तियों के रूप में. मैं हमेशा से चाहती थी कि एक अलग पूजा-घर हो, जैसा मेरे मायके में और ननिहाल में था. मेरी इच्छा यहाँ आकर पूरी हुई थी. और, हालांकि मैं आत्माओं में तो विश्वास करती थी, मगर मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि यह घर भुतहा है.

“बकवास!!” मैंने हँस कर कहा था.

मगर इस ‘गायब हुए बर्तन ने मेरे मन में एक अनजाना भय पैदा कर दिया था.

अगर, भूत तो आधी रात के बाद ही तैरते हैं.

हम दोनों ने डरते हुए छोटे वाले कमरे का दरवाज़ा खोला. वह साफ़ किया गया था, और उसमें टाईल्स की छत से होकर सूरज की किरण आ रही थी. घर के पिछवाड़े और किचन में टाईल्स लगाई गई थीं. और ऑफिस के इस घर को किराए पर लेने से पहले उसकी पुताई हुई थी और पुरानी टाईल्स को हटा कर नई टाईल्स लगाई गई थीं.

यहाँ कोई ‘बर्तन’ नहीं था. मैं इस कमरे में पहली बार आई थी वह मुझे काफी गर्म और आरामदेह लग रहा था.

हम वापस गए.

‘गायब हुए बर्तन’ का रहस्य सुलझा नहीं था.

 मैंने खाना बना लिया और किचन का प्लेटफॉर्म साफ़ कर दिया, और एक पत्रिका लेकर पन्ने पलटने लगी.

मेरा मन नहीं लग रहा था.

“अम्मा.”   

ये कामाक्षी थी.

“तुमने मुझे स्टोव्ह साफ़ करने के लिए कहा था, बत्तियां बाहर खींचकर केरोसिन भरने को कहा था. मैंने बाकी सब काम पूरा कर लिया है, अगर मुझे स्टोव्ह दो तो वह काम कर लेती हूँ.”

मैं किचन में गई और स्टोव्ह बाहर लाई, अब तक वह बरामदे में कुछ फटे हुए कपड़ों के साथ, कैरोसिन का डिब्बा, एक चुंगी और पम्प लेकर बैठ गई थी.

मैं उससे कुछ दूर बैठ गई, उसे देखते हुए और शुक्र मनाते हुए कि मुझे स्टोव्ह साफ़ नहीं करना है, और कालिख और कैरोसीन से हाथ खराब नहीं करने हैं,       

शुरू करने से पहले उसने मेरी तरफ कुछ उम्मीद से देखा.

“अम्मा, मैं एक सायबू को जानती हूँ, जो रिटायर्ड पादरी है. वह बहुत बूढा है और उसने बहुत सारे लोगों को खोई हुई चीज़ों को वापस पाने में मदद की है. असल में, उसने हमारी गाय भी ढूंढ दी थी, अगले गाँव से, जहाँ हमारे रिश्तेदार ने अपनी टपरी में उसे छुपा रखा था. सायबू सिर्फ एक पान का पत्ता लेकर उस पर काजल फेरता है, और कुछ मन्त्र पढ़ता है. कुछ ही पलों में पत्ता आपको खोई हुई चीज़ का सही पता बता देता है. हम उसकी मदद ले सकते हैं और तुम्हारा बर्तन वापस पा सकते हैं.”

मैंने उसकी ओर देखा और जोर से हंसने लगी.

“कामाक्षी, सामने का दरवाज़ा बंद है, और तुम पिछवाड़े में बर्तन धो रही थीं. आखिर कोई यहाँ आकर तो बर्तन नहीं चुरा सकता था.”

अगर वो आत्मा...मेसन वाली, उसने बर्तन उठा लिया हो तो? ‘उसने उसे गार्डन में गाड दिया होगा.”

उसे मेसन की आत्मा पर विश्वास होने लगा था.

उसने मुझे दोपहर में जाकर उस बूढ़े आदमी से मिलने के लिए मना लिया. बेदिल से मैं राज़ी हो गई.

उसने स्टोव्ह का ऊपरी हिस्सा हटाया, जहाँ से बत्तियां निकलती थीं. उसकी आंखें किसी चीज़ पर ठहर गईं.

वह हँसते हुए लोटपोट हो गई.

मैंने उसे घूरा.

वहाँ, उसके हाथों में मेरा ‘रसम् का बर्तन’ था एक चमकती हुई गेंद के रूप में.

ऊप्स!!

मुझे याद आया – मेरी माँ मुझे हमेशा चेतावनी देती थी, “इस बर्तन को स्टोव्ह पर रखकर इधर उधर घूमने न चली जाना. अगर इसमें रखा हुआ पदार्थ भाप बन गया, तो बर्तन पिघल जाएगा.”

इस छोटे शहर में आने से पहले उसने मुझे सख्त हिदायत दी थी. ये – हमारी शादी के फ़ौरन बाद की बात है. उस समय तक हम ससुराल वाले घर में ताँबे के बर्तन में रसम् बनाया करते थे, और मैंने कभी भी इस ख़ास बर्तन का प्रयोग नहीं किया था, जो टीन की किसी मिश्र धातु से बना था.

शादी से पहले मैंने कभी भी पूरा खाना नहीं बनाया था. बेशक, मैं दोसे और चपाती बनाया करती और माँ की घर के अन्य कामों में मदद करती.

मैं उसकी चेतावनी को पूरी तरह भूल गई थी.

नन्हा बर्तन पिघल गया था और स्टोव्ह की गहराई में एक चमकदार गेंद के रूप में गिर गया था.

“अच्छा, कामाक्षी”, मैंने उससे कहा, “एक बात तो साबित हो गई – मेसन की आत्मा का अस्तित्व नहीं है. उस आत्मा को मुक्ति मिल गई है.”

 

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Friday, 19 May 2023

Golden Egg - 10

 

पेटबोला

 

ये जैसे घटनाओं का पूर्ण संयोजन था.

मुझे पूरा विश्वास था कि इस चिड़चिडे, नौजवान सिक्यूरिटी गार्ड का उस ख़ूबसूरत बिल्ली के गायब होने में या उसकी मौत में हाथ था. संबंध एकदम स्पष्ट था.

चलिए, समझाती हूँ कि मैं इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँची. उससे पहले, आपको उलझन में डालने के बजाय, मुझे यह बताना पडेगा कि मैं किस बारे में बात कर रही हूँ.  

बात ऐसी है.

तीसरी मंजिल के हमारे अपार्टमेंट की बाल्कनी से मैं हमारे पड़ोसी के घर को अच्छी तरह देख सकती हूँ. मेरा मतलब है, सीमेंट का कम्पाउंड, गैरेज जिसमें तीन कारें हैं, आम का पेड़, नीम का पेड़, और बेशक, घर के लोगों को बाहर आते-जाते देख सकती हूँ. हमारा संबंध उनसे बहुत कम था क्योंकि वे काफी व्यस्त थे और हम, बूढ़े भी अपने काम से काम रखते थे. हमारी बातचीत सिर्फ एक इक्कीस साल के लडके से होती थी, जिसे हम तब से जानते हैं, जब उन्नीस साल पहले हम इस अपार्टमेंट में आये थे. तब वह बहुत छोटा था; एक प्यारा बच्चा. जब वह अपने चचेरे भाइयों के साथ फुटबॉल या क्रिकेट खेलता, तो हम – मैं और मेरे पति – बाल्कनी से उसका हौसला बढाया करते. कभी कभी वह ऊपर देख लेता और अगर मुझे बाल्कनी में खड़े देखता तो उसके चहरे पर प्यारी मुस्कान छा जाती, वह हाथ हिलाता और पूछता, “आप कैसी हैं, आंटी?”

यह एक संयुक्त परिवार था – तीन भाईयों और उनके परिवारों का जो उस बिल्डिंग में एक एक मंजिल पर रहते थे. समय के साथ बच्चे बड़े हो गए, और हम उन्हें उतना नहीं देख पाते थे. क्रिकेट नहीं, फुटबॉल नहीं.

फिर,

आई वह बिल्ली.    

कहानी के आरम्भ की ओर चलते हैं.

मुझे आपको बताना पडेगा कि बिल्ली मेरे कथानक का केंद्र है.

यह एक कैलिको बिल्ली थी. अच्छा, सही सही बताऊँ तो कैलिको बिल्ली सफ़ेद होती है और उसके बदन पर कहीं-कहीं काले और पीले-भूरे धब्बे होते हैं. वह ख़ूबसूरत बिल्ली (ज़्यादातर कैलिको बिल्लियाँ मादा होती हैं, जहाँ तक मेरा ख़याल है) कंपाऊंड में घूमा करती: कार-शेड में या डोर-मैट पर सो जाती; दीवार पर चढ़ जाती और कार शेड की छत पर गिरे हुए आम के पत्ते देखती या फिर सर्दियों की हल्की धूप में थोड़ी देर वहाँ सो जाती. गर्मियों में वह टीन की गर्म छत पर नज़र नहीं आती. दिन में तीन बार उसे खाना दिया जाता – वह महिला अथवा उसका पति एक बॉक्स में कुछ लाते और पाँच-छः मुट्ठियाँ एक लाल बाउल में डाल देते जो इस बिल्ली का था.

उस बिल्डिंग के वाचमैन कुछ महीनों में बदला जाते, क्योंकि वे किसी एजेंसी की मार्फ़त आया करते थे. बूढा वाचमैन उस बिल्ली को बहुत चाहता था. वह उसके पीछे-पीछे जाती, और वाचमैन भी अपने लंच बॉक्स में से उसे कुछ खाना दे देता.

फिर यह नौजवान वाचमैन प्रकट हुआ.

बिल्ली उसकी परवाह नहीं करती थी, क्योंकि वह उसे भगा दिया करता. मैंने उसे दो-तीन बार उस ख़ूबसूरत प्राणी को भगाते हुए देखा था – बेशक, मेमसा’ब और सा’ब को पता चले बगैर, जो उसे बेहद प्यार करते थे.

लोंकडाउन की वजह से नौकरानियां इस बिल्डिंग में काम पर नहीं आती थीं, जैसा कि लगभग सभी घरों का हाल था. मैंने नौकरानियों को भी अपने लंच बॉक्स से बिल्ली को खाना देते हुए देखा था.

मैंने इस सिक्यूरिटी गार्ड को – शायद उसका नाम संजय था – कभी-कभी वहाँ की मैडम से चाय का बड़ा मग लेते हुए देखा था.

एक दिन मैंने उस सुन्दर प्राणी की दर्द भरी ‘म्याऊँ’ सुनी और उस चिड़चिड़े वाचमैन को उसके पीछे भागते देखा. वह शेड में रखी लाल कार के पीछे छिप गई. उन दिनों कारें कम ही निकाली जाती थीं. वह हाथ में एक लंबा डंडा लिए उसे ढूंढ रहा था, इस इंतज़ार में कि वह बाहर आयेगी. मगर वह बाहर ही नहीं आई, शायद उसे खतरे का एहसास हो गया था. मगर उसे खिलाने का कार्यक्रम यथावत चलता रहा और अब मैं उसे सीढ़ियों पर या डोरमैट पर बैठे नहीं देखती थी. दरवाज़े और दीवार के बीच की जगह पर भी वह नहीं दिखाई देती.

मैंने महसूस किया कि वह वाचमैन से कतरा रही है. मुझे समझ में नहीं आता था कि उस प्यारे प्राणी को सताने से उसे कौन सी खुशी हासिल होती है. बिल्ली भी भांप गई थी कि यह इंसान उससे नफ़रत करता है, जिसकी वजह शायद उसी को मालूम थी.

फिर

वह गायब हो गई!      

मेरी आदत थी कि मैं हर रोज़ सुबह अपनी बाल्कनी में खड़े होकर उसे लाल बाउल से प्यार से अपना खाना खाते देखती थी. मैं देख रही थी कि वह महिला और उसके पति बदहवासी से उसे ढूंढ रहे थे. हाँलाकि बिल्ली को घर के भीतर जाना मना था, मगर बेशक, वह उनकी लाडली थी. वे वाचमैन से पूछ रहे थे, और उनके हाव भावों से ज़ाहिर हो रहा था, कि वाचमैन उसके बारे में कुछ भी मालूम होने से इनकार कर रहा था.

खाना लाल बाउल में तब तक पडा रहता, जब तक कौए आकर टुकडे न ले जाते. यह दो दिन चला, फिर उस दंपत्ति ने बिल्ली को ढूँढना बंद कर दिया.

मेरा दिल मुझसे कह रहा था कि बिल्ली के गायब होने में इस वाचमैन का हाथ है.

उस ख़ूबसूरत बिल्ली के बारे में सोचकर मैं बहुत उदास थी.

फिर मेरे मन में एक विचार कौंध गया – ‘पेटबोलापन’! 

मुझे याद है कि मेरे पति और बच्चे मेरा मज़ाक उड़ाया करते, जब मैं कोई बीस साल पहले ‘पेटबोलेपन’ का एक सप्ताह का क्रैश कोर्स करना चाहती थी, जब हम मुम्बई में थे. 

 मुझे याद है कि मेरी सास ने भी खडूसपन से कहा था, “बेकार नाई ने एक बिल्ले को पकड़ा और उसकी हजामत बना दी.”

मगर मुझे वाकई में दिलचस्पी थी, इसलिए मैंने वह कोर्स कर लिया. बेशक, मैंने कठपुतलियों के कोई ‘शो’ नहीं किये, मगर मैं मार्केट में आवाजें निकालकर मज़ा लेती थी, सब्जियों और फलों पर कमेन्ट करती. कुछ सब्जियों को बोलने पर मजबूर करती और एक महिला को तो मैंने डरा ही दिया, जो सब्जी वाले से बहुत ज़्यादा भाव-ताव कर रही थी. वो एक अलग कहानी है.

तो, मैंने तय कर लिया कि मैं अपना ‘पेटबोली’ का हुनर इस्तेमाल करके एक छोटा सा जासूसी कारनामा करूंगी, यह पता करने के लिए कि क्या सिक्यूरटी वाले छोकरे ने बिल्ली को मारकर उसे फेंक दिया था!

अगली सुबह मैं बाल्कनी में बैठ गई और जैसे ही वह छोकरा अपनी चाय पीने के लिए बैठा, मैंने आवाज़ निकाली...

“म्याऊँ“...

वह चौंक गया और फर्श पर अपना ‘मग’ रखकर खडा हो गया और इधर-उधर देखने लगा. सौभाग्य से उसने ऊपर नज़र नहीं डाली और मुझे नहीं देखा.

आसपास किसी बिल्ली को न देखकर वह अपने ‘चाय के कार्यक्रम पर वापस आया.

“म्याऊँ”.

मैंने फिर कहा, इस बार ज़्यादा देर तक और ज़्यादा दर्द से.

यही सब शाम को भी दुहराया गया और मैं देख सकती थी कि वह बेचैन हो गया है.

अब “म्याऊँ” बार बार सुनाई देने लगा और कभी-कभी तो उसके बिलकुल पास भी.

एक सप्ताह बीत गया. मैं अपने हुनर का मज़ा ले रही थी.

फिर एक दिन...

काफी सारी आवाजें सुनाई दीं, तो मैंने नीचे झांककर देखा.

सिक्यूरिटी वाला छोकरा अपने घुटनों पर बैठकर पति-पत्नी से – बिल्ली के चाहने वालों से गुजारिश कर रहा था.

उस महिला ने ऊपर देखा और मुझे बाल्कनी की रेलिंग पर झुका देखा.

अठारह साल की मुस्कानों के आदान प्रदान ने बातचीत को मौक़ा दिया. उसने मुझसे कहा,

“इस आदमी ने हमारी बिल्ली को मार डाला और दूर जाकर फेंक दिया! वह स्वीकार कर रहा है. कहता है कि बिल्ली उसके पीछे पड़ गई है और सुबह-शाम रोती है और वह ये सब बर्दाश्त नहीं कर सकता. वह नौकरी छोड़ना चाहता है.”

“उसने ऐसा क्यों किया?” मैंने पूछा.

“वह कहता है कि उसे बचपन से ही बिल्लियों से नफ़रत है, जब एक बिल्ली ने उसे काट कर लहूलुहान कर दिया था. वह अपना काम छोड़ना चाहता है, और हमें कोई आपत्ति नहीं है. कैसा खतरनाक कारनामा! आह! मेरी प्यारी लूलू.”

उसने नाक से सूं सूं किया.

लूलू उस बिल्ली का नाम था.

उसकी जगह पर एक हफ्ते बाद एक बूढ़े वाचमैन को रखा गया.

हाँ, उसी बूढ़े वाचमैन को जिसके पीछे-पीछे लूलू भागती थी और वह अपने लंच बॉक्स से उसे कुछ तुकडे दिया करता था.

एक महीना बीत गया. मैं अपने आप से काफी संतुष्ट थी कि मैं अपने ‘पेटबोली के हुनर का  ‘ह्त्या’ जैसे संगीन जुर्म के इकबाल करवाने में प्रयोग कर सकी थी.

मैं नीचे कम्पाउंड की दीवार के पास लगे पेड़ से कुछ फूल तोड़ने गई थी.

“आप कैसी हैं, मैडम?

ये पड़ोस वाला वाचमैन था, वह बहुत बातूनी था.

मैं उसकी ओर देखकर मुस्कुराई.

“तो, तुम वापस आ गए?

“हाँ, मैडम. मैं बीमार था, इसलिए छुट्टी ली थी. अब मैं ठीक हूँ.”

उसका वज़न काफी कम हो गया था.  

मैंने हिचकिचाते हुए उससे पूछा,

“वो पहले वाला लड़का...मेरा मतलब है...वो छोकरा, जिसने बिल्ली को मार डाला था...क्या कहीं और काम कर रहा है?” मुझे कुछ अपराध बोध भी हो रहा था, कि उसने नौकरी छोड़ दी थी.

“आआ!! वो एक सच्ची कहानी है, मैडम,” वह मुस्कुराकर आगे बोला,

“कल मैंने यहाँ आते हुए उसे एक बंगले में देखा था. वह काम पर आया ही था. उसके पास बन्स का पैकेट था. उसने कहा कि वह हर रोज़ पड़ोस की चार बिल्लियों को खिलाता है. और शायद इसे साबित करने के लिए बिल्लियाँ दौड़ती हुई उसके पास आईं....करीब सात बिल्लियाँ, न सिर्फ चार, और वह बन्स के टुकडे करके उन्हें दे रहा था. वह बड़ा खुश लग रहा था. अजीब बात है, मैडम. कैसा बदलाव! ईश्वर महान है. वह छोकरा दयालु आत्मा बन गया है.”

मैं घर वापस चली आई. मेरे दिल से एक बड़ा बोझ उतर गया था. मेरे मन का अपराध बोध दूर हो गया.

थैंक्स गॉड, ‘पेटबोलेपन ने उस छोकरे को अवसाद ग्रस्त नहीं किया, बल्कि उसे एक दयालु आत्मा के रूप में परिवर्तित कर दिया.   

हाँ, ईश्वर सचमुच में महान है.

 

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सुनहरा अंडा - सम्पूर्ण

  सुनहरा अंडा       लेखिका उषा सूर्या         अंग्रेज़ी से अनुवाद आ. चारुमति रामदास                    ...